नहर की उस माइनर पर बाईस खेत पड़ते थे और पानी की बारी काग़ज़ पर लिखी हुई थी। जिसकी बारी जिस दिन है, वह उस दिन तड़के चार बजे गेट खोलता है और अपने वक़्त तक चलाता है।
रघुबीर की बारी उस चक्कर में सबसे पहले थी। नंबर एक।
यह इत्तिफ़ाक़ नहीं था। बारी ज़मीन के नंबर से चलती है और उसका नंबर पहला था, और यही बात पिछले चौदह बरस से चली आ रही थी।
मार्च के आख़िर में गेहूँ को आख़िरी पानी चाहिए होता है। उसके बाद दाना भरता है। जिस खेत को वह पानी न मिले, उसका दाना हल्का रह जाता है और वह बात तौल में दिखती है।
बुंदेलखंड में यह पानी और भी भारी पड़ता है, क्योंकि वहाँ बारिश का भरोसा नहीं और नहर के अलावा दूसरा रास्ता उन्हीं के पास है जिनका ट्यूबवेल चलता हो। बाईस खेतों में से नौ पर ट्यूबवेल थे और तेरह पूरी तरह नहर पर टिके थे।
बिंदेश्वरी का खेत उसी माइनर पर था, नंबर सत्रह पर।
उसका ट्यूबवेल फ़रवरी में बैठ गया था और उसे ठीक करवाने के पैसे उसके पास नहीं थे। उसकी बारी छह दिन बाद थी। उसका खेत छह दिन नहीं निकाल सकता था और यह देखकर पता चल जाता था, क्योंकि किनारे वाली दो क्यारियों में बालियाँ सफ़ेद पड़नी शुरू हो चुकी थीं।
वह रघुबीर के पास आई।
उसने माँगा नहीं। उसने आकर इतना कहा कि उसका ट्यूबवेल बैठा हुआ है, और फिर वह चुप हो गई। माँगने की नौबत उसने आने नहीं दी।
रघुबीर ने कहा कि उसका अपना खेत भी उसी हाल में है।
यह झूठ नहीं था। उसका गेहूँ भी पानी माँग रहा था और उसकी अपनी बारी के बाद अगली बारी बारह दिन बाद आती।
बिंदेश्वरी ने कुछ नहीं कहा और लौट गई।
लौटते हुए वह अपने खेत की तरफ़ से गई, जो सीधा रास्ता नहीं था। रघुबीर ने उसे मेंड़ पर रुकते देखा। वह वहाँ काफ़ी देर खड़ी रही और फिर आगे बढ़ गई। यह देखकर उसे कुछ ख़ास नहीं लगा। ऐसा हर किसान करता है जब उसका खेत सूख रहा हो।
उस रात रघुबीर को नींद नहीं आई और उसकी वजह वह ख़ुद अपने आप को नहीं बता पा रहा था। उसने कोई ग़लत काम नहीं किया था। बारी उसकी थी, काग़ज़ पर लिखी हुई, और गाँव में किसी ने कभी यह नहीं कहा कि अपनी बारी किसी को दे देनी चाहिए।
उसकी पत्नी बचनी ने भी उससे कुछ नहीं कहा, और यह भी उसे खटकता रहा।
तीन बजे वह उठ गया। बचनी सो रही थी।
वह अपने गेट तक गया और उसे खोला नहीं। वह वहाँ से आगे बढ़ा और सत्रह नंबर वाले गेट तक गया, और वह खोल दिया।
पानी बिंदेश्वरी के खेत में जाने लगा।
पानी चलने में आवाज़ होती है। सूखी क्यारी में जब वह पहली बार घुसता है तो मिट्टी उसे पीती है और एक हल्की सी सरसराहट उठती है, और वह आवाज़ आधे घंटे में बंद हो जाती है, जब ज़मीन भर जाती है। रघुबीर ने वह आवाज़ शुरू से आख़िर तक सुनी।
वह वहीं मेंड़ पर बैठा रहा, अँधेरे में, और उसने किसी को नहीं जगाया। उसे यह ठीक नहीं लग रहा था कि कोई उसे यह करते हुए देखे।
छह घंटे बाद जब उजाला हो गया तब बिंदेश्वरी को पता चला। वह भागकर आई और उसने पूछा कि यह किसने किया।
रघुबीर तब तक जा चुका था। किसी ने उसे लौटते नहीं देखा।
उसने अपने खेत में उस चक्कर में पानी नहीं दिया। अगली बारी बारह दिन बाद आई और तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी।
उस साल उसका गेहूँ नौ क्विंटल के बजाय छह क्विंटल निकला।
तौल के दिन उसने पर्चा हाथ में लेकर दो बार पढ़ा। मंडी में उसके बग़ल में खड़े आदमी ने पूछा कि इस बार कम कैसे रह गया, और उसने कहा कि पानी की मार पड़ गई। यह झूठ नहीं था।
तीन क्विंटल का मतलब उस बरस के भाव पर लगभग चार हज़ार रुपये था। उसके घर में उस साल कुछ बड़ा नहीं टूटा, कोई बीमार नहीं पड़ा, इसलिए वह घाटा बिना किसी हादसे के पचा लिया गया, जिस तरह किसान के घर में ऐसे घाटे पचते हैं।
बिंदेश्वरी को यह मालूम हो गया कि गेट किसने खोला था, क्योंकि गाँव में ऐसी बात छिपती नहीं।
उसने रघुबीर से इसका ज़िक्र नहीं किया। एक बार वह उसके घर आई और बचनी को कुछ देकर चली गई, और वह चीज़ इतनी छोटी थी कि उसका ज़िक्र करना दोनों में से किसी को ठीक नहीं लगा।
अगले बरस बारी की सूची वैसी की वैसी रही। रघुबीर पहले नंबर पर था और बिंदेश्वरी सत्रहवें पर।
पंचायत में यह बात नहीं उठी और सूची बदलने की माँग किसी ने नहीं की, ख़ुद रघुबीर ने भी नहीं।
उस बरस की तौल का पर्चा उसने संदूक़ में रख दिया था, बाक़ी बरसों के पर्चों के साथ। उन पर्चों में एक ही पर्चा है जिस पर छह लिखा है, और बाक़ी सब पर आठ या नौ, और वह उन्हें कभी अलग नहीं करता।