रामअवध की दुकान बाज़ार के कोने में थी, जहाँ से पूरी गली दिखती थी। वह सुबह सबसे पहले दुकान खोलता और रात को सबसे बाद में बंद करता। यह मेहनत नहीं थी। मजबूरी थी। कोने की दुकान वही होती है जिसके सामने से हर आदमी दो बार गुज़रता है, और जिसे हर आदमी दो बार देखता है।
उसी दुकान में सरकारी राशन भी बँटता था। महीने की पहली से बीस तारीख़ तक गेहूँ और चावल, और साथ में चीनी और नमक। दो सौ इक्यासी कार्ड उससे जुड़े थे। यह हिस्सा उसकी कमाई का सबसे छोटा और उसके वक़्त का सबसे बड़ा हिस्सा था, और वह इसे इसलिए रखता था कि इससे बाक़ी दुकान पर लोग आते रहते थे।
राशन अब मशीन देती है। कार्ड नंबर डालो, आदमी अँगूठा रखे, मशीन पहचान ले, तब तौल होती है। मशीन में सब कुछ पहले से भरा रहता है और उसमें रामअवध के लिए कोई ख़ाना नहीं है जिसमें वह कुछ लिख सके। जिसका अँगूठा नहीं पढ़ा जाता, उसका अनाज नहीं निकलता। इसमें कोई राय, कोई नरमी, कोई फ़ैसला नहीं है।
ईश्वरी अड़सठ की थी और अकेली रहती थी। उसका नाम सूची में था, कार्ड उसके पास था, और अनाज उसका बनता था। उसका अँगूठा नहीं पढ़ा जाता था। मशीन तीन बार लाल दिखाती और चौथी बार बंद हो जाती।
वजह कोई साज़िश नहीं थी। साठ साल तक ईंट, मिट्टी, गोबर और बर्तन ने उसके अँगूठे की रेखाएँ घिसा दी थीं। हाथ देखने पर वह चिकना लगता है, जैसे किसी ने उसे रगड़कर साफ़ कर दिया हो। यह हर उस औरत के साथ होता है जो चालीस साल मज़दूरी करे, और यह किसी काग़ज़ में दर्ज नहीं होता।
पहले महीने रामअवध ने उसे लौटा दिया, क्योंकि नियम यही था। दूसरे महीने भी। तीसरे महीने ईश्वरी काउंटर के पास बैठ गई और कहा कि वह यहीं बैठी रहेगी। भीड़ लगी और गली से लोग देखने लगे, और कोने की दुकान वही होती है जिसे सब देखते हैं।
उस दिन रामअवध ने वह किया जो पूरे ज़िले में किया जाता है। उसने ईश्वरी के कार्ड पर उसके पड़ोसी का अँगूठा लगवा दिया। अनाज तौलकर उसे दे दिया। मशीन में यह दर्ज हो गया कि ईश्वरी ने ख़ुद लिया।
यह चौंतीस महीने चला।
इन चौंतीस महीनों में उसने यही काम चार और लोगों के लिए किया। एक बूढ़े का हाथ लक़वे से मुड़ा हुआ था। एक आदमी दिल्ली में मज़दूरी करता था और उसका परिवार यहाँ था। दो और थे जिनकी वजहें उतनी ही ठोस थीं। रामअवध ने कभी इसके पैसे नहीं लिए और यह बात गाँव में सब जानते थे।
दिक़्क़त यह है कि रजिस्टर में यह सब एक जैसा दिखता है। जिस दुकान पर एक ही अँगूठे से कई कार्डों का अनाज निकले, वह दुकान चोरी करती हुई दिखती है, चाहे अनाज सही आदमी तक पहुँचा हो। दया और चोरी को अलग करने का कोई ख़ाना उस मशीन में नहीं है, और सच कहा जाए तो किसी मशीन में नहीं है।
जाँच अगस्त में हुई। तीन साल का ब्योरा निकाला गया और उसमें से यह बात अपने आप ऊपर आ गई। रामअवध ने कुछ छिपाया नहीं और सब बता दिया, नाम समेत। जाँच करने वाला अफ़सर उसकी बात मान भी गया। उसने यह भी जोड़ा कि उसे इससे कोई निजी शिकायत नहीं है। फिर उसने लिख दिया कि नियम का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि हुआ था।
लाइसेंस ग्यारह महीने के लिए निलंबित हो गया। इन ग्यारह महीनों में उन दो सौ इक्यासी कार्डों को बग़ल के गाँव की दुकान से जोड़ दिया गया, जो चार किलोमीटर दूर है।
जिनके पास साइकिल थी, वे चले गए। जिनके घर में जवान लड़का था, वे भी। ईश्वरी नहीं जा सकी। अड़सठ साल की औरत चार किलोमीटर जाकर पैंतीस किलो लेकर लौट नहीं सकती, और किराए पर ले जाने में जितना लगता उससे सस्ता बाज़ार से आटा ख़रीदना पड़ता है। उन ग्यारह महीनों में उसे राशन नहीं मिला। एक महीना भी नहीं।
उन ग्यारह महीनों में रामअवध की अपनी दुकान भी बैठ गई। जो लोग राशन लेने आते थे, वे उसी वक़्त तेल, साबुन, बीड़ी और चाय की पत्ती भी ले जाते थे, और महीने के पहले बीस दिन दुकान इसी से चलती थी। अब वे चार किलोमीटर जाते थे और सामान भी वहीं से ले आते थे। बिक्री लगभग आधी रह गई। उसने अपने लड़के को दुकान से हटाकर एक फ़ैक्ट्री में लगा दिया। वह लड़का उसके बाद कभी दुकान पर नहीं लौटा और अब उसका इरादा भी नहीं है।
यह बात रामअवध को पूरी तरह तब समझ आई जब लाइसेंस लौटा और ईश्वरी दोबारा दुकान पर आई। वह पहले से पतली थी। वे ग्यारह महीने जेठ से शुरू होकर अगले वैसाख तक चले थे, यानी उनमें एक पूरी बरसात थी और एक पूरा जाड़ा। जाड़े में अकेली औरत के घर में अनाज न हो तो वह दिन चाय पर निकालती है, और यह किसी को बताया नहीं जाता।
उसके बाद उसने काम नियम से करना शुरू कर दिया, और इसीलिए उसे वह चीज़ ढूँढ़नी पड़ी जो पहले कभी नहीं ढूँढ़ी थी। कार्ड में एक और आदमी का नाम जोड़ा जा सकता है, जो उसी घर का हो, और फिर उसका अँगूठा चलता है। ईश्वरी के नाती का नाम जुड़वाने में ग्यारह महीने और तीन चक्कर लगे। यह रास्ता पहले दिन से था। इसे किसी ने ढूँढ़ा नहीं, क्योंकि रामअवध ने इसकी ज़रूरत ही नहीं पड़ने दी थी।