ठेका इकतालीस हज़ार में तय हुआ था और उसमें सब कुछ शामिल था, माल भी और मज़दूरी भी। मकान दो कमरे का था और वह खुशीराम बनवा रहा था, जिसकी लड़की की शादी अगले जेठ में थी और जो चाहता था कि उससे पहले छत पड़ जाए।

मुख़्तार राजमिस्त्री था और वह उस क़स्बे में सत्रह बरस से काम कर रहा था। उसने ठेका देखकर लिया था। ज़मीन उसने पहले देखी थी, नाप ली थी, और उसका अंदाज़ा था कि उसमें उसे साढ़े छह-सात हज़ार बचेंगे। नींव का गड्ढा दूसरे दिन साढ़े तीन फ़ुट पर पहुँचा।

उसी दिन उसे मिट्टी का रंग बदला हुआ दिखा। ऊपर की मिट्टी भूरी थी, जैसी उस इलाक़े में होती है। साढ़े तीन फ़ुट के नीचे वह काली-सी थी और उसमें ईंट के टुकड़े मिले हुए थे। इसका मतलब एक ही होता है। वहाँ पहले कोई गड्ढा रहा होगा और उसे भरा गया होगा।

मुख़्तार ने खुशीराम से पूछा। खुशीराम ने बताया कि हाँ, वहाँ पहले तालाब का किनारा था और उसे उसके बाप ने भरवाया था, लगभग पैंतीस बरस पहले।

पैंतीस बरस पुराना भराव ऊपर से जमा हुआ लगता है और वह जमा हुआ नहीं होता। उस पर सीधे नींव डालने से मकान बैठता नहीं, वह टेढ़ा बैठता है, और यह दो-तीन बरसात के बाद दीवार में दरार बनकर दिखता है।

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ठीक तरीक़ा यह है कि गड्ढा तब तक खोदा जाए जब तक सख़्त ज़मीन न मिल जाए, और उसके बाद नींव डाली जाए। मुख़्तार ने अंदाज़ा लगाया कि सख़्त ज़मीन सात-आठ फ़ुट पर मिलेगी।

यह अंदाज़ा उसने मिट्टी के रंग और उसमें मिले टुकड़ों से लगाया था। भरे हुए गड्ढे की गहराई का पता तभी चलता है जब खोदते-खोदते नीचे की असली ज़मीन मिल जाए, और उससे पहले हर अंदाज़ा अंदाज़ा ही रहता है। यह भी हो सकता था कि वह दस फ़ुट पर मिलती, और तब ख़र्च और बढ़ता।

इसका मतलब था दुगुनी खुदाई, दुगुना मलबा हटाना, और नींव में लगभग दुगुना माल। उसने रात में हिसाब लगाया। फ़र्क़ सात हज़ार का बैठा। यानी उसका पूरा मुनाफ़ा। दूसरा रास्ता भी था। वह किसी को नहीं दिखता।

साढ़े तीन फ़ुट पर ही नींव डाल दी जाती। मकान खड़ा हो जाता, छत पड़ जाती, शादी हो जाती। दरार तीसरी या चौथी बरसात में आती और तब तक मिस्त्री की ज़िम्मेदारी की कोई बात नहीं रहती। उस क़स्बे में ऐसे मकान थे और सब जानते थे कि वे क्यों बैठे।

मुख़्तार ने खुशीराम को बुलाया और उसे गड्ढे में उतारकर मिट्टी दिखाई। उसने उसे दोनों बातें बताईं। यह भी कि क्या होना चाहिए और यह भी कि क्या हो सकता है। खुशीराम ने पूछा कि इसमें कितना ज़्यादा लगेगा। मुख़्तार ने कहा कि सात हज़ार।

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खुशीराम के पास सात हज़ार नहीं थे। यह साफ़ था। यह उसने कहा नहीं, पर मुख़्तार को दिख गया, क्योंकि उसने पहली किस्त भी उधार लेकर दी थी। मुख़्तार ने कहा कि ठेका इकतालीस का ही रहेगा।

उसने यह कहने से पहले एक रात सोचा था। उसकी पत्नी ने पूछा था कि सात हज़ार कहाँ से आएँगे और उसने कहा था कि जो बचना था वही नहीं बचेगा। उसने यह भी कहा था कि अगर वह अभी दाम बढ़ाएगा तो खुशीराम कहीं और से क़र्ज़ लेगा, और क़र्ज़ उस घर में पहले से चढ़ा हुआ है।

उसने यह एहसान की तरह नहीं कहा। उसने कहा कि उसने ज़मीन देखकर दाम लगाया था और देखने में उससे चूक हुई, और चूक उसकी थी। यह पूरी तरह सच नहीं था। भराव पैंतीस बरस पुराना था और ऊपर से किसी को नहीं दिखता, और उसे देख पाना उसकी ज़िम्मेदारी में नहीं आता।

खुदाई सात फ़ुट नौ इंच पर सख़्त ज़मीन तक पहुँची।

उस दिन मुख़्तार ख़ुद गड्ढे में उतरा और उसने फावड़ा चलाकर देखा। सख़्त ज़मीन की पहचान यह है कि फावड़ा उसमें धँसता नहीं, टकराकर लौटता है, और उसकी आवाज़ बदल जाती है। उसने यह तीन जगह से जाँचा, गड्ढे के तीनों कोनों में, क्योंकि एक जगह से पता नहीं चलता।

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उसमें तीन दिन ज़्यादा लगे और मलबा उठवाने में एक ट्रैक्टर और लगा। मकान उस जेठ से पहले खड़ा हो गया। छत पड़ गई और शादी हो गई, और उसमें सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा होना था। मुख़्तार को उस काम में कुछ नहीं बचा। हिसाब जोड़ने पर उसे चार सौ रुपये का घाटा निकला, जो उसने किसी को नहीं बताया।

उस बरस उसने अपने घर की जो मरम्मत करवानी थी वह टाल दी। खुशीराम ने उसके बाद उसका नाम चार जगह लिया और उनमें से दो जगह काम मिला। यह हिसाब बराबर नहीं होता। दो काम सात हज़ार से ज़्यादा के थे, पर वे तीन बरस में आए, और घाटा उसी बरस लगा था।

वह मकान अब भी वहीं है और उसकी दीवारों में दरार नहीं है। यह किसी को दिखता नहीं, क्योंकि जो चीज़ ठीक बनी हो उसकी तरफ़ कोई देखता नहीं, और नींव तो वैसे भी ज़मीन के नीचे रहती है।