कपड़ा सरस्वती चार साल में जोड़े हुए पैसों से लाई थी।

वह जबलपुर के बड़े बाज़ार से आया था और उसका दाम चार हज़ार दो सौ था। लाल पर सुनहरा काम था और वह उसकी बड़ी बेटी की शादी के लिए था, जो असाढ़ में तय हुई थी।

अफ़रोज़ की दुकान गली के भीतर थी और उसमें एक ही मशीन थी। उसके पास ऐसा काम साल में तीन-चार बार आता था और वह उन्हीं दिनों का इंतज़ार करता था, क्योंकि बाक़ी दिनों में वह सिर्फ़ बच्चों की स्कूल ड्रेस सिलता था।

उसने कपड़ा तीन दिन बिना छुए रखा। यह उसकी आदत थी। वह पहले नाप लेता, फिर काग़ज़ पर ख़ाका बनाता, और उसके बाद ही कैंची उठाता।

चौथे दिन उसने काटा। सुबह की रोशनी में।

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ग़लती कली में हुई। लहँगे में बारह कलियाँ बनती हैं और वे नीचे से चौड़ी होती जाती हैं। उसने चौथी कली काटते वक़्त कपड़े का रुख़ पलट लिया और सुनहरे काम की दिशा उलटी पड़ गई।

यह ग़लती एक कली में हुई और सिर्फ़ एक कली में।

सुनहरे काम का एक रुख़ होता है। बेल एक तरफ़ को चढ़ती है और जब कपड़ा उलट जाता है तो वही बेल नीचे की तरफ़ उतरने लगती है। दूर से यह नहीं दिखता। पास से, और तब जब बाक़ी ग्यारह कलियाँ उसके साथ हों, यह अपने आप आँख में आ जाता है।

उसने उसे मेज़ पर रखकर देखा और उसे पहली नज़र में यह ख़ुद भी नहीं दिखा। दिखा तब जब उसने बाक़ी कलियाँ उसके बग़ल में रखीं।

बचा हुआ कपड़ा इतना नहीं था कि नई कली निकल सके।

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उसने बचा हुआ कपड़ा तीन बार नापा। हर बार वही निकला। साढ़े तीन गज़ चाहिए था और उसके पास एक गज़ नौ गिरह था।

अफ़रोज़ उस रात दुकान बंद करके भी वहीं बैठा रहा।

रास्ता एक था और वह उसे मालूम था। उस कली को पीछे की तरफ़ डाल दिया जाए, जहाँ चुन्नट पड़ती है, और उसके ऊपर से गोटा लगा दिया जाए। पहनने वाली को कभी पता नहीं चलता। शादी में किसी को कभी नहीं दिखता। पाँच-सात बार पहनने के बाद जब गोटा ढीला होता, तब शायद कोई ध्यान देता, और तब तक यह किसी की याद में नहीं रहता कि किसने सिया था।

उसने रात में दो बार गोटा निकालकर उस पर रखकर देखा। दोनों बार वह ढँक गया।

सुबह उसने सरस्वती को बुलवाया।

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उसने उसे कली दिखाई और बताया कि क्या हुआ है। उसने यह नहीं कहा कि कपड़ा ख़राब था या नाप ग़लत मिली थी। उसने कहा कि उससे कट गया।

सरस्वती कुछ देर उसे देखती रही और फिर उसने पूछा कि अब क्या होगा।

उसने ग़ुस्सा नहीं किया और यह अफ़रोज़ के लिए सबसे मुश्किल हिस्सा था। ग़ुस्सा किया जाता तो वह कुछ कह सकता था, माफ़ी माँग सकता था, बात बढ़ सकती थी और फिर उतर सकती थी। उसने बस पूछा कि अब क्या होगा, और इसका जवाब उसे ख़ुद देना था।

"जितना कपड़ा ख़राब हुआ है उतना मैं ला दूँगा।"

उतना कपड़ा तीन सौ पचास रुपये गज़ था और साढ़े तीन गज़ लगना था। बारह सौ पच्चीस रुपये। अफ़रोज़ की उस महीने की कुल कमाई नौ सौ के आसपास बैठती थी।

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सरस्वती ने पैसे नहीं लिए। उसने कहा कि कपड़ा वही लाना पड़ेगा, उसी दुकान से, वरना रंग नहीं मिलेगा।

अफ़रोज़ दो दिन बाद बड़े बाज़ार गया और उसी दुकान से उतना कपड़ा लाया। पैसे उसने अपनी बहन से उधार लिए और वह उधार उसने चौदह महीने में चुकाया।

दुकानदार ने उससे पूछा कि इतना ही क्यों चाहिए, और उसने बता दिया। दुकानदार ने पचास रुपये गज़ कम कर दिए, बिना कहे, और यह उसने किसी दया में नहीं किया। उसने बाद में अपने मुनीम से कहा कि जो आदमी अपनी ग़लती का कपड़ा ख़रीदने आता है वह दोबारा आएगा।

कपड़ा उसने सरस्वती के घर पहुँचा दिया।

लहँगा उसने नहीं सिया। उसे सीने को मिला ही नहीं।

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सरस्वती ने वह काम दूसरे दर्ज़ी को दे दिया और यह उसने अफ़रोज़ के सामने ही तय किया, बिना कुछ बुरा कहे, इस तरह कि उसमें ग़ुस्सा भी नहीं था। उसे बस अब उस पर भरोसा नहीं रहा और उसने इसे छिपाने की कोशिश नहीं की।

शादी असाढ़ में हुई और उसमें अफ़रोज़ नहीं गया, क्योंकि उसे बुलाया नहीं गया।

उस मोहल्ले में यह बात फैली और उससे उसका काम बढ़ा नहीं। जो लोग सुनते थे वे यही कहते थे कि आदमी ईमानदार है, और उसके बाद अपना काम वहीं ले जाते थे जहाँ पहले ले जाते थे।

वह ख़राब कली उसने फेंकी नहीं।

उसने उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लिया और उन्हें अपनी दराज़ में रख लिया। वह उनका इस्तेमाल जेब की भीतरी सिलाई में करता है, जहाँ कपड़ा दिखता नहीं और मज़बूत होना चाहिए।

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उस दराज़ से टुकड़े ख़त्म होने में सात बरस लगे। इन सात बरसों में जबलपुर के उस मोहल्ले में कई बच्चों की स्कूल की क़मीज़ों की जेब भीतर से शादी के रेशम की सिली हुई थी, और उनमें से किसी को यह मालूम नहीं था।