कानपुर की उस मिल में मुनक्का इकतीस बरस काम करके रिटायर हुआ।

आख़िरी दिन उसे मिठाई खिलाई गई और एक फ़ाइल पकड़ा दी गई जिसमें उसके काग़ज़ात थे। पैसा बाद में आना था, जैसे हमेशा आता है।

चेक तीन महीने बाद आया। लिफ़ाफ़ा पतला था।

उसमें दो लाख इक्यावन हज़ार लिखे थे।

मुनक्का ने अपना हिसाब पहले ही लगा रखा था, क्योंकि इकतीस बरस में हर आदमी अपना हिसाब लगा लेता है। उसके मुताबिक़ यह रक़म दो लाख तैंतीस हज़ार के आसपास बैठनी थी।

📚 यह भी पढ़ें औज़ार
औज़ार

अठारह हज़ार ज़्यादा थे।

मिल के हिसाब में इस तरह की ग़लती पकड़ी जाती है, पर तुरंत नहीं। साल के आख़िर में जब ऑडिट होता है तब निकलती है, और तब तक पैसा जा चुका होता है और वसूली की कार्रवाई अलग से चलती है। मुनक्का को यह मालूम था क्योंकि उसके साथ काम करने वाले एक आदमी के साथ यही हो चुका था, तेरह बरस पहले, और उस आदमी को पैसा किश्तों में लौटाना पड़ा था।

वह पहले तीन दिन इसी में लगा रहा कि उसका अपना हिसाब ग़लत होगा। उसने दो बार जोड़ा। उसने अपने साथ रिटायर हुए एक आदमी से पूछा, जिसकी नौकरी उसी बरस की थी और जिसका पैसा दो लाख तीस हज़ार आया था।

फ़र्क़ साफ़ था। हिसाब ग़लत उसका नहीं था।

अठारह हज़ार उस वक़्त उसके लिए क्या थे, यह बताने के लिए इतना काफ़ी है कि उसकी छोटी लड़की की शादी में उसे पैंतीस हज़ार का इंतज़ाम करना था और उसके पास वह इंतज़ाम नहीं था।

📚 यह भी पढ़ें कैंची
कैंची

वह चौथे दिन दफ़्तर गया।

जाने से पहले उसने अपनी पत्नी को बता दिया। उसने कहा कि पैसा ज़्यादा आया है और वह वापस करने जा रहा है। उसकी पत्नी ने उसे रोका नहीं और उसने यह भी नहीं कहा कि अच्छा कर रहे हो। उसने सिर्फ़ इतना पूछा कि शादी का क्या होगा, और मुनक्का ने कहा कि देखा जाएगा, जो कोई जवाब नहीं था और दोनों को यह मालूम था।

दफ़्तर में उससे किसी ने कुछ नहीं पूछा। मिल के हिसाब का काम एक ही आदमी देखता था, इम्तियाज़, जो पैंतालीस के आसपास का था और जो पिछले दो बरस से अकेला यह सब सँभाल रहा था, क्योंकि उसके साथ वाले की जगह किसी को रखा नहीं गया था।

मुनक्का ने उससे यह नहीं कहा कि पैसा ज़्यादा आया है।

उसने इतना पूछा कि उसका हिसाब कैसे बना है।

📚 यह भी पढ़ें चश्मा
चश्मा

इम्तियाज़ ने फ़ाइल निकाली और उसे दिखाया, और दिखाते-दिखाते वह ख़ुद रुक गया।

ग़लती ग्रेच्युटी में थी। उसने बरसों की जगह महीने ले लिए थे, एक जगह, और आगे का पूरा जोड़ उसी पर खड़ा था।

इम्तियाज़ का चेहरा उतर गया और उसने दरवाज़े की तरफ़ देखा।

यह ग़लती अगर ऊपर जाती तो उसकी नौकरी जाती। मिल पहले ही घाटे में थी और वहाँ आदमी हटाने के बहाने ढूँढ़े जा रहे थे।

मुनक्का ने उससे कहा कि वह पैसा वापस करेगा।

📚 यह भी पढ़ें औज़ार
औज़ार

इम्तियाज़ ने कहा कि वापस करने का मतलब है कि लिखित में जाएगा, और लिखित में जाते ही यह उसके सिर पर आ जाएगा।

दोनों उस दिन कुछ तय नहीं कर पाए।

मुनक्का ने अगले हफ़्ते जो किया वह यह था।

उसने इस पर पूरा हफ़्ता सोचा। सीधा रास्ता यह था कि वह चेक लेकर दफ़्तर जाता और लिखकर देता कि रक़म ज़्यादा है। इसमें कुछ भी ग़लत नहीं था और यही ठीक भी था। दिक़्क़त सिर्फ़ यह थी कि इस रास्ते के आख़िर में एक आदमी की नौकरी खड़ी थी जिसने चोरी नहीं की थी, जिसने जोड़ में ग़लती की थी, और जो दो आदमियों का काम अकेले कर रहा था।

उसने अठारह हज़ार निकाले और उन्हें मिल के उस कोष में जमा करा दिया जो मज़दूरों के बच्चों की फ़ीस के लिए चलता था। रसीद उसके अपने नाम की कटी और उसमें दान लिखा गया।

📚 यह भी पढ़ें कैंची
कैंची

यह चोरी छिपाना नहीं था और यह पूरी ईमानदारी भी नहीं थी। पैसा मिल के पास वापस चला गया और वह इसी बात पर टिका था कि जिस मद में गया वह मिल का ही था।

मुनक्का ने यह इम्तियाज़ को नहीं बताया।

उसे इसका पता तब चला जब साल के आख़िर में कोष का हिसाब दीवार पर लगा और उसमें एक नाम था जिसके सामने अठारह हज़ार लिखा था।

वह उसी शाम मुनक्का के घर गया और उसने कुछ कहा नहीं। वह बैठा रहा, चाय पी, और चला गया। जाते हुए उसने दरवाज़े पर रुककर पीछे देखा और फिर भी कुछ नहीं कहा।

लड़की की शादी में पैंतीस हज़ार का इंतज़ाम मुनक्का ने अपनी बड़ी लड़की के यहाँ से उधार लेकर किया और वह उधार उसने दो बरस में चुकाया।

📚 यह भी पढ़ें चश्मा
चश्मा

इम्तियाज़ मिल में और चार साल रहा और उसके बाद मिल बंद हो गई, और उस बंद होने का इस बात से कोई ताल्लुक़ नहीं था।

वह रसीद मुनक्का के पास रही। वह उसे किसी को दिखाता नहीं था और उसने उसे उसी फ़ाइल में रख दिया था जिसमें उसके इकतीस बरस के काग़ज़ात थे, और वह फ़ाइल अलमारी के ऊपर वाले ख़ाने में रहती थी।