लोकनाथ ठेकेदार था और उसके पास एक लोहे का बक्सा था जिसमें साइट के औज़ार रहते थे। उसमें दो बसूलियाँ थीं, एक साहुल, दो हथौड़े, बरमे का सेट, और एक लेवल, जो सबसे महँगी चीज़ थी और जो तीन हज़ार की आई थी।
बक्सा शाम को बंद होता था और चाबी लोकनाथ के पास रहती थी। उस दिन सुबह बक्सा खुला मिला और उसमें से लेवल और बरमे का सेट ग़ायब था। साइट पर उस वक़्त नौ मज़दूर थे। शक गनौरी पर गया। पहले घंटे में।
इसकी वजह कोई सुबूत नहीं था। वजह यह थी कि वह उन नौ में इकलौता था जो बाहर से आया था, बाक़ी आठ उसी गाँव के थे, और उसकी झोंपड़ी साइट के सबसे पास थी। लोकनाथ ने उससे पूछा। गनौरी ने मना किया। एक ही बार।
लोकनाथ ने उसकी झोंपड़ी देखी, उसकी गठरी खुलवाई, और उसका बिस्तर उठाकर देखा। कुछ नहीं मिला। फिर भी उसने उसे हटा दिया।
उसने यह इस तरह किया कि उस पर उँगली न उठे। उसने कहा कि इस हफ़्ते काम कम है और अगले हफ़्ते बुला लेगा, और अगले हफ़्ते उसने नहीं बुलाया। यह बात उस मोहल्ले में फैल गई और उसके फैलने में लोकनाथ का हाथ था। उसने दो-तीन जगह यह कहा कि आदमी ठीक नहीं है।
गनौरी को उसके बाद उस इलाक़े में काम नहीं मिला।
मज़दूरी में नाम ही सब कुछ होता है। मिस्त्री और ठेकेदार एक-दूसरे को जानते हैं और किसी आदमी के बारे में एक बार कह दी गई बात पूरे क़स्बे में तीन दिन में पहुँच जाती है। गनौरी छह जगह गया और छहों जगह उसे यही सुनने को मिला कि अभी काम नहीं है, हालाँकि तीन जगह पर उसी दिन नए आदमी रखे गए थे।
वह डेढ़ महीने बैठा रहा और फिर वह अपने गाँव लौट गया, जो बलिया की तरफ़ था, और वहाँ मज़दूरी दो-तिहाई मिलती थी। तीन महीने बाद लोकनाथ के घर की छत की मरम्मत होनी थी। उसने अपने घर का पुराना सामान निकाला और उसमें एक बोरा था जिसमें बरसात में साइट का सामान भरकर लाया गया था।
बोरे में लेवल था। बरमे का सेट भी। दोनों उसी कपड़े में लिपटे हुए थे जिसमें उसने ख़ुद लपेटे थे।
उसे यह याद आया। उस दिन शाम को पानी आ गया था और उसने ख़ुद जल्दी में ये दो चीज़ें बक्से से निकालकर बोरे में डाली थीं और बोरा घर भिजवा दिया था, ताकि लोहा भीगे नहीं। बक्सा उसने बंद करना भूल गया था और सुबह उसे खुला देखकर उसने यह मान लिया था कि चोरी हुई है।
यह उसके सामने था और इसे कोई नहीं जानता था। वह उस बोरे को वापस रख सकता था। इसमें कोई ख़तरा नहीं था। तीन महीने हो चुके थे, गनौरी जा चुका था, और साइट पर किसी को यह याद भी नहीं था।
लोकनाथ ने अगले दिन मज़दूरों को इकट्ठा किया।
उसने नौ आदमियों के सामने कहा कि औज़ार चोरी नहीं हुए थे, कि वे उसके अपने घर में थे, और कि वह ख़ुद उन्हें ले गया था और भूल गया था। उसने यह कहते वक़्त कोई सफ़ाई नहीं दी और उसने बरसात वाली बात भी नहीं बताई, क्योंकि वह वजह जैसी लगती।
फिर उसने कहा कि गनौरी का नाम उसने ख़राब किया है और वह उसे ठीक करेगा। मोहल्ले में यह बात भी फैली और इस बार भी फैलाने वाला वही था। इससे लोकनाथ को नुक़सान हुआ।
यह नुक़सान उसने पहले से सोचा नहीं था। उसने यह मानकर बात कही थी कि ग़लती मान लेने पर लोग उसकी बात की क़दर करेंगे, और कुछ लोगों ने की भी। पर ठेकेदारी में जो चीज़ याद रह जाती है वह यह नहीं होती कि आदमी ने ग़लती मानी, बल्कि यह होती है कि उसने ग़लती की थी।
दो जगह उसका ठेका इसीलिए नहीं मिला। यह उसे सीधे नहीं बताया गया, पर जिन्हें मिला वे उससे सस्ते नहीं थे। ठेकेदारी में आदमी की बात पर भरोसा ही पूँजी होती है और उसने अपने बारे में ख़ुद यह कहा था कि उसने बिना देखे एक आदमी को चोर कहा।
उसने गनौरी को बुलवाया। गनौरी नहीं आया। कोई जवाब भी नहीं भेजा। उसने पैसे भेजे, डेढ़ महीने की मज़दूरी के बराबर। वह वापस नहीं आए और उन्हें लौटाया भी नहीं गया।
अगले बरस गनौरी उसी इलाक़े में दिखा, किसी और की साइट पर। लोकनाथ उससे मिलने गया और उसने बात करनी चाही। गनौरी ने दुआ-सलाम किया और काम पर लौट गया, और उसने न बुरा कहा, न बैठने को कहा।
लोकनाथ वहाँ कुछ देर खड़ा रहा और फिर लौट आया। रास्ते में उसने यह सोचा कि उसने जो किया वह ठीक था और उससे किसी का कुछ ठीक नहीं हुआ, और ये दोनों बातें उसके भीतर साथ-साथ चलती रहीं।
वह लेवल लोकनाथ ने उसके बाद इस्तेमाल नहीं किया। उसने नई ख़रीद ली और पुरानी बक्से में सबसे नीचे पड़ी रही, और साइट के लड़के जब उसे निकालते थे तो वह उन्हें दूसरी वाली उठाने को कह देता था।