अंशुल के पास एक ही चीज़ थी जिस पर उसे घमंड था, और वह उसका काम था। वह किसी भी हालत में कोताही नहीं करता था। नतीजा यह था कि उसे काम मिलता देर से था और ख़त्म करने में वक़्त ज़्यादा लगता था। लोग सस्ता और जल्दी चाहते थे। अंशुल दोनों नहीं दे पाता था, और उसने इसके लिए अपना तरीक़ा बदलने से साफ़ मना कर दिया था।

उसका काम घरों की बिजली का था। हरदोई में यह काम करने वाले बहुत हैं और सब एक जैसा करते हैं, सिवाय एक चीज़ के। अंशुल हर मकान में अर्थिंग का गड्ढा बनवाता था। छह फ़ुट गहरा, उसमें जीआई का पाइप, पाइप के चारों तरफ़ नमक और कोयले की बारी-बारी तहें, ऊपर ईंटों का चेंबर और लोहे का ढक्कन।

इसमें एक दिन लगता था और लगभग तीन हज़ार रुपये। बाक़ी लोग यह नहीं करते। वे तीसरा तार दीवार में डाल देते हैं और उसे नल की पाइप से बाँध देते हैं, या कहीं नहीं बाँधते। इससे बत्ती जलती है। पंखा चलता है। टीवी चलता है। अर्थिंग सामान्य दिनों के लिए होती भी नहीं है।

जब दो कमरे के मकान का पूरा हिसाब बनता था तो अंशुल का ख़र्च दूसरों से चार-साढ़े चार हज़ार ऊपर बैठता था। लोग काग़ज़ देखते और वही एक बात कहते। 'भाई साहब, सब ऐसे ही तो करवाते हैं।' यह बात सच थी। अंशुल इसे पंद्रह सेकंड में नहीं समझा सकता था, और लोग पंद्रह सेकंड ही देते थे।

बस अड्डे के पीछे उसकी एक किराए की कोठरी थी जिसमें तार, बोर्ड, पाइप और एक टेबल रहती थी। एक लड़का उसके साथ काम करता था। बैंक में जो पैसा जमा हो रहा था वह एक दुकान के लिए था, गल्ला मंडी वाली सड़क पर, जिसका मालिक बेचने को तैयार था और जिसने दो साल का वक़्त दे रखा था।

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सतीश ने चौबीस फ़्लैट का नक़्शा पास कराया था, स्टेशन रोड के पीछे। अंशुल ने उसके शोरूम की बिजली पिछले साल की थी। वह काम अच्छा हुआ था। इस बार सतीश ने उसे ख़ुद बुलाया। चार लाख दस हज़ार का काम था और तीन महीने का। अंशुल ने अपनी ज़िंदगी में इतने का एक काम कभी नहीं किया था।

सुपरवाइज़र ने पैकेज बताया, जैसे वह मौसम बता रहा हो। पूरी इमारत के लिए एक अर्थिंग। सब-सर्किट में ऐल्युमिनियम का तार। जहाँ डेढ़ मिलीमीटर चाहिए वहाँ एक। उसने यह छिपाकर नहीं कहा, क्योंकि छिपाने वाली बात नहीं थी। शहर की हर नई इमारत ऐसे ही बनी हुई थी और इस पर कभी कोई सवाल नहीं उठा था।

अंशुल ने अपना हिसाब बनाकर दिया। हर फ़्लैट का अपना अर्थ, तांबे का तार, और पैंतालीस हज़ार ज़्यादा। सतीश ने काग़ज़ पढ़ा और कहा कि ख़रीदार तार नहीं देखता, वह टाइल देखता है और लिफ़्ट देखता है। फिर उसने कहा कि आधा-आधा कर लेते हैं, नीचे के बारह फ़्लैट तुम्हारे तरीक़े से। अंशुल ने पूछा कि ऊपर के बारह में कौन रहेगा।

बात यहीं ख़त्म हो गई। अंशुल ने काम नहीं लिया।

काम किसी और को मिल गया, यह उसे मालूम था और इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। फ़र्क़ इससे पड़ा कि शोरूम वाले काम के एक लाख चालीस हज़ार अभी बाक़ी थे। वह पैसा मना नहीं किया गया। उसे बस अगले हफ़्ते पर टाल दिया गया, और फिर अगले हफ़्ते पर, और यह चौदह महीने चला।

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इस पैसे के लिए कुछ किया जा सकता था और अंशुल ने हर चीज़ के बारे में सोचा। मुक़दमा तीन साल चलता और वकील का ख़र्च उसी पैसे में से जाता। थाने वाला दीवानी मामला कहकर लौटा देता। पंचायत बैठाता तो पूरे शहर के ठेकेदारों को पता चल जाता कि वह पैसे के लिए लड़ता है। उसने कुछ नहीं किया।

दुकान नहीं ख़रीदी गई। मालिक ने दो साल पूरे होने पर उसे किसी और को दे दी, बिना नाराज़गी के, क्योंकि उसने भी दो साल इंतज़ार किया था। साथ काम करने वाला लड़का उसी सर्दी में उसे छोड़कर उसी ठेकेदार के पास चला गया जिसने चौबीस फ़्लैट किए थे, और वहाँ उसे डेढ़ गुना मिलने लगा। जाते हुए वह मिलकर गया।

अंशुल का काम चलता रहा। दो कमरे, तीन कमरे, एक डेयरी, एक कोचिंग, दो मंज़िल का एक मकान जिसमें आठ साल में तीन बार कुछ न कुछ जुड़ा। पंद्रह-बीस हज़ार महीने का काम। वह अकेले करता था, इसलिए धीरे करता था, और इसलिए और भी कम काम आता था। इसमें नया कुछ नहीं था। पहले पन्ने पर यही लिखा है।

जून में वह हर साल एक चक्कर लगाता है। गर्मी में गड्ढे की मिट्टी सूख जाती है और सूखी मिट्टी करंट को ज़मीन तक नहीं ले जाती, इसलिए साल में एक बार ढक्कन उठाकर उसमें पानी डालना पड़ता है। यह मेहरबानी नहीं है, काम का हिस्सा है, और वह इसके सौ रुपये लेता है। चौरासी घरों की सूची है और चार-पाँच दिन लगते हैं।

इस बार एक घर में वह ढक्कन नहीं मिला। मालिक ने आँगन ढँककर कमरा बना लिया था और फ़र्श पर चिकनी टाइल लगवा दी थी, और गड्ढा उसी के नीचे कहीं था। अंशुल ने उसे बताया कि इससे क्या होगा और कितने साल में होगा। मालिक ने कहा कि ग्यारह साल हो गए, आज तक कुछ नहीं हुआ। यह सच था। अंशुल बाल्टी लेकर बाहर निकला, अगले घर गया, वहाँ का ढक्कन उठाया और उसमें दो बाल्टी पानी डाल दिया।