स्क्रीन बदलने के लिए फ़ोन चालू करना पड़ता है। हर बार। यही उस काम की सबसे बड़ी बात है और यही सबसे बड़ी दिक़्क़त। आफ़ताब की दुकान बस अड्डे के पीछे वाली गली में थी। छह फ़ुट चौड़ी, एक काउंटर, और पीछे दीवार पर पुर्ज़ों के डिब्बे।

काम में ग्राहक का पासकोड चाहिए होता है।

स्क्रीन लगाने के बाद उसे जाँचना पड़ता है। छूकर देखो कि हर कोना काम कर रहा है, रंग ठीक आ रहे हैं, और उँगली फिराने पर लकीर नहीं आ रही। यह बिना फ़ोन खोले नहीं होता। इसलिए ग्राहक कोड बता जाता है। और चला जाता है।

पूरे इलाक़े का यही तरीक़ा है और उसी पर वह धंधा टिका हुआ है। उसने यह उन्नीस की उम्र में सीखा था। अब वह सत्ताईस का था। उसका उस्ताद उससे बस एक ही बात कहता था, बार-बार, और वह भी काम की तरह कहता था, नसीहत की तरह नहीं।

जो चीज़ ठीक करते वक़्त दिख जाए, वह तुम्हारी नहीं होती। जुलाई की उस दोपहर बारिश तेज़ थी और दुकान पर तीन फ़ोन पड़े थे। उनमें से एक बड़ी स्क्रीन वाला था और उसका मालिक शहर की तरफ़ का था। स्क्रीन नीचे से चटकी हुई थी और उसे बदलने में डेढ़ घंटा लगता।

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आफ़ताब ने काम पूरा करके उसे जाँचना शुरू किया। जाँचने का तरीक़ा भी तय है। फ़ोटो वाला हिस्सा खोलो, क्योंकि उसमें रंग सबसे ज़्यादा होते हैं और खोट पकड़ में आती है। उसने खोला। पहली ही तस्वीर काग़ज़ की थी। दूसरी भी।

फ़ोन में तस्वीरें उलटी तरतीब में आती हैं और सबसे नई सबसे ऊपर। उस आदमी ने पिछले दो दिन में काग़ज़ों की चौदह तस्वीरें ली थीं। आफ़ताब ने उन्हें देखा नहीं। उसने उँगली फिराकर आगे बढ़ाना शुरू किया, जो उसे करना ही था।

और तीसरी में एक नाम दिख गया। वह नाम उसके अपने ननिहाल का था।

उसकी माँ का घर मऊ की तरफ़ था और वहाँ पौने चार बीघे ज़मीन थी, जो उसके नाना के नाम थी। नाना के जाने के बाद वह ज़मीन उसकी माँ और उसके मामा के बीच बँटनी थी। वह बँटी नहीं थी। आज तक नहीं।

मामा ने कहा था कि नाना ने अपने जीते जी उसे लिख दिया था और काग़ज़ उसके पास है, और उसने वह काग़ज़ आज तक किसी को दिखाया नहीं था। मुक़दमा तीन बरस से चल रहा था। और चलता ही जा रहा था।

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उसमें आफ़ताब की माँ की तरफ़ से कोई काग़ज़ नहीं था और उनके वकील ने उन्हें दो बार कह दिया था कि बिना कुछ हाथ में आए यह मुक़दमा नहीं चलेगा। जो तस्वीरें उस फ़ोन में थीं, वे मऊ की तहसील के काग़ज़ों की थीं।

फ़ोन का मालिक कौन था, यह आफ़ताब को नहीं मालूम था। हो सकता है वह उस काम में लगा कोई आदमी हो, हो सकता है वकील का मुंशी हो, हो सकता है कुछ भी हो। इससे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता था।

फ़र्क़ इस बात से पड़ता था कि उन चौदह तस्वीरों को दो मिनट में उसके अपने फ़ोन में डाला जा सकता था और किसी को कभी पता नहीं चलता। पता चलने का रास्ता ही नहीं था। एक भी नहीं।

फ़ोन में यह नहीं लिखा जाता कि किसने क्या देखा। और अगर बाद में वे काग़ज़ अदालत में आ भी जाते, तो कोई यह जोड़कर नहीं देखता कि उन्हें किसी दुकान में स्क्रीन बदलते वक़्त उठाया गया था। आफ़ताब ने उँगली रोक ली। वहीं की वहीं।

उसने वह हिस्सा बंद किया, बाहर आया, और स्क्रीन की बाक़ी जाँच बिना तस्वीरों के की, दूसरे तरीक़े से, जिसमें दुगना वक़्त लगता है और जो वह सिर्फ़ तब करता था जब ग्राहक सामने खड़ा हो। शाम को वह आदमी आया। फ़ोन लेकर चला गया।

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आफ़ताब ने उससे कुछ नहीं कहा और उसे शायद यह भी नहीं मालूम कि उसके फ़ोन में क्या था और वह किसकी दुकान पर रह गया था। मुक़दमा उसी बरस दिसंबर में ख़ारिज हो गया। पूरा। ज़मीन मामा के पास रह गई और उसके बाद माँ ने मामा के घर जाना बंद कर दिया।

इस पूरे मामले में सबसे भारी हिस्सा वह था जो आफ़ताब को बाद में झेलना पड़ा। उसकी माँ ने उससे कई बार कहा कि तू शहर में रहता है, तेरे पास इतने लोग आते हैं, तू कुछ नहीं कर सका।

वह हर बार चुप रह गया। हर एक बार।

बता देना उसके लिए और भी बुरा होता, क्योंकि तब बताना ही काफ़ी नहीं रह जाता। तब माँ पूछती कि जब दिख ही गया था तो उठाया क्यों नहीं, और उस सवाल का जवाब उसके पास ऐसा नहीं था जो उस वक़्त उस औरत के काम आता।

दुकान आज भी उसी गली में है।

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एक बात वहाँ बदल गई है। अब वह ग्राहक से कोड नहीं पूछता। स्क्रीन लगाने के बाद वह ग्राहक को बुलाता है और उससे कहता है कि आप ख़ुद खोलिए, और जाँच उसके सामने करता है। इसमें हर काम में दस-पंद्रह मिनट ज़्यादा लगते हैं और कुछ ग्राहक इंतज़ार नहीं करते, और उनमें से कई सामने वाली दुकान पर चले जाते हैं, जहाँ कोड पूछ लिया जाता है और काम शाम तक हो जाता है।