सोनामती का नाम किसी सूची में नहीं था। यह बात दुकान पर आठ बरस से सबको मालूम थी। घनश्याम की राशन की दुकान गाँव के बीच में थी और उससे चार सौ छब्बीस परिवार बँधे हुए थे।
दुकान उसके बाप की थी।
बाप के वक़्त हिसाब हाथ का था। कार्ड देखो, रजिस्टर में लिखो, दस्तख़त या अँगूठा लो, अनाज तौलकर दे दो। उसमें गुंजाइश रहती थी और उसी गुंजाइश में सोनामती चलती आई थी। उसकी हालत वही थी जो सैकड़ों औरतों की होती है, और जिसके बारे में कोई अलग से नहीं सोचता, क्योंकि वह बहुत आम है।
शादी होकर वह उस गाँव में आई थी और उसका नाम मायके के कार्ड से कट गया था और ससुराल के कार्ड में चढ़ा नहीं था। आदमी सात बरस पहले गुज़र गया और उसके बाद ससुराल वालों ने कार्ड अपने पास रख लिया।
काग़ज़ की दुनिया में वह कहीं नहीं थी। घनश्याम का बाप उसे हर महीने पाँच किलो दे देता था। वह उसे बाक़ी लोगों के हिसाब में से निकालता था, थोड़ा-थोड़ा करके, जो हर दुकान में होता है। बाप के जाने के बाद घनश्याम ने भी वही किया।
फिर मशीन आ गई।
अब कार्ड नहीं, अँगूठा चलता है। जिसका नाम सूची में है, उसी का अँगूठा पकड़ में आता है, और जितना उसके नाम पर है उतना ही निकलता है। मशीन में जो दर्ज नहीं है, वह उस दुकान में मौजूद ही नहीं है।
फिर भी घनश्याम दो बरस चलाता रहा।
तरीक़ा गंदा था और उसे मालूम था। वह किसी बड़े परिवार के नाम पर पूरा उठाता और उसमें से पाँच किलो अलग रख देता, और वह परिवार भी जानता था और चुप रहता था, क्योंकि गाँव में सब सोनामती को जानते थे।
जून में जाँच बैठ गई। बरसात में ऐसी जाँचें अक्सर बैठती हैं, क्योंकि उन्हीं महीनों में अनाज सबसे ज़्यादा उठता है और सबसे ज़्यादा शिकायतें आती हैं। पूरे ब्लॉक में बैठी थी और उसकी वजह भी सही थी, क्योंकि दो दुकानों पर सचमुच की चोरी पकड़ी गई थी।
जाँच का तरीक़ा सीधा है। मशीन का हिसाब उठाओ और दस-बीस घरों में जाकर पूछो कि उन्हें कितना मिला।
इसमें घनश्याम कहीं नहीं बचता।
जिस परिवार के नाम पर वह उठा रहा था, उसे पाँच किलो कम मिल रहा था, और अगर उस घर से यह निकल जाता, तो जाँच में यही दर्ज होता कि दुकानदार कम तौल रहा है। लाइसेंस उसी दिन जाता।
लाइसेंस जाने का मतलब सिर्फ़ उसका नुक़सान नहीं था। उस गाँव में दूसरी दुकान नहीं थी। सबसे पास वाली सात किलोमीटर दूर थी और उसके लिए बस पकड़नी पड़ती। चार सौ छब्बीस परिवार, हर महीने, सात किलोमीटर। घनश्याम ने जून में सोनामती को अनाज नहीं दिया।
उसने उससे बात भी की और सब बता भी दिया, और उसने कहा भी कि यह हमेशा के लिए नहीं है। यह कहना आसान था और उससे उसका पेट नहीं भरा। जून, जुलाई, अगस्त। तीन महीने।
उन तीन महीनों में वह पड़ोस के घरों से और खेत की मज़दूरी से चलती रही, और बरसात में मज़दूरी होती नहीं, इसलिए ज़्यादातर पड़ोस से ही चली। अगस्त में वह दो हफ़्ते बीमार भी रही और उसका इलाज नहीं हुआ।
घनश्याम ने उन तीन महीनों में दूसरा काम किया। उसने अपनी दुकान बीच में बंद करके, चार बार, उसे साथ लेकर ब्लॉक का चक्कर लगाया। पहली बार में पता चला कि नया कार्ड बनवाने के लिए ससुराल वाले कार्ड से नाम कटवाना पड़ेगा, और वह काग़ज़ ससुराल वाले नहीं देंगे।
दूसरी बार में पता चला कि अकेली औरत के लिए अलग रास्ता है, पर उसमें आदमी का मृत्यु प्रमाणपत्र चाहिए, जो सात बरस पहले किसी ने बनवाया ही नहीं था। तीसरी बार वह प्रमाणपत्र बनवाने में गई और उसमें पंचायत से लिखवाना पड़ा।
चौथी बार कार्ड बना। उसमें भी नाम की एक मात्रा ग़लत चढ़ी थी, जिसे ठीक कराने में और दो हफ़्ते लगे।
इन चारों चक्करों का किराया, फ़ोटो का ख़र्च और बीच में लगे दो सौ रुपये घनश्याम की जेब से गए, और उसने यह किसी को नहीं बताया, ख़ास तौर पर सोनामती को नहीं। कार्ड सितंबर में चालू हुआ। पहली बार जब वह अनाज लेने आई, तो मशीन ने उसका अँगूठा नहीं पकड़ा।
यह भी आम बात है। जो औरत तीस बरस से मिट्टी और पानी में काम कर रही हो, उसके अँगूठे की लकीरें घिस जाती हैं। मशीन घिसे हुए अँगूठे को नहीं पहचानती। आठ बार में नहीं पकड़ा। नौवीं बार में पकड़ा।
उस दिन के बाद घनश्याम ने काउंटर पर एक कटोरी रखनी शुरू कर दी।
उसमें पानी रहता है। जिसका अँगूठा न पकड़े, वह उसमें उँगली डुबोकर, कपड़े से पोंछकर, दोबारा लगाता है, और गीली चमड़ी पर लकीरें थोड़ी उभर आती हैं और मशीन कई बार पकड़ लेती है। यह उसका अपना तरीक़ा नहीं है और यह हर पुरानी दुकान पर होता है।
उस दुकान पर वह कटोरी सितंबर से पहले नहीं थी। अब वह तराज़ू के बग़ल में रहती है और घनश्याम उसका पानी हर सुबह बदलता है, और महीने की पहली तारीख़ों में, जब भीड़ रहती है, वह दिन में तीन बार बदलना पड़ता है।