बैठक हर महीने की चार तारीख़ को होती थी और उस दिन बाहर पानी टूटकर पड़ रहा था। केरल में मानसून जून के पहले हफ़्ते में ही बैठ जाता है और उसके बाद हफ़्तों तक धूप का एक टुकड़ा नहीं दिखता।

बारह में से ग्यारह औरतें आ चुकी थीं। समूह बारह बरस पुराना था। हर महीने हर औरत सौ रुपये डालती थी, और उसी जमा के बल पर बैंक से क़र्ज़ मिलता था, जो बारी-बारी से बँटता था। क़र्ज़ किसी एक के नाम पर होता था और ज़िम्मेदारी बारहों की होती थी।

यही उस पूरी व्यवस्था की जड़ है। बैंक अकेली औरत को नहीं देता, समूह को देता है। एक न चुकाए तो बाक़ी को भरना पड़ता है, और न भरें तो समूह का नाम काली सूची में चला जाता है और उसके बाद उस गाँव की किसी औरत को कहीं से कुछ नहीं मिलता।

मरियम का क़र्ज़ छब्बीस हज़ार का था।

वह पैसा उसने चार महीने पहले लिया था, सिलाई की मशीन और कपड़े के लिए। मशीन आई भी थी और दो महीने चली भी थी। उसने बच्चों के स्कूल की ड्रेस के आठ ऑर्डर भी पकड़ लिए थे, क्योंकि जून में स्कूल खुलते हैं और उन दिनों सिलाई वालों के पास सबसे ज़्यादा काम होता है।

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फिर उसका आदमी बाक़ी पैसा लेकर चला गया।

यह पहली बार नहीं था। इससे पहले भी वह दो बार जा चुका था, और दोनों बार लौट आया था। इस बार तीन महीने हो चुके थे और मशीन भी बिक चुकी थी। मरियम उस दिन बैठक में नहीं आई थी।

बात एलियम्मा ने शुरू की।

उसका कहना साफ़ था। नियम बना हुआ है और वह सबने मिलकर बनाया है। जो लगातार तीन किस्तें न भरे, उसका नाम समूह से काट दिया जाएगा और उसकी बक़ाया रक़म बैंक को लिखकर बता दी जाएगी। लिखकर बता देने का मतलब गाँव में सब जानते थे। उसके बाद वसूली वाले आते हैं और वे दरवाज़े पर आते हैं।

बाक़ी नौ ने सिर हिलाया। किसी ने बहस नहीं की।

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उनकी बात भी ग़लत नहीं थी। छब्बीस हज़ार ग्यारह औरतों में बाँटा जाए तो हर एक के हिस्से में तेईस सौ आते हैं, और उनमें से किसी के पास तेईस सौ ख़ाली नहीं पड़े थे। जानम्मा अध्यक्ष थी और वह अब तक कुछ नहीं बोली थी।

समूह की बैठक में एक ही कुर्सी होती है। बाक़ी सब बरामदे में चटाई पर बैठती हैं और अध्यक्ष कुर्सी पर बैठती है, क्योंकि रजिस्टर उसी के सामने रहता है। यह छोटी बात है, पर उस गाँव में कुर्सी पर बैठने वाली औरतें बहुत नहीं हैं।

जानम्मा नौ बरस से उसी कुर्सी पर बैठ रही थी। उसका आदमी मछली की नाव पर था और साल में आठ महीने बाहर रहता था, और गाँव में उसे लोग समूह वाली अध्यक्ष कहकर बुलाते थे, अपने नाम से नहीं।

उसने पहले यह कहा कि दो महीने और देख लेते हैं। इस पर बहस हुई और बहस में वह हार गई, क्योंकि गिनती नौ की थी। फिर उसने वह कहा जो किसी को मालूम नहीं था। 'दो हज़ार तीन में जो पैसा मैंने लिया था, वह चौदह महीने तक बक़ाया रहा था।'

बरामदे में कोई नहीं हिला। 'तब समूह में सात औरतें थीं और यह नियम नहीं बना था। बना होता तो मैं उसी बरस बाहर हो जाती।'

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एलियम्मा ने पूछा कि चुकाया कैसे।

'सत्रहवें महीने चुकाया। पूरा चुकाया, ब्याज समेत। पर चौदह महीने नहीं चुकाया, और उन चौदह महीनों में मुझे किसी ने बाहर नहीं किया।' फिर उसने रजिस्टर के पुराने बंडल में से दो हज़ार तीन वाली किताब निकालकर बीच में रख दी।

उसमें वह सब लिखा था, हर छूटी हुई किस्त के आगे ख़ाली जगह, और उन्हीं पन्नों पर उसके अपने दस्तख़त थे, क्योंकि रजिस्टर तब भी उसी के पास था। किसी ने उसे उठाकर नहीं देखा। किताब बीच में खुली पड़ी रही और उस पर बाहर की छींटें पड़ती रहीं।

बात उस दिन वहीं रुक गई और वोट नहीं हुआ। अगली बैठक में जानम्मा ने अध्यक्ष का पद छोड़ दिया।

उसने वजह यह बताई कि जो औरत ख़ुद चौदह महीने बक़ाया रह चुकी है, वह दूसरों का नाम काटने वाले काग़ज़ पर दस्तख़त करने लायक़ नहीं है, और यह बात नौ बरस से लिखी हुई पड़ी थी और उसने कभी बताई नहीं।

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समूह ने उसे रोकने की कोशिश की।

उसने नहीं माना। नई अध्यक्ष थंकम बनी, जो चौबीस की थी और जिसने पहली ही बैठक में कहा कि उसे कुर्सी की ज़रूरत नहीं है। उस दिन के बाद रजिस्टर चटाई पर रखा जाने लगा और लिखने वाली को झुककर लिखना पड़ता है।

मरियम को समूह से नहीं निकाला गया।

उसकी बक़ाया रक़म आठ महीने तक रुकी रही और उसके बाद उसने चुकानी शुरू की। उसने एक ब्यूटी पार्लर में काम पकड़ा और तीन बरस लगाकर पूरा चुकाया। उसका आदमी नहीं लौटा।

नियम भी नहीं बदला।

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वह आज भी वैसा ही लिखा है, तीन किस्तों वाला, और वह किसी और पर आज तक लगाया नहीं गया।

बैठक अब भी हर महीने की चार तारीख़ को उसी बरामदे में होती है और उसमें अब सोलह औरतें हैं। सब चटाई पर बैठती हैं, अध्यक्ष भी। कुर्सी अब भी कोने में रखी रहती है और बरसात में उस पर पानी की बूँदें पड़ती हैं, क्योंकि वह जगह छत के किनारे के ठीक नीचे है और उसे वहाँ से हटाया नहीं गया।