चिट्ठी बारिश वाले हफ़्ते में आई और उस पर ज़िले की मुहर थी। कलावती ने उसे दो बार पढ़ा। फिर वह बरामदे में बैठ गई। उस गाँव में पूरे बरस एक भी नवजात नहीं गया था। एक भी नहीं।

यह छोटी बात नहीं है। उस ब्लॉक के अठारह गाँवों में यह पिछले नौ बरस में सिर्फ़ दो बार हुआ था, और दोनों बार ऐसे गाँवों में जिनकी आबादी चार सौ से कम थी। कलावती वहाँ की आशा थी। यह काम वह सात बरस से कर रही थी।

उसका काम गिनती का था। कौन गर्भवती है, कब से है, कितनी जाँच हुईं, टीका लगा या नहीं, और प्रसव अस्पताल में हुआ या घर पर। इनाम इसी गिनती पर तय हुआ था।

ज़िले से आई चिट्ठी में लिखा था कि पंद्रह अगस्त को ब्लॉक स्तर पर उसे सम्मानित किया जाएगा और उसका नाम राज्य वाली सूची में भी भेजा जा रहा है। राज्य वाली सूची का मतलब पाँच हज़ार रुपये होता है। और एक प्रमाणपत्र।

उससे भी बड़ी बात यह होती है कि उसके बाद ब्लॉक का अफ़सर हर काम में उस आशा का नाम आगे रखता है, और आशा के लिए इसका मतलब पूरे बरस के छोटे-छोटे कामों में सहूलियत होता है। कलावती को यह भी मालूम था कि उस बरस असल में हुआ क्या था।

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उन बारह महीनों में उन्नीस प्रसव हुए थे। सत्रह सीधे निकले। दो नहीं निकलने थे।

एक में बच्चा उलटा था और दूसरे में औरत का ख़ून बहुत कम था और चौथे महीने से ही कम था। ये दोनों वे मामले होते हैं जिनमें गाँव में बच्चा जाता है। दोनों बार बिसनी ने पहले पहचाना। जाँच से पहले।

बिसनी उस गाँव की दाई थी। उम्र उसकी सत्तर के आसपास होगी।

विभाग दाइयों को अब नहीं मानता। दस-बारह बरस से यही चल रहा है कि घर पर प्रसव नहीं होना चाहिए और दाई को इस काम से हटना चाहिए, और इसके पीछे वजह भी सही है, क्योंकि घर पर होने वाले प्रसव में औरत ज़्यादा जाती है।

बिसनी ने भी प्रसव कराना छोड़ दिया था। बरसों पहले।

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पर वह गाँव की हर गर्भवती को देखती रहती थी, बिना बुलाए, बिना पैसे के, और उसकी आदत उन सत्तर बरसों की थी जिनमें उसने आठ सौ से ऊपर बच्चे उठाए थे। उलटे बच्चे वाली बात उसने पाँचवें महीने में बता दी थी। हाथ से।

उस वक़्त उपकेंद्र की जाँच में कुछ नहीं आया था और आना भी नहीं था, क्योंकि पाँचवें महीने में वह पकड़ में नहीं आता। बिसनी ने पेट पर हाथ रखकर बताया था और कलावती ने उसे मान लिया था, और उसी के बल पर उसने उस औरत को ज़िले तक भेजा था, दो बार, अपने साथ जाकर।

ख़ून वाली बात भी उसी ने पहले कही थी। उसने कहा था कि इसकी हथेली का रंग ठीक नहीं है और इसे अभी से दवा चाहिए, और यह उसने जाँच से डेढ़ महीने पहले कहा था। दोनों औरतें बचीं। दोनों बच्चे भी बचे।

अगर वे दोनों न बचे होते, तो उस गाँव का आँकड़ा वैसा ही होता जैसा बाक़ी सत्रह गाँवों का था, और कोई चिट्ठी नहीं आती। यही बात उसे कहनी थी या नहीं कहनी थी।

न कहने में कोई झूठ नहीं था। उसने अपना काम पूरा किया था, दोनों औरतों को ज़िले तक वही ले गई थी, टीके उसी ने लगवाए थे, और रात के दो बजे गाड़ी का इंतज़ाम भी उसी ने किया था।

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कहने में यह था कि वह उस औरत का नाम आगे कर रही है जिसे विभाग हटाना चाहता है। और उसमें एक बात और थी। बड़ी बात।

अगर यह लिखा जाए कि दाई ने पहचाना, तो ऊपर बैठे आदमी का पहला सवाल यह होगा कि दाई गर्भवती औरतों को देख क्यों रही है, और उसका दूसरा क़दम इसे रोकने का होगा। कलावती ने चिट्ठी का जवाब लिख दिया। उसी हफ़्ते।

उसने उसमें साफ़ लिखा कि गाँव का यह बरस उसकी वजह से नहीं है, कि दो मामले पहले पकड़े गए थे और वे उपकेंद्र की जाँच से नहीं पकड़े गए थे, और यह भी लिखा कि पकड़ने वाली कौन थी।

उसने यह भी लिखा कि इनाम उसका नहीं है।

जवाब पंद्रह दिन बाद आया और उसमें इनाम की बात नहीं थी। उसमें यह था कि घर पर प्रसव कराने वालों की गतिविधि पर नज़र रखी जाए और मासिक बैठक में इसकी सूचना दी जाए। पंद्रह अगस्त को इनाम किसी और गाँव की आशा को मिला।

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ब्लॉक के अफ़सर ने उसके बाद कलावती को किसी सूची में नहीं भेजा। यह उसने कहा नहीं और यह लिखा भी नहीं गया, पर अगले तीन बरस में जो भी अतिरिक्त काम बँटा, उसमें उसका नाम नहीं आया। बिसनी को कुछ नहीं हुआ, क्योंकि उस पर कुछ लगाया ही नहीं जा सकता था। वह किसी की कर्मचारी नहीं थी।

और कलावती ने उसके बाद एक काम किया, जो किसी काग़ज़ में नहीं है।

उपकेंद्र के बरामदे के बाहर सीमेंट की एक बेंच है, जिस पर औरतें अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं। मंगल, गुरुवार और शनिवार की सुबह बिसनी उसी बेंच पर बैठती है, और जो औरतें अंदर जाने से पहले उसके पास बैठ जाती हैं, वह उनका पेट देख लेती है। उसे इसका कुछ नहीं मिलता और वह किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं है, और कलावती ने ख़ुद उससे कहकर उसे वहाँ बिठाया है।