कढ़ाई चढ़े तीन घंटे हो चुके थे और खोया अब भी कलछी से चिपक रहा था।

मुरारी ने आँच धीमी की और गमछा सिर से खोलकर निचोड़ा। बैसाख की दोपहर में भट्ठी के सामने खड़े रहना अपने आप में एक अलग काम है, बरफ़ी बनाना उसके बाद आता है। पसीना भौंह से सीधा कढ़ाई में गिरता है, इसलिए गमछा हर आधे घंटे बाँधना पड़ता है, और हर आधे घंटे निचोड़ना पड़ता है।

छिद्दा नीचे बैठा चाशनी की तार देख रहा था।

काम बाबूलाल की बेटी की शादी का था। चार सौ आदमी, चालीस किलो बरफ़ी, दो सौ लड्डू और बारात वाली सुबह की पूड़ी-सब्ज़ी। मुरारी नौ बरस से क़स्बे की शादियों में यही करता आया था, और उससे पहले उसका बाप करता था।

उसकी भट्ठी मथुरा वाली सड़क से हटकर, बस अड्डे के पीछे एक टीन के छप्पर में थी। दुकान कहने को दुकान थी: एक तख़्त, दो कढ़ाइयाँ, तराज़ू, और पीछे मसालों के डिब्बे।

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रेट माघ में तय हुआ था।

उस वक़्त खोया दो सौ चालीस का किलो था। बैसाख आते-आते वह तीन सौ चालीस हो गया। गर्मी जल्दी पड़ गई, भैंसों ने दूध घटा दिया, और मंडी में जो खोया उतरता था उसका आधा दिल्ली की गाड़ी में चढ़ जाता था।

मुरारी ने कई बार जोड़ लगाया और जोड़ हर बार वही निकला। चालीस किलो बरफ़ी में तीस किलो खोया लगता है। सौ रुपये किलो का फ़र्क़ तीन हज़ार का हुआ। पूरे काम में उसे चार हज़ार बचने थे, दो आदमियों की चार दिन की मेहनत के, और अब हज़ार बचता।

छिद्दा ने शाम को कहा, 'चाचा, आरारोट मिला दो। दो किलो में पाँच किलो निकल आएगी।' 'चार सौ आदमी हैं,' उसने आगे कहा। 'शादी में बरफ़ी कौन चखता है। लोग प्लेट में रखकर बात करने लगते हैं।' मुरारी कलछी धोता रहा और उस रात इस पर आगे कोई बात नहीं हुई।

अगले दिन वह बाबूलाल के घर गया। इरादा रेट की बात करने का था।

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बाबूलाल आँगन में टेंट वाले के साथ खड़ा था और कुर्सियों की गिनती पर बहस कर रहा था। मुरारी को देखकर उसने खाट खिंचवाई, चाय मँगाई, और बिना पूछे बताने लगा कि पैसा कहाँ-कहाँ से आया है। दो बीघे गिरवी, भाई से पैंतीस हज़ार। बेटे की तीन महीने की तनख़्वाह जो वह भेज नहीं पाया, इसीलिए भेज नहीं पाया।

अंदर से लड़की एक बार निकली, पानी रखा, और वापस चली गई। उसके हाथ में मेहँदी लगी थी और वह उसे बचाकर चल रही थी। मुरारी चाय पीकर लौट आया। रेट की बात मुँह तक आई और वहीं रह गई।

शाम को उसने छिद्दा को पचास रुपये दिए और कहा कि परचून से आरारोट ले आ।

छिद्दा जो थैली लाया वह हल्की थी। खोया भारी होता है और आरारोट हवा जैसा। मुरारी ने थैली मसालों के पीछे रख दी, जहाँ किसी की नज़र न पड़े, और फिर उसे याद आया कि लाया तो छिद्दा ही है।

पहली खेप छह किलो की बनी। उसमें डेढ़ किलो आरारोट गया।

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बरफ़ी जमी भी जल्दी, और यही पहला डर था। असली खोए की बरफ़ी जमने में वक़्त लेती है और थाली में बीच से हल्की दबती है। यह किनारे तक एक-सी सख़्त हो गई, जैसे किसी और के हाथ की हो।

उसने चौकोर काटी, चाँदी का वर्क़ लगाया और थाली गीले बोरे से ढक दी।

शादी से एक दिन पहले घर वाले मिठाई चखते हैं। यह रिवाज है, और इसी बहाने कमी-बेशी की बात भी हो जाती है। शाम को थाली बाबूलाल के आँगन में गई।

परमेसरी दादी दरवाज़े के पास अपनी चारपाई पर बैठी थीं। उन्हें अब दिखता कम था। रौशनी और अँधेरा समझ आता था, चेहरे नहीं। आवाज़ से पहचानती थीं और ग़लत कभी नहीं पहचानती थीं। पहला टुकड़ा घर की सबसे बड़ी को जाता है। बाबूलाल ने ख़ुद उठाकर उनकी हथेली पर रखा।

उन्होंने धीरे-धीरे खाया। फिर बोलीं, 'मुरारी, तेरे बाप के हाथ की बरफ़ी मैंने अपनी शादी में खाई थी। सन् बहत्तर में।' मुरारी हँस दिया। 'उसमें मीठा देर तक मुँह में रहता था,' दादी ने कहा। 'इसमें जल्दी छूट जाता है।'

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आँगन में कोई नहीं रुका। बाबूलाल ने कहा कि दादी को अब हर चीज़ में पुराना ज़माना दिखता है, और टेंट वाले की तरफ़ मुड़ गया। छिद्दा थाली उठाकर अंदर चला गया। कहीं से बैंड वालों के रिहर्सल की आवाज़ आ रही थी।

मुरारी वहीं खड़ा रहा।

दादी ने उसे पकड़ा नहीं था। उन्हें आरारोट का पता नहीं था और वे बता भी नहीं सकती थीं कि क्या मिला है। उन्हें बस इतना याद था कि पचास बरस पहले मीठा कितनी देर रहता था। और वह याद ठीक थी।

उसके बाप का एक ही उसूल था। बरफ़ी आँख के लिए नहीं बनती। रात को वह भट्ठी बुझाकर घर गया, खाना खाया और लेट गया। पंखा चलता रहा और नींद नहीं आई।

तीन बजे वह उठा।

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मसालों के डिब्बे के पीछे एक और डिब्बा था, टिन का, जिसमें बयालीस सौ रुपये पड़े थे। वह पैसा दुकान की छत का था। तीन बरसात से ऊपर तिरपाल पड़ी थी और हर आँधी में उसे नई रस्सी से बाँधना पड़ता था। इस बार टीन डलनी थी।

उसने नोट जेब में रखे और साइकिल निकाल ली।

मंडी चार बजे खुल जाती है। दूधिया उसे बीस बरस से जानता था और उसने बिना कुछ पूछे तीन सौ चालीस ही लगाए। मुरारी ने आठ किलो लिया, तौल दोबारा नहीं कराई, और वापसी में साइकिल एक बार भी नहीं रुकी।

सूरज निकलने से पहले नई खेप कढ़ाई में थी। छिद्दा छह बजे आया और कढ़ाई देखकर वहीं दरवाज़े पर रुक गया। 'चाचा, पहली वाली का क्या करोगे?' 'घर ले जाऊँगा।' 'छह किलो?' 'खा लेंगे।'

छिद्दा को बात समझ नहीं आई और उसने कहना शुरू किया कि किसी को पता नहीं चला था, दादी ने भी यों ही कह दिया था, और जो पैसा अब लगा है वह कहीं से लौटकर नहीं आएगा। बात ग़लत भी नहीं थी। मुरारी ने भट्ठी की तरफ़ इशारा किया और कहा कि नीचे से आँच धीमी कर।

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शादी वाले दिन लू चली।

पंडाल के नीचे तीन पंखे लगे थे और तीनों गरम हवा फेंक रहे थे। बरफ़ी की थालियाँ गीले बोरों के नीचे रखी गईं और हर घंटे बोरे पर पानी छिड़का गया। चार सौ आदमी आए और बरफ़ी बँटी। थालियाँ दो बार भरी गईं और शिकायत एक भी नहीं आई।

परमेसरी दादी उसी जगह बैठी थीं, दरवाज़े के पास, जहाँ से थोड़ी हवा आती थी। खाना ख़त्म होने के बाद उन्होंने हाथ उठाकर किसी को बुलाया। छिद्दा पास ही था। 'एक और।' छिद्दा एक टुकड़ा लेकर गया। दादी ने उसे खाया, हथेली धोती से पोंछी, और देर तक कुछ बोलीं नहीं। फिर उन्होंने छिद्दा से पूछा कि विदाई कितने बजे है।

मुरारी को उस काम में साढ़े तीन सौ रुपये बचे और टीन उस साल नहीं पड़ी। पहली खेप वाली छह किलो बरफ़ी घर पर रखी रही और आठ दिन चली। तीसरे दिन के बाद उसमें से घी की महक चली गई और वह दाँत के नीचे रेत जैसी लगने लगी, और मुरारी रोज़ रात खाने के बाद उसका एक टुकड़ा उठाकर खाता रहा, जब तक थाली ख़ाली नहीं हो गई।