बावन हज़ार में मुर्रा की ऐसी भैंस कोई नहीं देता।
झज्जर के मेले में जेठ की सुबह भी नौ बजे तक भारी हो जाती है। धूल घुटनों तक उठी रहती है, नाँदों के पास पानी छिड़का जाता है, और आदमी की आवाज़ से ज़्यादा जानवरों की घंटियाँ सुनाई देती हैं।
जोगिंदर बीस बरस से इसी मेले में आता था।
उसका काम सीधा था: सुबह ख़रीदना, शाम को या अगले मेले में बेच देना, और बीच के फ़र्क़ में घर चलाना। बीस बरस में उसने मुर्रा की तीन सौ से ऊपर भैंसें छुई थीं और हाथ लगाते ही बता देता था कि जानवर किस ब्यांत में है।
मलखान वाली भैंस काली थी, कंधे भारी, पूँछ का गुच्छा घुटने से नीचे। ऊपर से देखने में ठीक जानवर लगती थी। मलखान ने भैंस के बावन हज़ार माँगे। दाम कम था और यही पहली बात थी जो खटकी। ऐसी भैंस मेले में सत्तर से नीचे नहीं जाती।
जोगिंदर ने कहा कि दूध निकलवाकर देखेंगे। बाल्टी लगी और मलखान के लड़के ने हाथ लगाया, और दूध उसी वक़्त छूट गया, जैसे नल खोला हो। बाल्टी में नौ लिटर से ऊपर उतरा। फिर जोगिंदर ने अपना हाथ लगाया। यहीं फ़ैसला हो गया।
अच्छी दूध वाली भैंस बेगाने हाथ को दूध नहीं देती। वह पैर सिकोड़ती है, सिर घुमाकर देखती है, और जब तक अपना आदमी पास खड़ा न हो तब तक उतारती नहीं। सुई लगी भैंस को यह चुनाव नहीं रहता। उसके लिए हर हाथ एक जैसा है।
जोगिंदर के हाथ में भी दूध वैसे ही छूटा। उसने कुछ कहा नहीं और सौदा कर लिया। बावन हज़ार नक़द, रस्सी अपनी।
मंडी में इसे कोई ग़लत नहीं मानता। सुई वाली भैंस दो-तीन दिन पूरा दूध देती है, फिर घटती चली जाती है। जो जानता है वह ऐसी भैंस सस्ती लेता है और किसी दूसरे ज़िले के मेले में महँगी बेच देता है, जहाँ ख़रीदने वाला उसे दोबारा कभी न ढूँढ़ सके।
जोगिंदर ने आज तक यह नहीं किया था। इस बार करने का इरादा था। वजह घर पर बैठी थी।
रजवंती का रोहतक में नर्सिंग वाले कोर्स में नंबर आ गया था। फ़ीस और हॉस्टल मिलाकर अड़तालीस हज़ार, और जमा कराने की आख़िरी तारीख़ पंद्रह जेठ। घर में इतना नक़द कभी एक साथ नहीं रहा। तेजो ने कहा था कि काली को बेच दो।
काली उनकी अपनी भैंस थी, आँगन के दूसरे खूँटे पर बँधी, सात लिटर देने वाली, और उसी सात लिटर से घर का दूध, दही और महीने के छह हज़ार आते थे। उसे बेचने का मतलब था कि फ़ीस भर जाएगी और उसके बाद बारह महीने पतले निकलेंगे।
इसीलिए जोगिंदर मेले में आया था।
दोपहर तक उसने अपनी नई भैंस को नीम के नीचे बाँध रखा और पानी दो बार पिलाया। जो भी पूछने आया, उसने सत्तर कहे, और लोग हँसकर आगे बढ़ गए। तीन बजे सतबीर आया। चौबीस-पच्चीस बरस का लड़का था, नई क़मीज़, नई चप्पल, और बग़ल में कपड़े का थैला।
उसने भैंस के चारों तरफ़ चक्कर लगाया और पहला सवाल यह पूछा कि दूध कितना देती है।
जो आदमी भैंस ख़रीदता आया है वह पहले यह नहीं पूछता। वह ब्यांत पूछता है, पिछला ब्याही कब हुआ पूछता है, और नाँद में मुँह डालकर देखता है कि जानवर खा कैसे रहा है। दूध का सवाल सबसे आख़िर में आता है, क्योंकि दूध वह चीज़ है जो दिखाई जा सकती है।
फिर सतबीर ने कपड़े का थैला खोला।
उसमें नोट थे, दस-दस हज़ार की गड्डियों में बँधे हुए, और हर गड्डी पर अलग हाथ की लिखावट में गिनती लिखी थी। कोई पर्ची किसी और की स्याही से लिखी थी।
जोगिंदर उस थैले को देखता रहा।
अट्ठानबे में उसने अपनी पहली भैंस इसी तरह ख़रीदी थी। चार आदमियों से पैसा लिया था और चारों की गिनती अलग-अलग काग़ज़ पर थी। उस पैसे का वज़न अलग होता है। वह जेब में नहीं रहता, छाती पर रहता है।
'कहाँ से हो?' उसने पूछा।
'महम की तरफ़।' सतबीर ने बताया कि बाप की तीन कीले ज़मीन है, दो भाई और हैं, और घर में डेयरी शुरू करनी है। पैसा माँ के गहने बेचकर और तीन जगह से उधार लेकर जोड़ा है। 'सत्तर बहुत हैं,' उसने कहा। 'बासठ कर लो।'
बासठ में जोगिंदर को दस हज़ार बचते और फ़ीस का इंतज़ाम हो जाता। और काली अपने खूँटे पर बँधी रहती। जोगिंदर ने कहा कि बाल्टी लगवाओ और ख़ुद देख लो।
बाल्टी लगते ही सतबीर के चेहरे पर वह चीज़ आ गई जो नए ख़रीदार के चेहरे पर आती है, जब वह पहले ही मन में जानवर को अपना मान लेता है। 'हाथ तू लगा,' जोगिंदर ने कहा। 'मैं?' 'तू।' सतबीर ने हाथ लगाया और दूध उसी वक़्त छूट गया।
लड़का ख़ुश हो गया। जोगिंदर पास ही खड़ा रहा और थोड़ी देर बाद बोला, 'यह ख़ुश होने वाली बात नहीं है।'
फिर उसने वह बताया जो बताने की कोई ज़रूरत नहीं थी। कि भैंस बेगाने हाथ को दूध नहीं देती। कि जो दे दे उसका मतलब एक ही होता है। कि यह जानवर तीसरे दिन से घटेगा, दसवें दिन तीन लिटर पर आ जाएगा, और चारा भी छोड़ देगा। कि ऐसी भैंस दो महीने खिलाकर सीधी की जा सकती है, पर उसमें पैसा और सब्र दोनों लगते हैं, और उधार का पैसा सब्र नहीं करता।
सतबीर देर तक खड़ा रहा। फिर उसने थैला उठाया और चला गया, और जोगिंदर को लगा कि लड़का शायद उसे भी झूठा ही समझकर गया है।
शाम को मेला उतरने लगा।
जोगिंदर ने वह भैंस चौंतीस हज़ार में उसी आदमी को बेच दी जो सुबह सत्तर सुनकर हँसा था और जिसे मालूम था कि वह किस तरह का जानवर ले रहा है। अठारह हज़ार उसी दिन में डूब गए। घर पहुँचकर उसने खाना खाया और तेजो से कहा कि परसों आढ़ती को बुलवा लेना। तेजो बाल्टी उठाकर काली को दुहने चली गई।
काली सत्तर हज़ार में गई। आढ़ती ने कहा कि इतना दाम इसलिए मिला कि जानवर घर का है और उसकी नस्ल का पता है।
रजवंती की फ़ीस चौदह जेठ को जमा हो गई, तारीख़ से एक दिन पहले। बाक़ी बाईस हज़ार में से अठारह उस घाटे में गए जो मेले में हुआ था, और चार हज़ार घर में रह गए। वह हॉस्टल जाते वक़्त आँगन में खड़ी होकर दोनों खूँटों की तरफ़ देखती रही, फिर बस पकड़ने चली गई।
दो मेले बाद वह लड़का भिवानी में दिखा, एक दूसरी भैंस के पास खड़ा हुआ। इस बार वह पहले नाँद में झाँक रहा था और दूध का सवाल उसने सबसे आख़िर में पूछा।
जेठ के आख़िर तक ख़ाली खूँटे के चारों तरफ़ घास उग आई, उस घिसे हुए गड्ढे में भी जो बीस बरस से खुरों के नीचे रहा था और जिसमें आज तक कभी कुछ नहीं उगा था।