गठरी सिर पर चढ़ाते वक़्त जसुबेन को लगा कि वज़न कुछ ज़्यादा है।
जेठ की दोपहर थी और जयपुर की उस कॉलोनी में सीढ़ियाँ छाँव में भी गरम थीं। बारह से चार के बीच वह काम नहीं करती थी, पर उस दिन तीसरी मंज़िल का बुलावा आ गया था और तीसरी मंज़िल कोई रोज़ नहीं बुलाती।
उसका काम पंद्रह बरस पुराना था। पुराने कपड़े लो, बर्तन दो।
यह सौदा तराज़ू पर नहीं होता। गठरी खोलकर नहीं देखी जाती, गिनी नहीं जाती, तौली नहीं जाती। दोनों तरफ़ अंदाज़ा चलता है और अंदाज़े में जो जीत जाए उसका दिन बन जाता है। कपड़े आगे कबाड़ी को जाते हैं, कबाड़ी से आगे गाड़ी में चढ़ते हैं, और उनका दाम इस बात से तय होता है कि ढेर में सूती कितना है और अच्छा माल कितना।
जसुबेन का हुनर यही था कि उसे गठरी खोलनी नहीं पड़ती थी।
सिर पर चढ़ाते वक़्त हाथ बता देते हैं। सूती कपड़े हल्के होते हैं और फूले हुए। ऊन भारी होता है पर नरम दबता है। रेशम का अपना वज़न होता है, और असली ज़री का वज़न अलग ही होता है, क्योंकि ज़री धातु है और धातु कपड़े की तरह झूठ नहीं बोलती।
उस गठरी में ज़री थी।
सोमवती जी तीसरी मंज़िल पर रहती थीं। बहत्तर बरस की, ऊँचा सुनने वाली, और नीचे सड़क पर आवाज़ लगती तो बालकनी से हाथ हिलाकर बुला लेती थीं। पर दरवाज़ा उस दिन उन्होंने नहीं खोला था।
वर्षा ने खोला था, उनकी बहू, और उसी ने संदूक खींचकर बाहर रखा था। उसने बड़ा पतीला माँगा, वही जिसमें शादी-ब्याह में सब्ज़ी बनती है, और जसुबेन ने ज़्यादा मोल-भाव नहीं किया। पतीला ऊपर रह गया। गठरी नीचे आ गई।
सौदा हो चुका था और नियम से पूरा हो चुका था। नीचे पीपल के नीचे बैठकर उसने गठरी खोली, जैसे वह हर घर के बाद खोलती थी, ताकि माल अलग-अलग हो जाए।
बीच में से बनारसी निकली।
गहरे हरे रंग की, किनारे पर चार उँगली चौड़ी ज़री, और पल्ले पर वह पुराना बूटा जो अब बनता नहीं। कबाड़ी ऐसी साड़ी नहीं लेता। ऐसी साड़ी सीधे जौहरी बाज़ार जाती है, जहाँ ज़री जलाकर चाँदी निकाली जाती है, और आठ-दस हज़ार बन जाते हैं।
जसुबेन ने चार सौ का पतीला दिया था। वह उसे देखती रही।
उसका महीना छह-सात हज़ार का था। कमरा किराए का, बस्ती में, और आदमी दो बरस से खाँसी के इलाज पर था और काम पर नहीं जाता था। यह एक साड़ी उसके डेढ़ महीने के बराबर थी।
और इसमें ग़लत कुछ नहीं था। यह धंधा है ही यही। हर आदमी जानता है कि गठरी के बदले जो पतीला मिलता है वह कम है, और फिर भी देता है, क्योंकि कपड़े रखने की जगह नहीं है और पतीला रखने की है।
उसने साड़ी तह करके अलग रख ली और बाक़ी माल बाँधने लगी। तभी उसकी उँगलियों में कुछ आया।
पल्ले की तह के अंदर चावल के चार-पाँच दाने थे, सूखे और पीले पड़े हुए, और उनके साथ गेंदे की एक सूखी पंखुड़ी। साड़ी लाल कच्चे धागे से बँधी हुई थी और वह धागा अब भी गाँठ में पड़ा था।
ऐसे कपड़े संदूक में नहीं फेंके जाते। ऐसे कपड़े रखे जाते हैं।
जसुबेन पंद्रह बरस से घरों की गठरियाँ खोलती आई थी और उसे मालूम था कि कौन-सा कपड़ा किसने बाहर निकाला होगा। बच्चों के कपड़े माँ निकालती है। मर्दों के कमीज़-पैंट औरतें निकालती हैं। और अपनी शादी की साड़ी कोई औरत लाल धागे समेत नहीं देती।
उसने गठरी बाँधी, सिर पर चढ़ाई, और चल दी।
दो गलियाँ वह निकल चुकी थी जब उसे रुकना पड़ा, इसलिए नहीं कि मन में कोई बात अटकी थी, बल्कि इसलिए कि गठरी का वज़न एक तरफ़ को ढलने लगा था। उसने उसे उतारकर दोबारा बाँधा। इस बार साड़ी सबसे ऊपर आ गई और हरा रंग धूप में वैसा चमका जैसा अलमारी में बीस बरस से नहीं चमका होगा।
आदमी की दवाई का ख़र्च महीने का चौदह सौ था और वह हर महीने पूरा नहीं पड़ता था। यह हिसाब उसे रास्ते भर याद रहा। वह फिर से तीन मंज़िल चढ़ी। दरवाज़ा वर्षा ने ही खोला और साड़ी देखते ही उसका चेहरा बदल गया।
उसने आवाज़ धीमी कर ली। कहा कि अलमारी में जगह नहीं थी, कि माँजी को अब कुछ याद नहीं रहता, कि साड़ी बीस बरस से बिना निकले पड़ी थी और उसमें सिल्वर फ़िश लग रही थी। फिर उसने जसुबेन के हाथ में दो सौ का नोट रखने की कोशिश की और कहा कि इसे ले जाओ और बात यहीं ख़त्म करो।
'माँजी को बुला लो,' जसुबेन ने कहा। 'ज़रूरत नहीं है।' 'बुला लो, बेन।' सोमवती जी अंदर से आईं। उन्हें ठीक से सुनाई नहीं देता था, इसलिए जसुबेन ने कुछ कहा नहीं, बस साड़ी उनके हाथ में रख दी।
उन्होंने उसे पल्ले से पकड़ा और सीधा करके देखा। फिर उन्होंने तह के अंदर हाथ डाला, जैसे उन्हें मालूम हो कि वहाँ क्या मिलेगा, और चावल के दाने उँगली पर उठा लिए। वे कुछ नहीं बोलीं और अंदर चली गईं।
वर्षा दरवाज़े पर खड़ी रही और उसने पतीला वापस नहीं किया। जसुबेन ने माँगा भी नहीं।
उस हफ़्ते कॉलोनी में बात फैल गई कि बर्तन वाली सामान ले जाकर वापस आती है और घर की बातों में दख़ल देती है। तीन घरों ने अगली बार दरवाज़ा नहीं खोला। दो ने खोला और कहा कि अभी कुछ नहीं देना है।
बरसात तक जसुबेन ने उस कॉलोनी में जाना छोड़ दिया और सांगानेर वाली तरफ़ नया इलाक़ा पकड़ा, जहाँ मकान छोटे थे और गठरियाँ हल्की। उस पूरी गर्मी उसके सिर पर दस पतीले चढ़े, ग्यारह नहीं, और तीसरी मंज़िल वाली उन सीढ़ियों पर वह दोबारा नहीं चढ़ी।