अलगू की दुकान मोड़ पर थी और उसमें वह सब मिलता था जो एक गाँव को रोज़ चाहिए होता है। नमक, तेल, माचिस, बीड़ी, साबुन, और बच्चों के लिए काँच के मर्तबान में रखी गोलियाँ। दुलारे उसका दूर का भाई लगता था। रिश्ता इतना दूर का कि गिनने बैठो तो चार पीढ़ी पीछे जाना पड़े।
जिस साल अलगू के भाई की तबीयत ख़राब हुई, उस साल उसे बंबई जाना पड़ा। वह जाते हुए दुलारे से कह गया कि महीने भर दुकान देख लेना। यह पूरी बात थी। न कोई हिसाब लिखा गया, न कोई शर्त तय हुई, न यह तय हुआ कि दुलारे को इसमें से क्या मिलेगा।
दुलारे उस वक़्त बत्तीस का था और उसके पास कोई पक्का काम नहीं था।
वह मज़दूरी करता था और वह भी रोज़ नहीं मिलती थी। घर में पत्नी थी और दो बच्चे थे और ज़मीन इतनी थी कि साल के चार महीने चल जाते थे। दुकान पर बैठने का मतलब उसके लिए यह था कि उन महीनों में उसे मज़दूरी ढूँढ़ने नहीं जाना पड़ेगा, और शुरू में उसने इसे इसी तरह देखा था।
पहला महीना बीत गया और अलगू नहीं आया। दूसरे महीने अलगू का एक ख़त आया जिसमें लिखा था कि भाई की तबीयत ज़्यादा ख़राब है और उसे रुकना पड़ेगा। तीसरे महीने ख़त नहीं आया। चौथे महीने भी नहीं आया। दुलारे दुकान खोलता रहा। रोज़, सुबह छह बजे।
उसने माल ख़ुद मँगवाना शुरू किया, क्योंकि जो था वह ख़त्म हो रहा था। पैसा उसी दुकान की बिक्री से लगाया और हिसाब उसने एक कॉपी में रखना शुरू कर दिया, जो उसने ख़ुद ही तय किया था, किसी के कहने पर नहीं।
गाँव में लोग पहले पूछते थे कि अलगू कब आएगा। दो बरस बाद पूछना बंद हो गया। तीन बरस बाद लोग दुकान को दुलारे की दुकान कहने लगे और यह उसने कभी ठीक नहीं किया।
ठीक करना मुश्किल भी था। हर बार टोकने पर बात लंबी हो जाती और सामने वाले को यह अजीब लगता कि आदमी अपनी दुकान को अपनी क्यों नहीं कह रहा। दो-तीन बार उसने कोशिश की और फिर उसने छोड़ दिया, और छोड़ने के बाद उसे यह खटकता रहा।
उसने इन बरसों में जो कमाया उसे उसने दो हिस्सों में रखा। एक हिस्सा उसका अपना, जिससे उसका घर चला। दूसरा हिस्सा अलग, जिसे उसने अलग डिब्बे में रखा और जिसे उसने कभी नहीं छुआ।
यह बँटवारा उसने ख़ुद तय किया था और उसका कोई पैमाना नहीं था। जो माल वह ख़ुद लाया उसका मुनाफ़ा उसका, और जो जगह और जो नाम अलगू का था, उसका किराया अलगू का। पाँचवें बरस उसकी पत्नी ने कहा कि यह डिब्बा बेकार पड़ा है और घर में छत टपक रही है।
उसने छत टपकने दी और उस बरसात में उन्होंने कमरा बदल लिया। छठे बरस उसने डिब्बे में जो जमा हुआ था उसे गिना। वह चौंतीस हज़ार से ऊपर था।
उस रात वह देर तक जागा और उसने यह सोचा कि अगर अलगू कभी नहीं लौटा तो इस पैसे का क्या होगा। उसके पास इसका जवाब नहीं था। उसने यह भी सोचा कि अलगू के लौटने पर वह उससे क्या कहेगा, और यह भी उसे नहीं सूझा। सुबह उसने डिब्बा वापस उसी जगह रख दिया, ऊपर वाले ताक़ पर, कपड़े के पीछे।
नौवें बरस अलगू लौटा।
वह दोपहर की बस से उतरा और सीधे दुकान पर नहीं आया। वह पहले अपने घर गया, जो नौ बरस से बंद पड़ा था, और उसका ताला उसने ख़ुद खोला। उसमें से जो निकला वह धूल थी और चमगादड़ों की बू थी। वह वहाँ कुछ देर बैठा रहा और उसके बाद वह मोड़ की तरफ़ आया।
वह अकेला नहीं लौटा। उसके साथ उसका लड़का था, जो जाते वक़्त छह का था और अब पंद्रह का था।
अलगू ने बताया कि भाई तीसरे बरस चला गया था और उसके बाद वह वहीं रह गया, क्योंकि वहाँ काम मिल गया था और यहाँ लौटने की कोई वजह उसे उस वक़्त दिखी नहीं। उसने यह भी माना कि उसने ख़त नहीं लिखा।
दुलारे ने उसे कॉपी दी और डिब्बा दिया। कॉपी में नौ बरस का हिसाब था, महीने-दर-महीने, उसी की लिखावट में, और उसमें वह भी लिखा था जो उसने अपने लिए रखा था। अलगू ने कॉपी नहीं खोली। उसने उसे उठाया तक नहीं।
उसने डिब्बा भी नहीं गिना। उसने दोनों चीज़ें वहीं तख़्ते पर रख दीं और वह काफ़ी देर बैठा रहा। फिर उसने कहा कि दुकान दुलारे की है। दुलारे ने मना कर दिया।
यह बहस दो दिन चली और उसका जो नतीजा निकला वह यह था कि दुकान दोनों के नाम रही, आधी-आधी, और उसमें बैठता दुलारे ही रहा, और अलगू का लड़का उसी दुकान से पढ़ा।
वह लकड़ी की चौकी, जिस पर बैठकर दुलारे ने वे नौ बरस काटे थे, अब भी वहीं है। उसका एक पाया छोटा है और उसके नीचे ईंट का टुकड़ा लगा रहता है, और वह टुकड़ा उसी बरसात का है जब कमरा बदला गया था।