सड़क बनने के बाद कोई नहीं बता सकता कि रोलर कितनी बार चला। यही उस काम की पूरी बात है।

तारकोल बिछता है और गरम रहते-रहते उसे दबाना होता है। दबाने का काम रोलर करता है। एक ही जगह पर रोलर को कई बार आगे-पीछे चलाना पड़ता है, और उसी को चक्कर कहते हैं। तारकोल ठंडा हो जाए तो दबाने का कोई फ़ायदा नहीं रहता, इसलिए यह काम घड़ी देखकर होता है।

जितने चक्कर, उतनी पक्की सड़क। सुग्रीव को यह नाप उसके उस्ताद ने बताई थी। गरम तारकोल पर बारह चक्कर, ठंडा पड़ने से पहले। छह चक्कर में भी सड़क बन जाती है। देखने में वह बिलकुल वैसी ही होती है। काली, चिकनी, बराबर। उस पर गाड़ी उसी तरह चलती है और उद्घाटन में कोई फ़र्क़ नहीं दिखता।

फ़र्क़ दूसरी बरसात में निकलता है।

कम दबी सड़क में नीचे हवा रह जाती है। पानी उसी हवा वाली जगह में घुसता है, जाड़े में फैलता है, और तारकोल की परत नीचे से उखड़ने लगती है। पहले छोटे गड्ढे, फिर बड़े।

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जो सड़क बारह चक्कर से बनी हो, वह आठ-दस बरस चलती है। जो छह से बनी हो, वह दो में बैठ जाती है और तीसरे बरस उसकी मरम्मत का नया ठेका निकलता है, जिसमें उतना ही पैसा लगता है।

सुग्रीव उन्नीस बरस से रोलर चला रहा था। उसके पास अपनी मशीन नहीं थी, वह ठेकेदारों की मशीन पर चलता था, और उसका दाम दिन के हिसाब से बँधता था। उस बरस का काम ब्लॉक की उस सड़क का था जो बारह किलोमीटर लंबी थी और जिससे चौदह गाँव जुड़ते थे।

काम बरसात से पहले ख़त्म होना था और उसमें देर हो चुकी थी। मिट्टी का काम अप्रैल में शुरू होना था और जून में शुरू हुआ, और उसका ठीकरा किसी के सिर नहीं फूटा।

ठेकेदार ने पाँचवें दिन उसे बुलाया।

उसने सीधी बात की, जैसी इस काम में की जाती है। कि रोज़ की लंबाई बढ़ानी है, कि जितना अभी चल रहा है उससे दुगना चाहिए, और कि चक्कर छह कर दो। उसने यह भी कहा कि सब यही करते हैं। और यह उसने चिढ़कर नहीं, समझाकर कहा।

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यह सच था।

उसी ब्लॉक में पिछले चार बरस में जितनी सड़कें बनी थीं, उनमें से एक भी तीन बरस से ज़्यादा नहीं चली थी, और हर बरसात के बाद उन्हीं पर मरम्मत का नया ठेका निकलता था। सुग्रीव ने कहा कि वह नहीं करेगा। उसने यह पहली बार में ही कह दिया और उसके बाद उसे दोहराना पड़ा।

उसने कोई भाषण नहीं दिया। सिर्फ़ यह कहा कि उसकी नाप बारह की है। ठेकेदार ने पहले समझाया, फिर पैसे की बात की, फिर धमकाया। तीनों बार जवाब वही रहा।

छठे दिन ठेकेदार ने दूसरा आदमी बुला लिया। यह करने में उसे एक फ़ोन लगा और आधा दिन। वह आदमी दूसरे ज़िले का था और उसने रोलर सुग्रीव से ले लिया, और सुग्रीव को उसी दिन हिसाब करके छोड़ दिया गया।

उस वक़्त तक सड़क बन चुकी थी, एक किलोमीटर और कुछ मीटर। बाक़ी ग्यारह किलोमीटर उस दूसरे आदमी ने बनाए और वह काम उस महीने के आख़िर तक पूरा हो गया, जो पहले तरीक़े से कभी नहीं होता। सुग्रीव को उस मौसम में और काम नहीं मिला।

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यह भी सीधा हिसाब था। ठेकेदार तीन थे और तीनों एक-दूसरे को जानते थे, और जिस आदमी ने एक की बात न मानी हो, उसे दूसरा भी नहीं रखता।

उसने वह बरसात बिना काम के काटी। घर में तीन लोग थे और उन चार महीनों में जमा किया हुआ सब निकल गया, और उसकी औरत ने दो बार अपनी बालियाँ रखवाईं।

अगले बरस उसे एक छोटा काम मिला, फिर एक और, और तीसरे बरस से चल निकला, क्योंकि रोलर चलाने वाले आदमी उतने भी नहीं होते कि किसी को हमेशा बाहर रखा जा सके। सड़क का उद्घाटन उसी अक्टूबर में हो गया। फ़ीता कटा, तस्वीरें छपीं, और चौदह गाँवों ने पहली बार पक्की सड़क देखी।

पहली बरसात में वह ठीक रही। ऐसा ही होता है। दूसरी बरसात में उसमें गड्ढे आ गए। तीसरी में मरम्मत का ठेका निकला। चौथी में दोबारा। और यह उसी सड़क पर हुआ, पूरे बारह किलोमीटर में, सिवाय शुरू के एक किलोमीटर के।

वह हिस्सा वैसा ही रहा। एक गड्ढा भी नहीं।

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यह बात इतनी साफ़ थी कि कोई भी देख सकता था, और किसी ने देखी भी। मरम्मत के काग़ज़ों में हर बार वही लिखा जाता रहा कि किलोमीटर एक से आगे का हिस्सा ठीक करना है। पहला किलोमीटर क्यों ठीक है, यह किसी ने नहीं पूछा।

इसकी वजह भी आसान है। पूछने पर जो जवाब आता, वह पिछले चार बरस की सब सड़कों पर लागू होता, और उसे कोई नहीं पूछना चाहता था। सुग्रीव अब इक्यावन का है और अब भी रोलर चलाता है।

उस सड़क पर वह हर बरस दो-तीन बार निकलता है, क्योंकि उसका अपना गाँव उन्हीं चौदह में से एक है। बारह किलोमीटर में गाड़ी हिलती-डुलती चलती है और मोड़ों पर धीमी करनी पड़ती है। शुरू के एक किलोमीटर में वह हिलती नहीं, और वह हिस्सा अब भी उसी तरह काला है, और उसके बाद ही असली सड़क शुरू होती है।