चार बजे ऊपर से आवाज़ आई, और वह पानी की नहीं थी। शांताबाई उस वक़्त प्याज़ काट रही थी।

उसका ढाबा घाट के बीचोंबीच था, मोड़ से थोड़ा पहले, जहाँ ट्रक वाले चढ़ाई से पहले रुकते हैं। छह टेबल, एक चूल्हा, और पीछे टीन का एक कमरा। उसी में वह अपने लड़के के साथ रहती थी। बरसात में वहाँ का धंधा दिन पर टिका रहता है।

पानी तेज़ पड़े तो गाड़ियाँ रुकती हैं और खाना बिकता है। बहुत तेज़ पड़े तो गाड़ियाँ आती ही नहीं और चूल्हा दिन भर ठंडा रहता है।

उस दिन पहाड़ दोनों तरफ़ बैठा।

ऊपर की तरफ़ पेड़ समेत ढलान बैठ गई और नीचे की तरफ़ पत्थर आकर सड़क पर बिखर गए। बीच में जो हिस्सा बचा वह लगभग तीन किलोमीटर का था और उसी में सब लोग फँस गए। गिनने पर दो सौ के आसपास निकले। शायद कुछ ज़्यादा।

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दो बसें, ग्यारह ट्रक, सत्रह-अठारह कारें, और चार-पाँच दोपहिये। कुछ लोग शादी से लौट रहे थे। एक बस में स्कूल के बच्चे थे, जो किसी सहल से आ रहे थे। पहले घंटे किसी को अंदाज़ा ही नहीं हुआ कि यह लंबा चलेगा।

लोग गाड़ियों से उतरकर आगे तक देखने गए, तस्वीरें लीं, और वापस बैठ गए। पौने छह बजे तक यह साफ़ हो गया कि मशीन ऊपर से आएगी और उसे पहुँचने में ही रात हो जाएगी। तब सब ढाबे की तरफ़ आए। एक साथ।

यह अकेला ढाबा था। तीन किलोमीटर में और कुछ नहीं। न दुकान, न घर। शांताबाई ने पहले एक घंटा बिना सोचे काम किया। जो माँगा वह बनाया, दाम वही लिए जो रोज़ लेती थी, और चूल्हा जलता रहा। आठ बजे उसने पीछे जाकर बोरी देखी। फिर दोबारा देखी।

आटा साढ़े ग्यारह किलो था। चावल छह। दाल दो। तेल एक डिब्बा और प्याज़ का आधा बोरा। यह उसका चार दिन का स्टॉक था, जो हर मंगलवार को नीचे से आता था। मंगलवार तीन दिन बाद था। और सड़क बंद थी।

बंद सड़क का मतलब सिर्फ़ यह नहीं होता कि लोग निकल नहीं सकते। इसका मतलब यह भी होता है कि सामान अंदर नहीं आ सकता। मलबा हटने में उन घाटों पर हफ़्ता लग जाता है और उसके बाद भी एक तरफ़ से गाड़ी चलती है।

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उसने बोरी का मुँह बंद किया। फिर बाहर आकर बैठ गई। उसके सामने दो हिसाब थे और दोनों ठीक थे।

पहला यह कि जो है वह बेच दे। दो सौ लोग हैं, रात लंबी है, और घाट पर फँसे आदमी से जो दाम माँगो वह दे देता है। साढ़े ग्यारह किलो आटे से उस रात वह महीने भर की कमाई कर सकती थी।

दूसरा यह कि जो है वह रख ले। कुछ न बेचे।

यह भी किसी को बुरा नहीं लगता। ढाबा छोटा है, सामान ख़त्म है, इतना कह देना काफ़ी होता है और कोई पीछे नहीं पड़ता। उसके अपने घर में दो लोग थे, वह और छह बरस का लड़का, और उन दोनों को भी हफ़्ता भर उसी बोरी से काटना था।

उसने न पहला किया, न दूसरा। उसने तीसरा किया।

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उसने रात नौ बजे चूल्हे के पास खड़े होकर लोगों से इतना कहा कि आटा साढ़े ग्यारह किलो है और वह किसी को पेट भर नहीं खिला सकती, पर सबको एक-एक रोटी दे सकती है। दाम उसने वही रखा। रोज़ वाला।

उस रात दो सौ चार रोटियाँ बनीं। एक भी बची नहीं।

उसने अकेले नहीं बनाईं। बस वाली दो औरतें चूल्हे के पास आ गईं और एक ट्रक वाला आटा गूँधने बैठ गया। बच्चों को पहले दिया गया, फिर बूढ़ों को, और सबसे आख़िर में ट्रक वालों को, जिन्होंने ख़ुद यही कहा था।

साथ में उसने चाय बनाई, जितनी पत्ती थी उतनी बार। सड़क एक तरफ़ से तीसरे दिन खुली। बस वाले और कारें निकल गईं। ट्रक पाँचवें दिन निकले, क्योंकि मलबे पर से भारी गाड़ी बाद में जाने दी जाती है। शांताबाई का चूल्हा उन तीन दिनों के बाद ग्यारह दिन ठंडा रहा।

बोरी उसी रात ख़त्म हो गई थी। पूरी। नीचे से सामान बारहवें दिन आया, क्योंकि पहले हफ़्ते सिर्फ़ ज़रूरी गाड़ियाँ ऊपर आ रही थीं और आटा ज़रूरी नहीं माना जाता। उन दिनों में उसने और उसके लड़के ने चावल का माँड़ पिया और जंगल की भाजी उबालकर खाई, जो घाट पर उन दिनों बहुत होती है।

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लड़का चार दिन स्कूल नहीं जा सका, इसलिए नहीं कि सड़क बंद थी, बल्कि इसलिए कि उसमें चलने की ताक़त नहीं थी। इसकी शिकायत शांताबाई ने कभी किसी से नहीं की और इसे कोई क़ुर्बानी भी नहीं समझा। उसका हिसाब आसान था। दो सौ लोग एक रात में एक-एक रोटी पर काट सकते थे। दो लोग ग्यारह दिन में कुछ न कुछ काट ही लेते।

उस बरस के बाद उसने अपने पीछे वाले कमरे में एक और डिब्बा रखना शुरू किया।

पाँच किलो का, ढक्कन वाला, जिसमें वह हर मंगलवार को थोड़ा-सा आटा डाल देती है और जिसमें से ढाबे के लिए कभी नहीं निकालती। बरसात में वह भरा रहता है और अक्टूबर में उसे ख़ाली करके धूप दिखा दी जाती है, और आज तक उसकी ज़रूरत दोबारा नहीं पड़ी।