फ़नल में जो पानी उस सुबह इकट्ठा था, वह नापने वाले जार में छब्बीस मिलीमीटर तक आया। विलास ने उसे दो बार देखा और दोनों बार वही निकला। वर्षामापी उसके अपने खेत के कोने में लगा था, तार की जाली से घेरकर, ज़मीन से एक फ़ुट ऊपर।
यह काम उसे नौ बरस पहले मिला था। रोज़ सुबह साढ़े आठ बजे नाप लो, रजिस्टर में लिखो, और मोबाइल से भेज दो। महीने के आठ सौ रुपये मिलते थे और छुट्टी एक दिन की भी नहीं होती। आठ सौ रुपये में यह काम कोई नहीं करता।
विलास करता था क्योंकि यह उसके बाप को मिला था और बाप के जाने के बाद उसे मिल गया, और गाँव में इसे इज़्ज़त का काम माना जाता था।
उस बरस बारिश देर से आई।
विदर्भ में जून का महीना बुवाई का होता है। पहला अच्छा पानी गिरते ही कपास और सोयाबीन बो दिया जाता है, और उसके बाद दस-बारह दिन में दूसरा पानी चाहिए। न मिले तो बीज नीचे ही मर जाता है और दोबारा बोना पड़ता है, दोबारा बीज ख़रीदकर।
उस साल पहला पानी बीस जून को गिरा और सबने बो दिया। दूसरा पानी नहीं आया। पंद्रह दिन तक नहीं आया। बीमे का हिसाब मौसम पर चलता है और उसमें एक लकीर खिंची होती है।
जून के महीने में उस मंडल की सामान्य बारिश एक सौ अस्सी मिलीमीटर मानी गई थी। अगर पूरे महीने की दर्ज बारिश उसकी आधी से कम रहती, यानी नब्बे से नीचे, तो पूरे मंडल के बीमाधारक किसानों को बुवाई नाकाम मानकर पैसा मिल जाता।
नब्बे से एक मिलीमीटर भी ऊपर हो, तो किसी को एक रुपया नहीं मिलता। तीस जून की सुबह विलास ने आख़िरी नाप ली। पूरे महीने का जोड़ एक सौ एक मिलीमीटर बैठा। जोड़ ग्यारह मिलीमीटर ज़्यादा बैठ रहा था। इस बात का मतलब उस गाँव के हर आदमी को समझ आ गया, क्योंकि लोग रोज़ पूछ रहे थे और जोड़ ख़ुद भी लगा रहे थे।
पहला आदमी उसी दिन दोपहर को आया। उसके बाद शाम तक चार और आए, और अगले दिन सरपंच आया, और उसके अगले दिन दो ऐसे लोग भी आए जो कभी उसके घर नहीं आए थे। उनमें से किसी ने रिश्वत की बात नहीं की।
यह सबसे मुश्किल हिस्सा था। सबका कहना एक ही था और वह ग़लत भी नहीं था। बीस जून वाली बारिश बुवाई लायक़ नहीं थी, वह छिटपुट थी, और उसके बाद जो चार-पाँच मिलीमीटर वाली फुहारें पड़ीं वे खेत तक पहुँची ही नहीं। ज़मीन सूखी थी और सबका बीज नीचे मर चुका था।
यानी पूरे मंडल का नुक़सान असली था। बस काग़ज़ पर वह नुक़सान नहीं दिख रहा था, क्योंकि काग़ज़ नब्बे मिलीमीटर देखता है, ज़मीन नहीं देखता। 'बारह-तेरह मिलीमीटर की बात है,' सरपंच ने कहा। 'बाईस और छब्बीस तारीख़ वाली दो फुहारें कम कर दो। कोई नहीं पूछेगा।'
कोई नहीं पूछता। यह भी सही था। एक ही वर्षामापी है, एक ही आदमी नापता है, और उसकी लिखी हुई बात के ऊपर कोई दूसरी बात होती ही नहीं। विलास के अपने चार एकड़ थे और उनमें भी सोयाबीन मरा हुआ था।
उसके बड़े भाई के आठ एकड़ थे। उसका बीमा भी उसी मंडल का था और उसकी दो लड़कियों की पढ़ाई उसी पैसे से चलनी थी। तीस जून की रात उसने रजिस्टर खोलकर काफ़ी देर देखा। दो लाइनें थीं। बाईस तारीख़ के आगे सात, छब्बीस के आगे छह।
वे उसके अपने हाथ की लिखी थीं। उन्हें बदलने में एक मिनट लगता। उसने नहीं बदलीं। रजिस्टर बंद करके रख दिया।
पहली तारीख़ को उसने पूरे महीने का आँकड़ा वैसे ही भेज दिया, जैसा वह नौ बरस से भेजता आया था, और उसी शाम गाँव में ख़बर पहुँच गई कि मंडल छूट गया।
उसके बाद जो हुआ वह लंबा भी था और धीमा भी।
उससे बात करना बंद कर दिया गया। दुकान से सामान मिलता रहा, पर बात नहीं होती थी। मंदिर के कार्यक्रम में उसका नाम चंदे की सूची से हट गया। उसकी लड़की को स्कूल की बस में जगह मिलनी बंद हो गई और उसे साइकिल से भेजना पड़ा।
उसके भाई ने उससे उस बरस बात नहीं की। अगले बरस भी नहीं की। तीसरे बरस दिवाली पर उसने बस इतना पूछा कि खेत में क्या लगाया है, और विलास ने बता दिया, और उसके बाद फिर कुछ नहीं हुआ।
सरपंच ने ऊपर चिट्ठी लिखकर माँग की कि यह वर्षामापी गाँव के बीच में लगाया जाए और नापने वाला बदला जाए। चिट्ठी पर कुछ नहीं हुआ। ऐसी चिट्ठियों पर होता भी नहीं। अगस्त में बारिश ज़ोर से आई और उस बरस कपास ठीक निकल गई, हालाँकि सोयाबीन गया ही रहा।
विलास वही काम आज भी करता है। उसे अब बारह सौ रुपये महीना मिलते हैं।
उस बरस अक्टूबर में उसने विभाग को एक अर्ज़ी दी थी। उसमें उसने माँगा था कि जाली वाले घेरे पर ताला लगाया जाए और उसकी चाबी उसके पास न रहकर ब्लॉक के दफ़्तर में रखी जाए, और नाप के वक़्त कोई एक और आदमी साथ खड़ा रहे। ताला उसी साल लग गया। तब से हर सुबह साढ़े आठ बजे विलास घेरे के बाहर खड़ा होकर किसी के आने का इंतज़ार करता है, और चाबी उसके पास कभी नहीं रही।