सावन में अखाड़े की मिट्टी सबसे ज़्यादा माँगती है। बाहर पानी पड़े तो अंदर की मिट्टी भी नमी खींच लेती है और भारी हो जाती है, और भारी मिट्टी में गिरने पर चोट लगती है। इसलिए उसे रोज़ खोदना पड़ता है। हर सुबह, बिना नागा।
फावड़े से पूरा गड्ढा उलटो, ढेले तोड़ो, हल्दी और तेल मिलाओ, और फिर उसे बराबर करके पाँव से दबाओ। यह एक आदमी का दो घंटे का काम है और यह हर सुबह होता है। पिछले छह बरस से यह काम लोटन करता था।
गुरदयाल का अखाड़ा उस क़स्बे में सैंतीस बरस पुराना था और उस वक़्त उसमें इक्कीस लड़के थे। लोटन उन सबसे पहले आता था। और सबके बाद जाता था। वह चौदह का था जब आया था और अब बीस का हो चुका था।
इन छह बरसों में वह एक दिन नहीं चूका। बीमारी में नहीं, शादी-ब्याह में नहीं, बाढ़ में भी नहीं, जब क़स्बे का आधा हिस्सा पानी में था और वह घुटनों तक पानी में चलकर आया था। और वह कभी नहीं जीता। बाहर के किसी दंगल में नहीं।
यह बात गुरदयाल छह बरस से जानता था। शुरू से नहीं, पर बहुत पहले से।
पहलवानी में यह जल्दी दिख जाता है। लड़के की लंबाई, कंधे की चौड़ाई, कलाई की मोटाई, और सबसे ऊपर वह चीज़ जिसे कोई नाप नहीं सकता, कि दाँव लगते वक़्त उसका शरीर सोचता है या नहीं। लोटन का शरीर सोचता नहीं था। वह सुनकर करता था।
वह मेहनत से मज़बूत हो चुका था, बहुत मज़बूत, और वह अपने से कमज़ोर हर लड़के को हरा देता था। पर जब बराबर वाला सामने आता, तो वह हर बार आधे सेकंड पीछे रहता था, और पहलवानी में आधा सेकंड पूरा फ़ासला होता है।
यह सिखाया नहीं जा सकता। कोई नहीं सिखा सकता।
गुरदयाल ने चार बरस तक कोशिश की। उसने दाँव बदलवाए, ख़ुराक बदलवाई, और एक बार लोटन को तीन महीने के लिए दूसरे अखाड़े में भी भेजा। पाँचवें बरस में उसने मान लिया कि यह नहीं होगा। और छठे बरस भी उसने कुछ नहीं कहा। चुप ही रहा।
न कहने की वजह भी थी और वह सिर्फ़ नरमी नहीं थी।
लोटन अखाड़े का सबसे काम का लड़का था। मिट्टी वही करता था, छोटे लड़कों को वही सिखाता था, और सामान की देखभाल वही करता था। उसके बिना गुरदयाल को यह सब ख़ुद करना पड़ता। दूसरी वजह यह थी कि लोटन का बाप उसका बचपन का दोस्त था।
तीसरी वजह सबसे भारी थी।
पहलवान की ख़ुराक महँगी होती है। दूध, घी, बादाम, और यह रोज़ चाहिए, बरसों तक। लोटन के बाप ने इसके लिए तीन बरस पहले खेत का एक टुकड़ा बेचा था, दस कट्ठा, जो उनके पास कुल थोड़ी-सी ज़मीन में से था।
यह बात गुरदयाल को बाद में पता चली और उसके बाद कहना और मुश्किल हो गया। क्योंकि अब कहने का मतलब यह भी होता कि वह ज़मीन बेकार गई। इस बरस नागपंचमी से पंद्रह दिन पहले लोटन ने उससे कहा कि वह ज़िले वाले दंगल में लड़ेगा।
ज़िले का दंगल अलग चीज़ है। वहाँ बाहर के पहलवान आते हैं और वहाँ हारने का मतलब सिर्फ़ हारना नहीं होता, चोट भी होती है। गुरदयाल ने उस रात मिट्टी ख़ुद खोदी। अकेले।
अगली सुबह उसने लोटन को रोक लिया और गड्ढे के किनारे बिठा लिया। उसने झूठ नहीं बोला, और घुमाकर भी नहीं कहा।
उसने कहा कि छह बरस में उसने जितनी मेहनत की है उतनी उस अखाड़े में किसी ने नहीं की, कि उसका शरीर ठीक है, कि उसका मन ठीक है, और कि वह पहलवान नहीं बनेगा। उसने यह भी कहा कि यह उसे तीसरे बरस मालूम हो गया था।
यह आख़िरी बात सबसे ज़रूरी थी और सबसे बुरी भी, और वही उसने सबसे साफ़ कही। लोटन कुछ नहीं बोला। उसने सिर भी नहीं उठाया। वह उस दिन काम करके गया और अगले दिन नहीं आया, और उसके बाद नहीं आया।
उसका बाप चौथे दिन आया। शाम को। उसने गुरदयाल से जो कहा वह यहाँ लिखने लायक़ नहीं है। उसमें यह भी था कि तीन बरस पहले जब ज़मीन बिकी थी, तब क्यों नहीं बताया। इसका जवाब गुरदयाल के पास था और वह उसके ही ख़िलाफ़ जाता था, इसलिए उसने दिया नहीं।
दोनों की बातचीत उसके बाद बंद हो गई और आज तक बंद है। लोटन ने आठ महीने बाद ट्रक चलाना सीख लिया और अब वह उसी लाइन में है।
गुरदयाल ने सुना है कि वह ठीक चल रहा है और उसने अपने बाप की बेची हुई ज़मीन के बराबर ज़मीन दोबारा ख़रीद ली है, दूसरी जगह। यह उसने किसी और से सुना है, क्योंकि लोटन उससे मिलने नहीं आता।
अखाड़ा अब भी चलता है। उसमें अब सत्रह लड़के हैं।
मिट्टी गुरदयाल ख़ुद खोदता है। इकसठ की उम्र में उसे उसी काम में साढ़े तीन घंटे लगते हैं और सावन में चार, और वह उतनी बारीक नहीं हो पाती जितनी लोटन के हाथ से होती थी। यह बात अखाड़े के पुराने लड़के आपस में कहते हैं और गुरदयाल के सामने नहीं कहते।