सुखई की छत पर एक ही चारपाई थी, और उस पर हमेशा उसी का हक़ रहता था, क्योंकि वहाँ बैठने कोई और आता ही नहीं था। रात का खाना ख़त्म होते ही वह ऊपर चढ़ जाता। नीचे गाँव सोने लगता और बत्तियाँ एक-एक करके बुझतीं, और ऊपर तारे एक-एक करके निकलते। सुखई को लगता था कि यह अदला-बदली किसी ने तय कर रखी है।
पहले बरस उसने बस देखा।
छत पर अकेले बैठने का एक फ़ायदा है जो अकेले बैठने वाले को भी नहीं मालूम होता। जब कोई बात करने वाला न हो, तो आदमी वही देखता है जो सामने है, और देर तक देखता है। नीचे गाँव में उस वक़्त आवाज़ें रहती हैं, बर्तन, कोई खाँसता हुआ, कहीं रेडियो। छत पर वे सब आती हैं, पर दूर से आती हैं और उनसे कुछ करना नहीं पड़ता।
सुखई की उम्र उस वक़्त दस थी। उसे यह अकेलापन नहीं लगता था। उसे यह छत लगती थी।
दूसरे बरस उसने एक चीज़ पकड़ी और वह उसने अपने आप पकड़ी, क्योंकि छत पर उसके अलावा कोई था ही नहीं।
जो तारा खाने के बाद नीम के ऊपर होता था, वह सोते वक़्त नीम के उस पार होता था।
यह उसे पहली बार अजीब लगा। तारे को हिलना नहीं चाहिए।
उसने अगली रात देखा और वही हुआ। फिर तीसरी रात।
पूरा आसमान खिसक रहा था। सारे तारे, एक साथ, एक ही तरफ़।
सुखई ने इसका मतलब नहीं निकाला। मतलब निकालने के लिए उसके पास कुछ था ही नहीं।
उसने वह किया जो उसके पास था। उसने नीम को पैमाना बना लिया।
नीम की सबसे ऊपर वाली डाल से जब वह तारा तीन उँगली ऊपर हो, तो खाने का वक़्त हो चुका है। जब वह डाल के बराबर आ जाए, तो नीचे सब सो चुके हैं। जब वह उस पार चला जाए, तो सुबह पास है।
यह घड़ी पूरे बरस काम नहीं करती। तारे मौसम के हिसाब से जगह बदलते हैं और यह भी उसे धीरे-धीरे मालूम हुआ।
इसलिए उसने हर महीने का अलग हिसाब बनाया।
इसमें उसे दो बरस लगे और उन दो बरसों में उसने कुछ रातें छोड़ीं भी, क्योंकि बरसात में आसमान दिखता ही नहीं। जुलाई और अगस्त के पन्ने इसीलिए अधूरे रहे और अधूरे ही रहे।
जाड़ों में देखना सबसे अच्छा होता है। हवा साफ़ रहती है और तारे ज़्यादा दिखते हैं। पर जाड़ों में छत पर लेटना मुश्किल है और सुखई रज़ाई लेकर ऊपर जाता था, जिस पर घर में टोका जाता था, क्योंकि रज़ाई ओस में भीग जाती है।
वह उसे कॉपी में लिखता था। एक पन्ना एक महीने का। ऊपर महीने का नाम, नीचे तीन-चार लकीरें, और उन पर निशान।
उस कॉपी को उसने किसी को नहीं दिखाया। दिखाने पर पहला सवाल यह आता कि इससे होगा क्या, और उसका जवाब उसके पास नहीं था। घड़ी घर में थी। गाँव में किसी को तारों से वक़्त जानने की ज़रूरत नहीं थी।
फिर भी उसने वह बनाई और तीन बरस बनाता रहा, और इसकी कोई वजह उसने कभी नहीं सोची।
तीसरे बरस बरसात में वह कॉपी भीग गई।
छत पर ही भीगी। वह उसे लेकर नीचे भागा था और सीढ़ी पर से गिर गया था और कॉपी नाली में चली गई थी।
स्याही बह गई। पन्ने आपस में चिपक गए।
सुखई उस रात नहीं सोया, और यह किसी दुख की वजह से नहीं था। वह यह सोच रहा था कि अब सब दोबारा करना पड़ेगा और उसमें तीन बरस लगेंगे।
अगले दिन उसने नई कॉपी ली और बैठ गया।
उसे सब याद था।
यह उसे ख़ुद हैरानी की बात लगी। उसने कभी याद करने की कोशिश नहीं की थी। उसने बस हर रात नीम की तरफ़ देखा था, तीन बरस, और नीम अब भी वहीं खड़ा था।
बारह महीने, हर महीने की लकीरें, और निशान। उसने वह सब एक ही बैठक में लिख दिया और बाद में जाँचकर देखा और उसमें कुछ ग़लत नहीं निकला।
वजह सीधी है और उस वक़्त उसे यह समझ नहीं आई। जो चीज़ आदमी ने ख़ुद देखी हो, वह लिखी हुई चीज़ से अलग जगह रहती है। लिखी हुई चीज़ भीग जाती है।
बीच के साल आसान नहीं थे। एक बार उसकी पूरी कॉपी बारिश में भीगकर ख़राब हो गई और उसे सब कुछ दोबारा लिखना पड़ा। एक बार जो कहानी उसने लिखी, उसे पढ़कर मास्टरजी ने कहा कि यह किसी और की नक़ल लगती है, जबकि वह उसकी अपनी थी। सुखई ने दोनों बार लिखना छोड़ दिया। और दोनों बार, कुछ हफ़्तों में, फिर शुरू कर दिया।
वह कॉपी अब भी उसके पास है। पहली वाली नहीं, दूसरी वाली। उसके पन्ने अब पीले पड़ चुके हैं और जुलाई-अगस्त वाले दोनों पन्ने आज भी अधूरे हैं।
अब भी कभी-कभी गाँव का कोई बच्चा उस छत पर चढ़ जाता है और तारों को देखता रहता है। सुखई उसे रोकता नहीं। वह जानता है कि उस बच्चे को भी शायद कोई आवाज़ सुनाई देगी। और यह भी जानता है कि वह आवाज़ कहाँ से आती है। कभी-कभी वह ख़ुद भी ऊपर चला जाता है। चारपाई अब भी वहीं पड़ी है। सुखई उस पर बैठता नहीं। वह बस बच्चे के पास खड़ा हो जाता है और उसके साथ ऊपर देखता रहता है, जब तक नीचे से किसी की आवाज़ न आ जाए। फिर दोनों चुपचाप उतर आते हैं।