सबसे पतला टुकड़ा हमेशा पिंटू के हिस्से में आता था। उस हफ़्ते का यह चौथा तरबूज़ चारपाई पर रखा था और वह उसे घूरकर देख रहा था।
नानी का गाँव यमुना के किनारे था और वहाँ गर्मियों में तरबूज़ नदी की रेत में उगते थे। बेलें रेत पर फैली रहती थीं और तरबूज़ आधे रेत में धँसे रहते थे। सुबह-सुबह भैंसा-गाड़ी भरकर आते थे और गली के मोड़ पर ढेर लगा दिया जाता था। ख़रीदने वाले उन्हें उँगली से ठोंककर देखते थे, क्योंकि पका हुआ तरबूज़ ठोंकने पर भारी और खोखली आवाज़ करता है और कच्चा तड़ाक से बजता है।
गर्मी की छुट्टियाँ ख़त्म होने में छह दिन बचे थे। बच्चे चार थे। सलोनी सबसे बड़ी थी, बारह की। गुड्डी दस की थी। नन्ही छह की थी। और पिंटू आठ का था।
काटने का काम नानी करती थीं।
उनके पास एक ही बड़ा चाकू था, लकड़ी के हत्थे वाला, जिसे वे हर बार काटने से पहले घड़े के पानी में डुबोकर पोंछ लेती थीं। वे तरबूज़ को बीच से चीरतीं, फिर हर आधे के चार-चार टुकड़े करतीं, और थाली में रखकर बाहर भेज देतीं।
आठ टुकड़ों में से कौन-सा किसको मिलेगा, यह बाहर तय होता था। और वह हमेशा एक ही तरह से तय होता था। सलोनी पहले उठाती थी। फिर गुड्डी। नन्ही को सलोनी ख़ुद उठाकर दे देती थी, क्योंकि नन्ही छोटी थी। और जो बचता था वह पिंटू का था।
पिंटू ने पाँच दिन गिने थे। पाँचों दिन उसका टुकड़ा सबसे पतला रहा था। छठे दिन उसने कहा कि आज मैं काटूँगा। नानी ने चाकू दे दिया। पिंटू ने तरबूज़ को बीच से चीरा और आठ टुकड़े किए। उसने बहुत ध्यान से किए। हर टुकड़े को उसने काटने से पहले उँगली से नापा भी।
फिर भी झगड़ा हो गया।
सलोनी ने कहा कि उसका टुकड़ा पतला है। गुड्डी ने कहा कि उसके टुकड़े में बीज ज़्यादा हैं। नन्ही ने कहना शुरू ही किया था कि सलोनी ने उसका टुकड़ा बदल दिया। पिंटू का टुकड़ा उस दिन भी सबसे आख़िर में बचा।
अगले दिन उसने दूसरा तरीक़ा सोचा।
उसने बाड़े से एक सीधी लकड़ी उठाई, बीच में डोरी बाँधी, और दोनों सिरों पर सरसों के तेल वाले डिब्बे के दो ढक्कन लटका दिए। ढक्कनों में उसने कील और पत्थर से तीन-तीन छेद किए और उनमें डोरी पिरोकर गाँठ लगा दी। एक ढक्कन पहली बार में टेढ़ा लटका, इसलिए उसे खोलकर दोबारा बाँधना पड़ा।
तराज़ू बन गया। उसने उसे बरामदे के खंभे से लटकाया और दोनों तरफ़ ख़ाली ढक्कन रखकर देखा। डंडा बराबर रुक गया। उस दोपहर उसने हर टुकड़े को तौला। और यहीं गड़बड़ हो गई। सबसे भारी टुकड़ा उठाकर उसने देखा तो उसमें लाल हिस्सा सबसे कम था और छिलका सबसे मोटा। सबसे हल्का टुकड़ा पूरा लाल था।
गुड्डी ने भारी वाला लेने से साफ़ मना कर दिया। सलोनी हँसने लगी। नन्ही ने भारी वाला उठा लिया और फिर रोने लगी। पिंटू ने तराज़ू खंभे पर लटका छोड़ दिया।
उस रात वह चारपाई पर लेटा-लेटा छत की तरफ़ देखता रहा।
उसे बीच का हिसाब मिल ही नहीं रहा था। छोटा-बड़ा आँख से नापो तो झगड़ा। तौल से नापो तो और बड़ा झगड़ा। डोरी से नापो तो गोल चीज़ की डोरी हर जगह अलग बैठती है। फिर उसे एक बात सूझी, और वह इतनी छोटी थी कि उसे हँसी आ गई।
अगली सुबह जब तरबूज़ आया, तो उसने चाकू उठाया और चारों को बुलाया। 'मैं काटूँगा,' उसने कहा। 'पर उठाऊँगा सबसे बाद में।' सलोनी ने कहा कि यह तो रोज़ ही होता है। 'रोज़ नहीं होता,' पिंटू बोला। 'रोज़ नानी काटती हैं।'
उसने तरबूज़ को बीच से चीरा और दोनों आधे अलग रख दिए। 'पहले दो हिस्से। सलोनी दीदी पहले उठाएँगी।' सलोनी ने दोनों आधों को देखा और बड़ा वाला उठा लिया। 'अब इसके दो हिस्से गुड्डी करेगी,' पिंटू ने कहा, 'और उठाओगी तुम नहीं, नन्ही उठाएगी।'
गुड्डी चाकू लेकर बैठ गई।
और तब सब लोगों ने वह चीज़ देखी जो उस दिन तक किसी ने नहीं देखी थी। गुड्डी ने काटने से पहले तीन बार नापा। उसने चाकू रखा, हटाया, फिर रखा। उसने बीज तक गिनने की कोशिश की।
क्योंकि जो बचेगा वही उसका होगा।
उसने जो दो टुकड़े काटे वे इतने बराबर थे कि नन्ही देर तक तय ही नहीं कर पाई कि कौन-सा उठाए। फिर दूसरे आधे की बारी आई। उसे पिंटू ने काटा और सलोनी ने उठाया। पिंटू ने भी बहुत देर लगाई। उसने छिलके की मोटाई देखी, लाल हिस्सा देखा, और चाकू को दो बार पीछे खींचा।
उस दिन उसका टुकड़ा पतला नहीं था। वह इतना बड़ा भी नहीं था कि किसी को बुरा लगे, और यही असल में उसे चाहिए था।
उसके बाद बचे हुए पाँच दिन इसी तरह बीते और एक बार भी झगड़ा नहीं हुआ। नन्ही को अब सबसे आख़िर में उठाना पसंद आने लगा था, क्योंकि उसे लगता था कि आख़िर में उठाने वाला बड़ा आदमी होता है।
छुट्टियों के आख़िरी दिन जब सामान बँधा, तो तराज़ू वहीं लटका रह गया। बरामदे के खंभे पर, डोरी समेत। जाते वक़्त पिंटू ने देखा कि नन्ही ने उसके एक ढक्कन में गुड़ की एक डली रख दी है और दूसरे में तीन कंकड़, और वह उसे दुकान बनाकर खेल रही है।