नया मटका चमक रहा था और उसका पानी गरम था। रुक्मा ने लोटा भरकर उँगली डाली। फिर उसने लोटा वापस उड़ेल दिया।
जेठ की दोपहर थी और बाहर लू चल रही थी। आँगन की मिट्टी पर नंगे पैर रखा नहीं जा सकता था, और गली में एक कुत्ता भी नहीं दिख रहा था। दादा को तीन दिन से बुख़ार था। वे और कुछ नहीं माँगते थे। बस ठंडा पानी माँगते थे, और गरम पानी देखते ही करवट बदल लेते थे।
पुराना मटका पिछले हफ़्ते फूट गया था।
वह चौदह बरस पुराना था और उसका पानी दाँत में लगता था। अम्मा ने बाज़ार से नया लाकर रख दिया था, बड़ा और चिकना, जिस पर लाल रंग की एक पट्टी भी बनी थी। पुराना वाला उस कुम्हार का बनाया हुआ था जो अब गाँव में नहीं रहता। नया शहर की दुकान से आया था, और वहाँ ढेर में सारे मटके एक जैसे थे, एक ही नाप के और एक ही चमक के।
उसका पानी सुबह भरो तो दोपहर तक वैसा ही रहता था। रुक्मा नौ बरस की थी और उसे यह बात ठीक नहीं लग रही थी। पहले उसने सोचा कि जगह ठीक नहीं है।
उसने मटका उठाकर अंदर वाले कमरे में रख दिया, जहाँ सबसे कम रौशनी आती थी और दीवार मोटी थी। वहाँ रखकर वह बाहर बैठ गई और दो घंटे इंतज़ार किया। दो घंटे बाद उसने उँगली डाली। पानी गरम था। दूसरी बार उसने बिट्टो से पूछा, जो उसकी सहेली थी, साथ वाले घर में रहती थी, और हर चीज़ का जवाब तुरंत दे देती थी।
बिट्टो ने कहा कि ऊपर गीला कपड़ा रख दो।
यह काम की बात लगी। रुक्मा ने अपना पुराना दुपट्टा भिगोया, निचोड़ा, और मटके के मुँह पर फैलाकर रख दिया। ढक्कन उसने ऊपर से दबा दिया ताकि हवा न लगे। शाम होने पर उसने ढक्कन उठाकर देखा। ढक्कन ठंडा था। कपड़ा ठंडा था। पानी गरम था।
उसने कपड़ा उतारकर एक तरफ़ फेंक दिया। तीसरी बार उसने पूरा मटका ही भिगोने की सोची। उसने लोटा भरकर ऊपर से डाला। पानी मटके की गोल पीठ पर से फिसला और सीधा नीचे ज़मीन पर चला गया। उसने दोबारा डाला। फिर डाला।
मटका उतना ही चमकीला रहा। उस पर एक बूँद नहीं ठहरी। रुक्मा वहीं बैठकर उसे देखती रही। और तभी उसे एक बात याद आई। पुराना मटका कभी सूखा नहीं दिखता था। उसकी पूरी पीठ हमेशा हल्की गीली रहती थी, चाहे कितनी भी गर्मी हो, और उसके नीचे की मिट्टी भी गीली रहती थी।
वह उठी और दौड़कर घर के पीछे गई, जहाँ अम्मा टूटी हुई चीज़ें फेंकती थीं।
टूटे मटके के टुकड़े वहीं पड़े थे, नीम के नीचे, जहाँ अम्मा ने फेंक दिए थे। बारह दिन से वे वहाँ पड़े थे और उन पर दिन भर धूप पड़ती थी। रुक्मा ने उनमें से सबसे बड़ा टुकड़ा उठाया, जो उसकी हथेली से थोड़ा बड़ा था।
वह बाहर से नम था। उसने उसे उलटकर देखा। अंदर की तरफ़ भी नम था। उसने उसे गाल से लगाया और वह ठंडा था। फिर उसने उस टुकड़े पर उँगली फेरी और नए मटके पर उँगली फेरी। पुराना खुरदुरा था। नया फिसलता था।
रुक्मा ने वह टुकड़ा हाथ में लिया और नए मटके के पास बैठ गई।
उसने टुकड़े की खुरदुरी धार मटके की पीठ पर रगड़नी शुरू की, ऊपर से नीचे, और फिर गोल-गोल। रगड़ने से एक आवाज़ आती थी, वैसी ही जैसी सिल पर मसाला पीसते वक़्त आती है, और हर बार थोड़ा-सा बारीक चूरा नीचे गिर जाता था। जहाँ से चमक जाती, वहाँ मिट्टी का असली भूरा रंग निकल आता था।
इसमें उसे पूरी दोपहर लग गई।
दायाँ हाथ दुखने लगा तो उसने बायाँ हाथ चला लिया। हथेली पर मिट्टी जम गई और नाख़ूनों के नीचे भर गई। बीच में एक बार मंटू आया और पूछा कि यह क्या हो रहा है। फिर वह मटके की दूसरी तरफ़ बैठकर उस पर उँगली से लकीरें बनाने लगा। रुक्मा ने उसे वहाँ से हटा दिया।
जब पूरा मटका मटमैला हो गया, तब उसने उस पर लोटे से पानी डाला। इस बार पानी फिसला नहीं। वह मटके की पीठ पर फैल गया और वहीं रुक गया, और थोड़ी देर में मटका पूरा गीला दिखने लगा। उसने मटका उठाकर दरवाज़े की चौखट के पास रखा, जहाँ बाहर की गरम हवा सीधी अंदर आती थी और कमरे में से होकर पीछे निकल जाती थी।
फिर वह चौखट के पास ही बैठ गई और इंतज़ार करने लगी। बाहर तीन बज रहे थे और पूरे गाँव में सिर्फ़ दो आवाज़ें थीं, एक पंखे की और एक दूर की चक्की की। शाम को जब सूरज नीम के पीछे चला गया और दीवार की छाँव आँगन के बीच तक आ गई, तब उसने लोटा भरा।
उसने उँगली नहीं डाली। उसने पूरा लोटा दोनों हाथों से पकड़ लिया। लोटा ठंडा था।
वह उसे लेकर अंदर गई। दादा ने आँख खोली, लोटा पकड़ा, और आधा एक साँस में पी गए। फिर उन्होंने बाक़ी आधा भी पिया और लोटा ख़ाली करके उसे वापस दे दिया। उन्होंने पूछा कि पुराना वाला जुड़ गया क्या।
रुक्मा ने कहा कि नहीं, नया ही है।
उस दिन के बाद मटका उसी चौखट के पास रहा और उसकी पीठ हमेशा गीली रहती थी। नीचे रखी मिट्टी की थाली में रुक्मा ने पुराने मटके का वह टुकड़ा रख दिया था, जिससे उसने रगड़ा था, और वह टुकड़ा वहाँ हर वक़्त पानी में डूबा रहता था और कभी सूखता नहीं था।