सीट बसंती के कंधे तक आती थी।
साइकिल दीवार से टिकी थी और उसे नापने के लिए बसंती को उसके बग़ल में खड़ा होना पड़ा था। जेठ की छुट्टियाँ थीं और गली में दोपहर को कोई नहीं निकलता था। यही बसंती के काम की बात थी। साइकिल भइया की थी। बंटी चौदह का था और गर्मियों में मामा के यहाँ चला गया था, पूरे डेढ़ महीने के लिए, और साइकिल घर पर छूट गई थी।
जाते वक़्त उसने कहा था कि हाथ मत लगाना।
वह काली साइकिल थी, बड़े पहियों वाली, जिसके अगले डंडे पर जंग के दो धब्बे थे और घंटी बजती नहीं थी, बस खरखराती थी। कैरियर पर एक रबर बँधा रहता था और उसमें भइया की किताबें फँसाई जाती थीं। बसंती नौ बरस की थी और चार फ़ुट की भी नहीं थी।
पहले दिन उसने साइकिल दीवार से खींचकर बाहर निकाली और सीट पर चढ़ने की कोशिश की। उसने पैडल पर पैर रखकर ऊपर उठने की कोशिश की और तीसरी बार में वह सीट पर पहुँच भी गई। पर सीट पर बैठते ही उसके दोनों पैर हवा में लटक गए। नीचे वाला पैडल उसके पैर से डेढ़ बालिश्त दूर था।
साइकिल एक तरफ़ को गिरी। वह भी साथ गिरी। घुटने पर मिट्टी लगी और चेन का तेल कुहनी पर लग गया। अगले दिन उसने सीट नीची करने की सोची। उसने रसोई से पाना ढूँढ़ा और नहीं मिला, इसलिए उसने प्लास से नट घुमाने की कोशिश की। नट घूमा नहीं। वह जंग खाकर वहीं बैठ चुका था।
उसने मिट्टी का तेल डाला और आधा घंटा इंतज़ार किया। फिर पूरा ज़ोर लगाया। नट थोड़ा-सा हिला। सीट डेढ़ इंच नीचे आई और वहीं अटक गई, क्योंकि नीचे का डंडा पूरा अंदर जा चुका था। डेढ़ इंच से कुछ नहीं हुआ।
तीसरे दिन उसने सोचा कि सीट पर बैठना ज़रूरी ही नहीं है। उसने साइकिल को दीवार के पास लगाया, चबूतरे पर चढ़ी, और वहाँ से पैडल पर सीधा पैर रखा। फिर उसने खड़े-खड़े पैडल दबाया। साइकिल चल पड़ी।
तीन क़दम चली।
फिर उसे यह समझ आया कि जो चीज़ शुरू होती है उसे रोकना भी पड़ता है, और रोकने के लिए ज़मीन पर पैर चाहिए, जो उसके पास नहीं था। साइकिल नीम के तने से जाकर रुकी।
चार दिन उसने यही किया। चबूतरे से चढ़ो, चलो, किसी चीज़ से टकराकर रुको। एक दिन वह भूसे के ढेर में जाकर रुकी, जो सबसे आराम की जगह थी, और एक दिन पड़ोस की दीवार से, जो सबसे कम आराम की।
कुहनी छिल गई और अम्मा ने पूछा तो उसने कहा कि गिर गई थी। सातवें दिन वाली बात उसने जानबूझकर नहीं की।
उस दिन वह ज़मीन से ही चलाने की कोशिश कर रही थी। बाएँ पैडल पर बायाँ पैर, दायाँ पैर ज़मीन पर, और धक्का देकर थोड़ा-सा सरकना। ऐसे साइकिल चलती तो थी, पर एक ही पैडल से चलती थी और हर धक्के के बाद रुक जाती थी।
उसे दूसरे पैडल तक पहुँचना था और दूसरा पैडल साइकिल के उस पार था। उसने झुककर, साइकिल को अपनी तरफ़ खींचकर, दायाँ पैर ऊपर की तरफ़ फेंका। पैर ऊपर से नहीं गया। वह अगले डंडे के नीचे से, फ्रेम के बीच वाले तिकोने खाने में से होकर, दूसरी तरफ़ निकल गया और सीधा दाएँ पैडल पर जा पड़ा।
बसंती ने बिना सोचे उसे दबा दिया। साइकिल चल पड़ी।
इस बार वह तीन क़दम नहीं चली। वह चलती चली गई। बसंती का आधा शरीर साइकिल के एक तरफ़ था और एक पैर बीच में से निकलकर दूसरी तरफ़, और वह टेढ़ी होकर लटकी हुई थी, पर दोनों पैडल घूम रहे थे।
पंद्रह क़दम बाद वह गिरी। गिरते वक़्त भी उसे हँसी आ रही थी। उसके बाद के दिन उसी एक चीज़ में गए।
अगला डंडा उसकी पसली में गड़ता था, इसलिए उसने वहाँ पुराना गमछा लपेट लिया। रोकने के लिए उसने सीखा कि पैडल उलटा दबाओ, क्योंकि उस साइकिल में पिछला ब्रेक ऐसे ही लगता था। मुड़ने में सबसे ज़्यादा वक़्त लगा, क्योंकि उस हालत में शरीर एक ही तरफ़ झुकाया जा सकता है। बाईं तरफ़ मुड़ना उसे जल्दी आ गया और दाईं तरफ़ मुड़ने में उसे नौ दिन लगे।
जेठ की दोपहरें उसने इसी में ख़र्च कीं, जब गली ख़ाली रहती थी और कोई देखने वाला नहीं होता था। एक दोपहर वह गली से निकलकर बाहर वाली सड़क तक चली गई। फिर नहर के पुल तक। पुल पर उसने साइकिल रोकी, उतरी, और वापस मुड़कर देखा कि वह कितनी दूर आ चुकी है। गाँव के नीम का ऊपरी हिस्सा भर दिख रहा था।
लौटते वक़्त हवा सामने से थी। ज़ोर बहुत लगाना पड़ा।
उस शाम उसने अम्मा को बताया। अम्मा ने पहले डाँटा, फिर पूछा कि तू बैठती कैसे है, और फिर बाहर आकर देखा। बसंती ने गली में एक चक्कर लगाकर दिखाया। अम्मा ने उसे रोका नहीं, बस इतना कहा कि पुल के उस पार नहीं जाना।
बंटी जुलाई में लौटा।
उसने सबसे पहले सीट देखी। वह वहीं थी जहाँ वह छोड़कर गया था, डेढ़ इंच नीचे। फिर उसने घंटी बजाई, जो अब भी खरखराती थी।
फिर उसकी नज़र अगले डंडे पर गई। उसकी बाईं तरफ़, बीच में, जंग वाले दोनों धब्बों के बीच की जगह घिसकर चिकनी और चमकीली हो चुकी थी, ठीक उतनी लंबी जितनी एक पसली होती है, और उस पूरी बरसात में उस पर दोबारा जंग नहीं लगी।