पंख वाली दीमक साल में एक ही रात उड़ती है। सोमा को यह बात दो बरस से मालूम थी और दोनों बरस वह उस रात सो चुका था। कोरापुट की उस तरफ़ बारिश जून के दूसरे हफ़्ते में आती है और उसके बाद ज़मीन भीगती चली जाती है।
किसी एक शाम, पहली अच्छी बारिश के तीन-चार दिन बाद, दीमक की बाँबियों से पंख वाली दीमक निकलती है। हज़ारों। वे रौशनी की तरफ़ उड़ती हैं और घंटे-दो घंटे में उनके पंख गिर जाते हैं। उसी दो घंटे का सारा खेल है।
उन्हें पकड़ने का तरीक़ा पुराना है। बल्ब के नीचे पानी भरी थाली रख दो। दीमक रौशनी में आती है, पानी पर गिरती है, और उड़ नहीं पाती। फिर उन्हें छानकर, पंख अलग करके, नमक डालकर भूना जाता है। पंख अलग करना सबसे लंबा काम है और वह बच्चों के हिस्से आता है।
सोमा की दादी उसे साल में एक बार यही खिलाती थीं और वे उसका इंतज़ार पूरे बरस करती थीं। पिछले बरस दीमक उड़ी थी और वह उस रात नानी के गाँव में था।
उससे पिछले बरस वह घर पर ही था, पर आठ बजे सो गया था, और सुबह उठा तो आँगन भर पंख पड़े थे और थाली में कुछ नहीं बचा था। इस बरस उसने तय किया कि वह जागेगा। यहीं दिक़्क़त थी।
बारिश जून में रोज़ पड़ती है। हर शाम लगता है कि आज वाली रात है। सोमा तेरह रात जागा और तेरहों रात कुछ नहीं हुआ, और चौदहवीं रात उसकी आँख लग गई।
चौदहवीं रात दीमक उड़ी।
इस बार उसने पंख देखे और दादी की थाली भी देखी, जो आधी भरी थी, क्योंकि दादी ने उसे रख तो दिया था पर वे ख़ुद बैठ नहीं सकती थीं।
तीन बरस में तीन बार।
सोमा उस दिन दोपहर में बाँबी के पास जाकर बैठ गया। उसने सोच लिया था कि अब वह आसमान नहीं देखेगा, क्योंकि आसमान तो सबने देखा था और सबसे चूक हुई थी।
उनके खेत के कोने में एक पुरानी बाँबी थी, आदमी की कमर तक ऊँची, सख़्त मिट्टी की, जिसे कोई तोड़ता नहीं था। उसी में से हर बरस दीमक निकलती थी। उसने उसे ध्यान से देखा। ऊपर से, फिर नीचे बैठकर बग़ल से, और फिर उतने पास से कि नाक लगभग मिट्टी से छू गई।
और तब उसे एक बात दिखी जो उसने आज तक नहीं देखी थी, इसलिए नहीं कि वह छिपी थी, बल्कि इसलिए कि उसने कभी देखने की कोशिश ही नहीं की थी।
बाँबी की सतह चिकनी नहीं थी।
उस पर जगह-जगह छोटे-छोटे उभार बने हुए थे, चने के दाने जितने, और हर उभार के बीच में एक बारीक छेद था। वे नए थे। उनकी मिट्टी बाक़ी बाँबी से गहरे रंग की थी और गीली थी। सोमा ने उन्हें गिना। इक्कीस थे।
उस रात दीमक नहीं उड़ी। सोमा फिर भी बारह बजे तक जागा। अगले दिन दोपहर में वह फिर गया।
उभार अब भी थे और उनकी गिनती इक्कीस से बढ़कर कोई सौ के आसपास हो चुकी थी। पूरी बाँबी उनसे भरी हुई थी और वह छूने पर खुरदुरी लग रही थी।
उस शाम बारिश हल्की पड़ी और हवा बिलकुल बंद थी। सोमा ने दादी से कहा कि थाली रख दें। दादी ने पूछा कि तुझे कैसे मालूम। उसने कहा कि बाँबी पर छेद हो गए हैं।
थाली रखी गई। उसमें दो उँगली पानी डाला गया। बल्ब जलाया गया। और सोमा दरवाज़े की चौखट पर बैठ गया, जहाँ से बल्ब और बाँबी वाला कोना दोनों दिखते थे। सात बजकर चालीस मिनट पर पहली दीमक आई।
आठ बजे तक हवा में इतनी थीं कि बल्ब की रौशनी हिलती हुई दिख रही थी। वे मुँह पर, बालों में, हाथों पर बैठ रही थीं और उनके पंख छूते ही गिर जाते थे।
थाली दस मिनट में भर गई।
सोमा ने उसे उठाकर अंदर रखा और दूसरी थाली रख दी। फिर तीसरी। मंगली और उसके दो चचेरे भाई भी आ गए और चारों बारी-बारी से थाली बदलते रहे। साढ़े नौ बजे तक सब ख़त्म हो गया। उतनी ही देर में जितनी देर बताई जाती है। फ़र्श पर पंख की एक परत बिछ गई थी और उसे झाड़ू से समेटना पड़ा।
उस रात दादी ने भूना। लोहे की उसी कड़ाही में जो साल में इसी एक रात निकलती है। नमक और थोड़ी हल्दी, और कुछ नहीं, क्योंकि उसमें और कुछ डालने की ज़रूरत नहीं होती। सोमा ने आधा उसी रात खाया और आधा अगली सुबह।
उसके बाद हर बरस उसी घर से पहली ख़बर जाती है।
जून में जब बारिश शुरू होती है, तो पड़ोस के लोग सोमा से पूछते हैं कि बाँबी पर क्या हाल है, और वह देखकर बता देता है। ग़लत वह अब तक दो बार हुआ है, दोनों बार तब जब दीमक ने बीच में बारिश रुक जाने से एक दिन और रुक लिया।
बाँबी अब भी खेत के उसी कोने में है।
उसके चारों तरफ़ हल नहीं चलाया जाता और उसे छुआ नहीं जाता, जो पहले भी नहीं जाता था, पर अब इसकी वजह अलग है। जून की दोपहरों में सोमा वहाँ जाकर बैठता है और मिट्टी पर हाथ फेरकर देखता है, और जिस दिन उँगलियों के नीचे खुरदुरापन आ जाता है, उस दिन शाम को घर में थालियाँ निकाल ली जाती हैं।