बारिश के तीसरे दिन से आवाज़ शुरू हुई। वह पीछे वाली नाली से आती थी और रात के नौ बजे से लेकर सुबह तक चलती रहती थी।
गुलाबो को उससे कोई मतलब नहीं था। वह आवाज़ हर बरसात में आती थी और वह उसे सुने बिना सो जाती थी, जैसे बस्ती के बाक़ी सब लोग सो जाते थे। चुन्नू चार बरस का था और वह नहीं सो पा रहा था।
बालाघाट की उस बस्ती में घरों के पीछे एक चौड़ी नाली जाती है, जो गर्मियों में सूखी रहती है और बरसात में भर जाती है। भरते ही उसमें मेंढक आ जाते हैं।
उनकी आवाज़ एक जैसी नहीं होती। कुछ लगातार टर्राते हैं, कुछ रुक-रुककर, और बीच-बीच में कोई एक ऐसी आवाज़ निकालता है जो बाक़ी सबसे अलग होती है और जो सुनने में किसी के गले से निकली हुई लगती है। चुन्नू को वही सबसे बुरी लगती थी। बाक़ी सब आवाज़ों के बीच वह अलग से सुनाई देती थी और हर बार अचानक आती थी।
पहले दो दिन वह बस सटकर सोता रहा। तीसरी रात वह रोने लगा। चौथी रात उसने कहा कि नाली में कोई है, और यह उसने ऐसे कहा जैसे कोई बात बता रहा हो, डर से नहीं। गुलाबो ने उसे बताया कि मेंढक हैं।
उसने कहा कि नहीं हैं। उसने फिर बताया, और इस बार ज़्यादा समझाकर बताया, कि बरसात में मेंढक आते हैं और बोलते हैं और उनसे कुछ नहीं होता। चुन्नू ने कहा कि तुमने देखे हैं? गुलाबो ने कहा कि नहीं देखे, पर सब यही कहते हैं।
इस पर चुन्नू चुप हो गया और उस रात भी नहीं सोया। दूसरी कोशिश में गुलाबो ने खिड़की बंद कर दी।
यह उलटा पड़ा। बंद खिड़की से आवाज़ कम नहीं हुई, बस बदल गई। अब वह दबी हुई आती थी, और दबी हुई आवाज़ से डर ज़्यादा लगता है, क्योंकि उसमें यह लगता है कि कोई कुछ छिपा रहा है।
उस रात चुन्नू ने खिड़की खुलवा दी। तीसरी कोशिश में उसने रात भर दिया जलाकर रखा, यह सोचकर कि रोशनी में डर कम लगता है। उससे यह हुआ कि दीवार पर परछाइयाँ बनने लगीं और चुन्नू उन्हें देखता रहा। चौथी रात गुलाबो ने टॉर्च उठा ली।
यह उसने सोचकर नहीं किया। उसे नींद नहीं आ रही थी और चुन्नू सिसक रहा था, इसलिए उसने उसका हाथ पकड़ा और कहा कि चल।
बाहर बारिश हल्की पड़ रही थी।
दोनों ने चप्पल पहनी और पीछे के दरवाज़े से निकले। नाली घर से बीस क़दम थी और उसका किनारा घास से भरा था। कीचड़ में पैर धँस रहे थे और चुन्नू दो बार फिसलते-फिसलते बचा। जैसे-जैसे वे पास गए, आवाज़ें बंद होती गईं।
यह मेंढक हमेशा करते हैं। पास आने पर चुप हो जाते हैं। पंद्रह क़दम की दूरी पर आधी आवाज़ें बंद हो चुकी थीं और किनारे तक पहुँचते-पहुँचते पूरी नाली चुप हो गई। चुन्नू ने गुलाबो का हाथ कसकर पकड़ लिया।
गुलाबो ने टॉर्च नीचे की और धीरे-धीरे किनारे पर घुमाई। पहले कुछ नहीं दिखा। फिर घास के एक गुच्छे के पास, कीचड़ में, एक मेंढक बैठा दिखा। वह बहुत छोटा था।
अँगूठे से थोड़ा बड़ा, भूरे रंग का, और उसकी पीठ पर दो गहरी लकीरें थीं। वह हिला नहीं। टॉर्च की रोशनी में उसकी आँखें चमक रही थीं और उसका गला हल्के-हल्के फूल-पिचक रहा था।
गुलाबो ने उसे उठा लिया।
मेंढक हाथ में आते ही एक बार उछला और फिर शांत हो गया। वह ठंडा था और गीला था और उसका वज़न लगभग कुछ नहीं था। उसने उसे चुन्नू की हथेली पर रख दिया और उसके ऊपर अपना हाथ रख दिया, ताकि वह कूदकर भाग न जाए।
चुन्नू ने पहले हाथ खींचा। फिर उसने उसे दोनों हथेलियों में लिया। वे वहीं बैठे रहे। बारिश पीठ पर पड़ती रही और दोनों में से किसी ने उठने को नहीं कहा।
दो-तीन मिनट बाद, जब वे चुपचाप बैठे रहे, नाली में एक आवाज़ शुरू हुई। फिर दूसरी। फिर पाँच-छह एक साथ। और थोड़ी देर में पूरी नाली फिर बोलने लगी, ठीक वैसे ही जैसे कमरे में सुनाई देती थी। चुन्नू के हाथ में जो मेंढक था, वह भी उसी बीच में एक बार बोला।
उसका गला फूला और उसमें से वही आवाज़ निकली जो सबसे अलग लगती थी और जिससे वह चार रात से डर रहा था।
उतनी छोटी चीज़ से।
चुन्नू हँसने लगा। पहले धीरे, फिर इतनी ज़ोर से कि नाली फिर एक बार चुप हो गई और उन्हें दोबारा इंतज़ार करना पड़ा।
उन्हें अंदर आते-आते बारह बज गए और दोनों पूरे भीग चुके थे। अम्मी ने दरवाज़े पर पकड़ लिया और गुलाबो को एक थप्पड़ पड़ा, क्योंकि बरसात की रात में छोटे बच्चे को बाहर ले जाना कोई अच्छी बात नहीं है।
चुन्नू उस रात दस मिनट में सो गया। अगली बरसात में वह पाँच का था और उसने पहली आवाज़ सुनते ही टॉर्च माँगी।
नाली आज भी हर बरसात में भरती है और आज भी उसमें से रात भर आवाज़ आती है। पीछे वाले दरवाज़े के पास, चौखट के ऊपर वाली ताक़ पर, अब एक टॉर्च रखी रहती है, और उसे वहाँ चुन्नू ने रखा है, गुलाबो ने नहीं।