नानी उस बरस फ़र्श पर सो रही थीं और फ़र्श हर रात गीला हो जाता था। रजिया ग्यारह की थी और उसे यही बात सबसे ज़्यादा खटक रही थी। उनका घर दरभंगा की एक पुरानी गली में था। दो कमरे, बीच में आँगन, और आँगन के कोने में नाली, जिससे पानी गली की बड़ी नाली में जाता था।
बरसात में उस गली में पानी भर जाता है। गली नीची है और उसके दोनों सिरों पर सड़कें ऊँची हो चुकी हैं, इसलिए पानी वहीं इकट्ठा होता है। यह हर बरस होता है और इसे लेकर कोई परेशान नहीं होता। घुटने तक भरता है, दो घंटे रुकता है, और उतर जाता है।
पर उस बरस अंदर वाला कमरा भी भीगने लगा।
सुबह उठने पर दरवाज़े से लेकर बीच तक फ़र्श पर पानी की एक पतली परत मिलती थी। ज़्यादा नहीं, बस इतनी कि बिस्तर के किनारे गीले हो जाएँ। दिन भर वह सूखता नहीं था, क्योंकि उन दिनों धूप निकलती ही नहीं।
नानी पचहत्तर की थीं और चारपाई पर चढ़-उतर नहीं सकती थीं, इसलिए उनका बिस्तर नीचे ही लगता था। घर में सब लोग उसे रोकने में लगे थे। अम्मी ने पहले पुराने कपड़ों की मोटी रस्सी बनाकर दरवाज़े के नीचे लगाई। दो रात काम आई, फिर वह ख़ुद गीली रहने लगी और उससे बू आने लगी।
फिर भाई ने बाहर से मिट्टी लाकर देहरी के बाहर एक बाँध जैसा बना दिया। उससे यह हुआ कि गली का पानी ठहरकर बाँध के अंदर की तरफ़ जमा रहने लगा और तीसरी रात मिट्टी बैठ गई। फिर मामा आए। उन्होंने असली काम किया।
उन्होंने मिस्त्री बुलाकर देहरी पर सीमेंट की एक पट्टी डलवा दी, चार उँगली ऊँची, दरवाज़े की पूरी चौड़ाई में। अब गली का पानी अंदर नहीं आ सकता था, चाहे कितना भी भरे।
उस रात सबने चैन की साँस ली। पट्टी मज़बूत थी। अगली सुबह फ़र्श गीला था। अम्मी ने कहा कि पट्टी में कहीं दरार होगी। मिस्त्री दोबारा आया और उसने पट्टी के दोनों सिरों पर और सीमेंट लगा दिया। उसकी अगली सुबह भी फ़र्श गीला था।
रजिया ने उस दिन एक चीज़ ध्यान से देखी। उस रात गली में पानी भरा ही नहीं था। शाम को हल्की बारिश हुई थी और गली सूखी रह गई थी। फिर भी फ़र्श गीला था। यानी पानी गली से नहीं आ रहा था।
अगली रात वह जागी। किसी को बताया नहीं, वरना उसे सुला दिया जाता। उसने अपनी चटाई दरवाज़े के पास डाल ली और लालटेन नीची करके पास रख ली। बारह बजे तक कुछ नहीं हुआ। एक बजे बाहर बारिश तेज़ हो गई।
डेढ़ बजे उसने देखा। पानी दरवाज़े के नीचे से नहीं आ रहा था। वह आँगन की तरफ़ से आ रहा था। वह उठकर आँगन में गई। पैरों के नीचे पानी था और वह ठंडा नहीं था, गली के पानी जैसा भी नहीं था।
आँगन के कोने वाली नाली भरी हुई थी और उसमें से पानी उलटकर आँगन में फैल रहा था, और आँगन से बहकर कमरे में जा रहा था। नाली भरी क्यों थी, यह उसे सुबह समझ आया। उजाले में।
उस नाली का पानी दीवार में बने एक छेद से निकलकर गली की बड़ी नाली में गिरता था। वह छेद देहरी के पास ही था, ज़मीन से दो उँगली ऊपर। और सीमेंट की नई पट्टी उस छेद के आगे से होकर गुज़र रही थी।
मिस्त्री ने पट्टी दरवाज़े की पूरी चौड़ाई में डाली थी और उसका एक सिरा उस छेद के ऊपर चढ़ गया था। बाहर का पानी रुक गया था, और साथ में अंदर का पानी भी। रजिया ने अम्मी को बताया। अम्मी ने कहा कि मामा ने पैसे लगाकर बनवाई है, तोड़ेंगे कैसे।
उस दिन दोपहर में, जब घर में कोई नहीं था, रजिया ने कील और पत्थर उठाया।
उसने पट्टी पूरी नहीं तोड़ी। उसने सिर्फ़ छेद वाले हिस्से पर कील रखकर ठोंकना शुरू किया, और उसे तोड़ने में उसे डेढ़ घंटा लगा, क्योंकि सीमेंट नया था पर पत्थर की तरह जमा हुआ था। उसने बस उतना तोड़ा जितने में छेद खुल जाए।
टुकड़ा गिरते ही नाली का जमा हुआ पानी उस छेद से बाहर निकलना शुरू हुआ और वह इतनी तेज़ी से निकला कि आँगन में गड्ढा जैसा दिखने लगा। शाम को भाई ने देखा और वह चिल्लाने लगा। रजिया चुप रही और उसने सिर्फ़ यह कहा कि आज रात देख लेना।
फिर बारिश हुई। उस रात गली में पानी भरा और पट्टी ने उसे रोक लिया, जैसा उसे रोकना चाहिए था। और आँगन का पानी छेद से बाहर चला गया, जैसा वह बीस बरस से जाता आया था।
सुबह फ़र्श सूखा था। पूरा सूखा।
मामा को यह बात एक हफ़्ते बाद बताई गई और उन्होंने कोई ख़ास कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस मिस्त्री को फ़ोन करके पूछा कि छेद उसने देखा क्यों नहीं था। नानी उसी कमरे में सोती रहीं और उनका बिस्तर उसके बाद उस बरसात में गीला नहीं हुआ।
पट्टी आज भी वहीं है और उसका बाक़ी हिस्सा साबुत है। सिर्फ़ छेद वाली जगह पर उसमें एक टेढ़ा-मेढ़ा कटाव है, जिसके किनारे किसी औज़ार से नहीं, कील से तोड़े गए लगते हैं, और उसे किसी ने आज तक भरा नहीं।