चार तने बाँधे गए और नाव फिर बीच से फैल गई। जोनाली किनारे पर खड़ी थी और उसने यह तीसरी बार होते देखा।
माजुली में जून के बाद पानी चढ़ता है। खेतों के बीच से रास्ते बंद हो जाते हैं। जो जगह मई में पैदल पार होती थी, वह अगस्त में कमर तक भरी रहती है।
उन दिनों बच्चों के लिए सबसे बड़ी चीज़ केले के तने की नाव होती है। बड़ों के पास असली नाव होती है और वे उससे हाट जाते हैं, पर बच्चों को उसमें बैठने भर मिलता है, चलाने नहीं।
केले का तना पानी पर तैरता है। वह भारी दिखता है, पर उसके अंदर परतें होती हैं और उन परतों के बीच हवा रहती है। इसलिए वह डूबता नहीं। तीन-चार तने साथ बाँध दो तो उन पर दो बच्चे बैठ सकते हैं।
बड़े लड़के हर बरसात में बनाते थे। इस काम को वे अपना मानते थे। इस बार वे तीन तनों से शुरू हुए थे। नाव बनी और पानी में डालते ही उसके तने अलग-अलग तरफ़ खिसकने लगे और बीच वाला नीचे बैठ गया।
उन्होंने कहा कि तने कम हैं। और एक काट लाओ। उन्होंने चौथा काटा और उसे भी साथ बाँध दिया, पहले वाली रस्सी को और कसकर। इस बार वह पहले से भी जल्दी फैली। पाँचवें तने पर भी यही हुआ। और रस्सी ख़त्म हो गई।
अब उनके पास पाँच तने थे, तीस हाथ रस्सी थी, और पानी में एक ऐसी चीज़ थी जो नाव कम और तैरता हुआ ढेर ज़्यादा लगती थी। जोनाली दस बरस की थी और उसे किसी ने बुलाया नहीं था। वह घाट पर इसलिए खड़ी थी कि उसकी माँ ने उसे दो बर्तन धोने भेजा था और उसने वे बर्तन आधे घंटे पहले धो लिए थे।
उसने तीनों बार ध्यान से देखा था। पानी में नहीं, बँधाई में। और तीनों बार उसे एक ही चीज़ दिखी थी। तने अलग नहीं हो रहे थे। रस्सी ढीली नहीं हो रही थी। तने अपनी जगह पर घूम रहे थे। हर तना, अपने आप, अलग-अलग।
गोल चीज़ को रस्सी से बाँधो तो वह रस्सी के अंदर ही करवट ले लेती है। जितना कसो, उतना ही वह घूमेगी, क्योंकि रस्सी उसे पकड़ती है, रोकती नहीं। और जब पाँच गोल चीज़ें अलग-अलग करवट लें, तो बीच वाली नीचे चली जाती है और किनारे वाली ऊपर उठ आती हैं।
जोनाली ने पास जाकर यह कहा। एक बार कहा। बड़े लड़कों ने उसकी बात नहीं सुनी, क्योंकि वह लड़की थी और दस की थी और उसने कभी नाव नहीं बनाई थी।
उसने दोबारा नहीं कहा।
वह घर गई और बाड़े से बाँस का एक टुकड़ा उठा लाई, हाथ भर लंबा और अँगूठे जितना मोटा। वह टुकड़ा वहाँ पड़ा हुआ था और किसी काम का नहीं था, इसलिए उससे किसी ने कुछ नहीं पूछा। फिर उसने अपनी छोटी बहन को बुलाया और दोनों ने अपनी नाव बनाई।
उन्होंने सिर्फ़ तीन तने लिए, पाँच नहीं।
उन्हें बराबर रखकर, जोनाली ने बाँस का टुकड़ा तीनों तनों के आर-पार, ऊपर की तरफ़ रख दिया, और फिर रस्सी से हर तने को उस बाँस के साथ अलग-अलग बाँधा।
यही पूरा फ़र्क़ था। बस इतना।
अब हर तना रस्सी से नहीं, बाँस से बँधा हुआ था। घूमने की कोशिश करता तो बाँस उसे रोक लेता, क्योंकि बाँस सीधा है और वह करवट नहीं लेता। उसने दूसरा टुकड़ा दूसरे सिरे पर भी बाँध दिया। फिर दोनों ने उसे पानी में उतारा।
वह सीधी तैरी। एक तरफ़ भी नहीं झुकी।
जोनाली उस पर बैठी और वह ज़रा-सा झुकी और फिर संभल गई। उसकी बहन भी चढ़ गई और तब भी वह सीधी रही। बाँस के नीचे तने अपनी जगह पर रहे और एक भी नहीं घूमा। बड़े लड़के किनारे पर आ गए। पहले दो, फिर सब।
उन्होंने पहले कहा कि तीन तनों पर दो ही चढ़ सकते हैं, जो सही था। फिर उनमें से एक ने चुपचाप बाँस देखा और कुछ नहीं कहा।
उस दोपहर वे अपनी वाली खोलकर दोबारा बनाने लगे। उन्होंने पाँचों तने रखे और उनके ऊपर दो बाँस डाले, और उनकी नाव पर चार लड़के चढ़ गए और वह भी सीधी तैरी। किसी ने जोनाली से यह नहीं कहा कि तरीक़ा तुम्हारा था।
उसे इससे फ़र्क़ भी नहीं पड़ा, क्योंकि उस पूरी बरसात में उसकी अपनी नाव पानी में रही और उसने उससे तीन बार दूसरी तरफ़ के खेत तक का चक्कर लगाया, जहाँ अकेले जाना मना था। सितंबर में पानी उतर गया और तने सूखने लगे।
सूखा हुआ केले का तना काग़ज़ जैसा हल्का हो जाता है और उसे जलावन में डाल दिया जाता है। तीनों तने उसी में गए।
बाँस के दोनों टुकड़े जोनाली ने नहीं जलाए। उन पर रस्सी के घिसने के निशान बने हुए थे, तीन-तीन जगह, बराबर दूरी पर। उसने उन्हें छप्पर के नीचे वाली धन्नी पर रख दिया, जहाँ घर का बचा हुआ सामान रखा जाता है, और अगली बरसात में वे वहीं से उतारे गए।