पहली बारिश के बाद ग्यारहवें दिन जामुन गिरने लगे। कजरी ने पेड़ के नीचे खड़े होकर ऊपर देखा। गिनने की कोशिश की। फिर छोड़ दी। वह पेड़ तालाब के किनारे था और गाँव का सबसे बड़ा पेड़ था। उसकी आधी शाख़ें पानी के ऊपर झुकी हुई थीं और आधी घास वाली ज़मीन पर।

यही उस पेड़ की सबसे बड़ी दिक़्क़त थी।

जो जामुन पानी की तरफ़ गिरते थे वे तैरकर किनारे लग जाते थे और भीगकर फूल जाते थे। जो घास में गिरते थे वे लंबी गीली घास में ऐसे खो जाते थे कि ढूँढ़ने में उतना ही वक़्त लगता जितना खाने में मज़ा आता।

और जो हाथ आते थे उनमें से आधे फूटे होते थे।

जामुन गिरकर फूट जाता है। वह नरम फल है। छह-सात हाथ से भी गिरे तो छिलका फट जाता है और रस निकल आता है, और फिर उस पर चींटियाँ लग जाती हैं। पेड़ पर चढ़ने वाले चार लड़के थे। टुनटुन सबसे ऊपर तक जाता था। हलधर बीच वाली मोटी डाल तक। बाक़ी दो नीचे वाली शाख़ों पर रहते थे और वहीं से हिलाते थे।

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हिलाने पर जामुन बरसते हैं। यही सबको सबसे अच्छा लगता है। ऊपर से देखने में ओले जैसे गिरते हैं और नीचे खड़े बच्चे चिल्लाते हैं। कजरी नौ बरस की थी। उसे चढ़ना नहीं आता था।

उसने दो बार कोशिश की थी और दोनों बार तने के आधे पर से उतर आई थी, क्योंकि बरसात में जामुन का तना काई से चिकना हो जाता है और उस पर पैर टिकता नहीं। इसलिए वह नीचे रहती थी और नीचे रहने वाले को जो मिलता है वही उसे मिलता था।

एक दोपहर उसने कुछ और सोचा। पेड़ के बारे में नहीं, ज़मीन के बारे में। घर में एक पुरानी चादर पड़ी थी, जो इतनी घिस चुकी थी कि उसे बिछाया नहीं जाता था और जिससे अनाज ढका जाता था।

अगले दिन वह उसे लेकर तालाब पर पहुँची और टुनटुन से कहा कि आज नीचे चादर लगेगी। टुनटुन ने पूछा कि उससे क्या होगा। 'जामुन फूटेंगे नहीं। और घास में जाएँगे भी नहीं।' 'तो?' 'तो चार में से एक मेरा।'

इस पर सब हँसे। हलधर ने कहा कि नीचे खड़े होकर जो मिल जाए वही ले लो, हिस्सा माँगने वाली कौन होती हो।

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कजरी ने बहस नहीं की।

उसने अपनी छोटी बहन सुमरी और उसकी सहेली को बुलाया और तीनों ने चादर के तीन कोने पकड़ लिए। चौथा कोना उसने एक झाड़ी की टहनी में फँसा दिया। चादर पेड़ के उस हिस्से के नीचे बिछाई गई जिधर सबसे ज़्यादा फल लटके थे।

फिर उसने ऊपर देखकर कहा, 'हिलाओ।' टुनटुन ने हिलाया। पूरे ज़ोर से। जामुन गिरे और चादर पर गिरे, और गिरकर उछले, और उछलकर बीच में इकट्ठे हो गए, क्योंकि तीन लड़कियों ने कोने ऊपर उठा रखे थे। एक भी नहीं फूटा। एक भी नहीं।

एक भी घास में नहीं गया और एक भी पानी में नहीं गया। लड़के नीचे उतरे। फिर ढेर देखा। उतने जामुन उन्होंने एक बार में कभी नहीं देखे थे। रोज़ हिलाने पर उन्हें जो मिलता था वह इसका तीसरा हिस्सा भी नहीं होता था।

टुनटुन ने चुपचाप गिनना शुरू किया और बीच में ही छोड़ दिया। उस दिन बँटवारा चार में से एक पर हुआ, जैसा कजरी ने कहा था।

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अगले दिन वह चादर लेकर पहुँची तो लड़के पहले से खड़े थे। इस बार हलधर ने कहा कि चादर और बड़ी होनी चाहिए, क्योंकि किनारे वाले जामुन बाहर गिर रहे हैं। कजरी ने कहा कि बड़ी चादर उसके घर में नहीं है।

उस पर टुनटुन अपने घर से एक बोरी सिलवाकर ले आया और दोनों को जोड़कर एक बड़ा टुकड़ा बना लिया गया।

और उसी दिन हिस्सा बदल गया।

किसी ने वोट नहीं किया और किसी ने घोषणा नहीं की। बस बाँटते वक़्त हलधर ने कजरी के ढेर में एक मुट्ठी और डाल दी, और फिर एक और, और उसके बाद हर दिन तीन में से एक उसका होने लगा।

जुलाई के आख़िर तक वह पेड़ ख़ाली हो गया। उस मौसम में उस पेड़ के नीचे से जितने जामुन उठाए गए, उतने पहले कभी नहीं उठे थे, और तालाब के किनारे तैरते हुए जामुन उस बरस दिखे ही नहीं।

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अगले बरस लड़के अपनी-अपनी चादर लेकर आए।

अब चादर लगाने के लिए कजरी की ज़रूरत नहीं थी। पर जगह तय करने के लिए थी, क्योंकि उसने पिछले पूरे मौसम में नीचे खड़े रहकर यह देख लिया था कि कौन-सी शाख़ हिलाने पर कितना गिराती है, और यह किसी और ने नहीं देखा था।

वह पुरानी चादर उस एक मौसम में इतनी रँग गई कि वह कभी साफ़ नहीं हुई।

उसे तीन बार सोडे में उबाला गया और तीनों बार वह उसी गहरे बैंगनी रंग की रही। आख़िर में कजरी की माँ ने उसे अनाज वाले ड्रम के ऊपर ढकने के लिए रख दिया, जहाँ वह आज तक पड़ी है, और उस घर में उसे चादर नहीं, जामुन वाली कहा जाता है।