गाड़ी सवा पाँच बजे आती थी। चौराहे पर सात मिनट रुकती थी। सोनू तीन दिन से चूक रहा था।
जेठ का महीना था। जेठ में दूध सुबह आठ बजे तक फट जाता है, चाहे जितना ठंडे में रखो। जो दूध गाड़ी में नहीं गया, वह उसी दिन बेकार है। भैंस एक ही थी और उसका दूध सात लिटर था।
अम्मा तड़के तीन बजे उठकर दुहती थीं। दुहने के बाद बाक़ी सब काम उन्हीं के थे, इसलिए चौराहे तक डोल ले जाना सोनू का काम था।
सोनू दस बरस का था।
घर में घड़ी एक ही थी और वह अब्बू के पास दिल्ली चली गई थी, उनके फ़ोन के अंदर। घर वाला फ़ोन पुराना था और उसमें अलार्म तो था, पर जेठ में बिजली रात के दस बजे जाती थी और सुबह छह बजे आती थी, और फ़ोन दूसरी रात ही बैठ गया।
पहली रात उसने सोचा कि सोऊँगा ही नहीं।
वह चारपाई पर बैठ गया और आँखें खोले रहा। उसने गिनती गिनी। फिर उसने ऊपर तारे गिने। फिर उसने सोचा कि थोड़ी देर लेट जाता हूँ, आँख नहीं बंद करूँगा। आँख खुली तो छह बज चुके थे और उजाला हो चुका था।
डोल वहीं रखा था, ढका हुआ, और अम्मा कुछ नहीं बोलीं। उन्होंने वह दूध कढ़ाई में डालकर खोया बनाना शुरू कर दिया, जो सात लिटर के लिए एक बहुत छोटा-सा इलाज था। दूसरी रात उसने पड़ोस वाले चाचा से कहा।
वे रोज़ चार बजे उठकर खेत जाते थे और चलते-चलते आवाज़ लगा देते थे। उन्होंने कहा कि ठीक है, जगा दूँगा। उस दिन वे नहीं गए। उनके साले आ गए थे और वे उन्हें बस अड्डे छोड़ने रात में ही निकल गए थे।
सोनू पाँच बजकर चालीस पर उठा। चौराहे तक वह दौड़ता हुआ गया और वहाँ धूल के अलावा कुछ नहीं था। तीसरी रात उसने बैठे-बैठे सोने की कोशिश की, दीवार से पीठ लगाकर, ताकि नींद गहरी न पड़े। इस बार वह जागा भी, और गाड़ी की आवाज़ भी उसने सुनी।
पर आवाज़ सुनने और चौराहे पर पहुँचने में फ़र्क़ होता है। डोल भारी था, ढक्कन ढूँढ़ना पड़ा, चप्पल एक ही मिली, और गली में एक जगह कीचड़ था जिससे बचकर निकलना पड़ा। वह पहुँचा तो गाड़ी चल चुकी थी और उसकी लाल बत्ती मोड़ पर मुड़ रही थी।
तीन दिन में इक्कीस लिटर। उस दिन दोपहर में सोनू चारपाई पर पेट के बल लेटा रहा और सोचता रहा।
उसे नींद से लड़ना नहीं आ रहा था। नींद से कोई नहीं लड़ सकता, यह उसे तीन रात में समझ आ चुका था। उसे किसी ऐसी चीज़ की ज़रूरत थी जो उसे ख़ुद उठा दे। और तभी उसे कुछ याद आया।
गाड़ी से पहले भी एक आवाज़ आती है।
नहर के पुल पर सुबह की पहली बस निकलती है, जो ज़िले वाली सड़क पर जाती है। वह पुल एक ही गाड़ी लायक़ चौड़ा है, इसलिए हर ड्राइवर वहाँ पहुँचते ही हॉर्न बजाता है, लंबा वाला, ताकि उस तरफ़ से कोई चढ़ न जाए।
वह हॉर्न रोज़ बजता है। छुट्टी के दिन भी बजता है। सोनू ने अगले दिन ध्यान से सुना। बस पुल पर तब निकली जब अभी अच्छा-ख़ासा अँधेरा था, और उसके बाद गाड़ी को आने में कोई पच्चीस मिनट लगे। पच्चीस मिनट बहुत होते हैं।
पर एक दिक़्क़त थी। अंदर वाले कमरे में वह हॉर्न सुनाई ही नहीं देता था। दीवारें मोटी थीं, दरवाज़ा भारी था, और अंदर सिर्फ़ पंखे की आवाज़ रहती थी।
इसलिए सोनू ने अपनी चारपाई उठाई।
उसने उसे बरामदे में, बाहर वाली दीवार से सटाकर डाला, उस तरफ़ जिधर सड़क पड़ती थी। अम्मा ने पूछा कि मच्छर काटेंगे। उसने कहा कि चादर ओढ़ लूँगा। फिर उसने बाक़ी इंतज़ाम किए, क्योंकि उसे याद था कि पिछली रात उसकी चप्पल कहाँ गई थी।
डोल उसने भरकर चारपाई के पाए के पास रखा। ढक्कन डोल के ऊपर ही रख दिया। दोनों चप्पलें उसने एक साथ, सीधी, चारपाई के नीचे रखीं। कीचड़ वाली गली से बचने के लिए उसने शाम को ही दूसरा रास्ता देख लिया, जो पीपल के पीछे से निकलता था और थोड़ा लंबा था पर सूखा था।
उस रात वह लेटते ही सो गया। और सुबह हॉर्न बजा।
वह लंबा था और सीधा उसके कान में आया, और सोनू एक झटके में उठ बैठा। पहले एक सेकंड उसे समझ नहीं आया कि वह बाहर क्यों सोया हुआ है। फिर आया। उसने चप्पलें पहनीं, डोल उठाया, और चल दिया।
चौराहे पर वह गाड़ी से पहले पहुँचा।
इतना पहले कि उसे खंभे के नीचे बैठकर इंतज़ार करना पड़ा, और उसने वहाँ बैठे-बैठे देखा कि आसमान किनारे से हल्का पड़ना शुरू हो गया है और कौवे अभी बोले नहीं हैं। गाड़ी आई। तौल हुई। सात लिटर।
उसके बाद वह एक दिन भी नहीं चूका।
जुलाई में अब्बू लौटे तो वे अपने साथ एक अलार्म वाली घड़ी लाए, लाल रंग की, जिसके ऊपर दो घंटियाँ लगी थीं। सोनू ने उसे कमरे में मेज़ पर रख दिया और उसमें अलार्म कभी नहीं लगाया।
उसकी चारपाई उस गर्मी के बाद अंदर वापस नहीं गई। बरसात में भी वह बरामदे में उसी बाहरी दीवार से सटी रही, जहाँ से सड़क की आवाज़ सीधी आती थी, और जब पानी तिरछा पड़ता था तो वह उसे बस एक बालिश्त खिसका लेता था और फिर वहीं सो जाता था।