किताब आर्यन को बरगद की जड़ों के बीच मिली, ठीक वहीं जहाँ वह अपनी गिल्ली छिपाया करता था। जिल्द पर धूल की इतनी मोटी परत थी कि उसे पहले फूँक मारनी पड़ी। अंदर के पन्ने पीले थे और ज़्यादातर पर कुछ लिखा ही नहीं था। सिर्फ़ एक पन्ने पर चार लाइनें थीं, और वे किसी ऐसी भाषा में नहीं थीं जो आर्यन को आती हो। फिर भी उसने उन्हें पढ़ लिया। पढ़ना उसने चाहा नहीं था। वे अपने आप पढ़ी गईं।
उसके बाद कुछ नहीं हुआ। न आसमान बदला, न ज़मीन हिली। आर्यन दस मिनट तक वहीं बैठा इंतज़ार करता रहा, फिर किताब उठाकर घर ले आया। तीन दिन बाद, जब वह हाथ में एक पत्थर लिए बैठा था, उसे लगा कि पत्थर गरम हो रहा है। उसने उसे छोड़ दिया, फिर उठाया। पत्थर सचमुच गरम था। जादू बस इतना ही था। जो चीज़ उसकी मुट्ठी में हो, वह गरम हो जाती थी।
आर्यन ने अगले कई दिन इसे आज़माने में लगाए। पत्थर, चम्मच, रोटी का टुकड़ा, एक बार अपनी चप्पल। सब गरम हो गए। बहुत ज़्यादा नहीं, बस इतना कि हाथ को अच्छा लगे। उसने कोशिश की कि आग जले। नहीं जली। उसने कोशिश की कि पानी उबले। नहीं उबला। बड़ी चीज़ों पर उसने आज़माया तो कुछ भी नहीं हुआ। आठ साल की उम्र में उसे समझ आ गया कि उसे दुनिया की सबसे बेकार जादुई ताक़त मिली है।
जब दोस्ती काम आई
एक दिन उसने गिनकर देखा कि उसकी मुट्ठी में क्या-क्या आ सकता है। एक कंचा, एक चम्मच, एक छोटा आलू, चाबियों का गुच्छा। इससे बड़ी कोई चीज़ नहीं। उसने कॉपी में इन सबकी सूची भी बनाई और फिर उसे फाड़ दिया, क्योंकि सूची देखकर उसे और बुरा लगा। जिसे जादू मिलता है, उसे आलू गरम करने के लिए नहीं मिलता।
एक बार उसने अपने दोस्त कल्लू को दिखाने की सोची। उसने कल्लू के हाथ में कंचा रखा और अपनी मुट्ठी उसके ऊपर बाँध दी। कंचा गरम हो गया। कल्लू ने कहा कि धूप में पड़ा होगा। शाम हो चुकी थी और धूप कहीं नहीं थी, पर आर्यन ने बहस नहीं की। उसके बाद उसने यह बात दबा ली।
दिसंबर तक आर्यन ने वह किताब कई बार खोली, इस उम्मीद में कि बाकी पन्नों पर भी कुछ निकल आएगा। कुछ नहीं निकला। एक दिन उसने किताब वापस बरगद की जड़ों में रख दी, जहाँ से उठाई थी, यह सोचकर कि जिसे चाहिए वह ले जाए। दो दिन बाद वह देखने गया। किताब वहीं पड़ी थी। उसने उसे फिर उठा लिया।
उस साल जाड़ा जल्दी आया और कड़ा पड़ा। पूस की एक रात आर्यन की नींद खुली तो बाहर से बकरी के मिमियाने की आवाज़ आ रही थी। वह कंबल लपेटकर बाहर गया। घर के पीछे वाली बकरी ने बच्चा दिया था। बच्चा ज़मीन पर पड़ा था, गीला, और हिल नहीं रहा था। बकरी उसे चाट रही थी और वह फिर भी हिल नहीं रहा था।
आर्यन ने आवाज़ लगाने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर लिया। माँ दिन भर की थकी हुई थीं और पिता चाचा के यहाँ गए हुए थे। उसने बच्चे को दोनों हाथों में उठा लिया। वह ठंडा था, इतना कि आर्यन के हाथ काँप गए। उसने उसे छाती से लगाया, अपनी हथेलियाँ उसकी पसलियों पर रखीं, और फिर वही किया जो वह कंचों के साथ करता था।
जब डर भाग गया
उसे यह भी नहीं पता था कि यह काम करेगा या नहीं। कंचा गरम करना एक बात थी और यह दूसरी। उसने ध्यान लगाया, वैसे ही जैसे पत्थर के साथ लगाता था, और कुछ देर तक कुछ महसूस नहीं हुआ। फिर उसकी हथेलियाँ गरम होने लगीं। बच्चा तब भी नहीं हिला। आर्यन ने हाथ नहीं हटाए।
रात लंबी थी। आर्यन दीवार से टिका बैठा रहा और उसके हाथ उस बच्चे पर टिके रहे। बीच में वह दो बार झपका और दोनों बार डरकर जागा। तड़के, जब मुर्ग़े ने बाँग दी, बच्चे ने अपनी अगली टाँग सीधी की और सिर उठाया। थोड़ी देर बाद वह खड़ा हुआ, गिरा, और फिर खड़ा हो गया। बकरी उसे चाटने लगी। आर्यन ने अपने हाथ हटा लिए और उन्हें देखता रहा। उसकी अपनी हथेलियाँ अब भी गरम थीं, और उनमें उस गीले बच्चे की गंध बसी हुई थी। बाहर अभी अँधेरा ही था।
सुबह माँ ने देखा कि बच्चा ज़िंदा है और कहा कि अच्छा हुआ। आर्यन ने हामी भर दी। आज उसकी उम्र बारह साल है और वह अब भी कुछ और नहीं कर पाता। न आग जलती है, न बारिश आती है, न तूफ़ान रुकता है। जाड़े में कभी-कभी वह अपनी छोटी बहन के ठंडे पैर अपनी हथेलियों में ले लेता है, और वह पूछती है कि हाथ इतने गरम कैसे हैं। आर्यन कहता है कि रज़ाई में थे।