कोन का सिरा काँप रहा था। नज़मा ने उसे दूसरे हाथ से थामा। सामने आपा के दोनों हाथ रखे थे, हथेली ऊपर, तकिये पर। निकाह अगले दिन शाम का था।

मेहँदी लगाने वाली ख़ाला मुरादाबाद से आने वाली थीं। उनकी बस दोपहर में रास्ते में ख़राब हो गई। ख़बर तीन बजे आई और तब तक घर में तीस लोग जमा हो चुके थे। शबनम ने कहा कि किसी और को बुला लो। अमरोहा में और भी लगाने वाली हैं।

पर जेठ की उन तारीख़ों में हर लगाने वाली किसी न किसी घर में बैठी थी। नज़मा ग्यारह बरस की थी।

वह दो साल से कोन पकड़ रही थी। अपनी सहेलियों के हाथों पर, अपनी गुड़िया के हाथों पर, और एक बार दीवार पर, जिस पर अम्मी ने उसे बहुत डाँटा था। बेल-बूटा उसे आता था। आपा ने उसी को बिठा दिया।

'तेरे हाथ से लगवाऊँगी,' आयशा ने कहा। 'रंग नहीं आया तो?' 'तो नहीं आया।' लगाने में नज़मा को साढ़े तीन घंटे लगे।

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उसने दाहिने हाथ से शुरू किया, हथेली के बीच में एक गोल फूल बनाया, फिर उसके चारों तरफ़ पत्ते, फिर उँगलियों पर सीधी लकीरें। बीच-बीच में उसे कोन का सिरा सुई से साफ़ करना पड़ता था, क्योंकि मेहँदी सूखकर अंदर ही जम जाती थी। कमर दुखने लगी थी।

रात के दस बजे दोनों हाथ भर गए। देखने में वे अच्छे लग रहे थे। शबनम ने तीन बार कहा कि बिलकुल दुकान जैसी लग रही है। पर नज़मा को असली फ़िक्र दूसरी थी।

पिछले साल चचेरी बहन की शादी में उसी ने अपनी छोटी बहन के हाथ पर लगाया था और सुबह रंग नारंगी निकला था, फीका, जैसे धूप में पड़ा हुआ कपड़ा। रंग कैसे गहरा होता है, यह उसे मालूम नहीं था।

ग्यारह बजे मेहँदी सूखने लगी और किनारों से चटककर गिरने लगी। यह पहली गड़बड़ थी। जहाँ-जहाँ से मेहँदी गिर गई, वहाँ नीचे की चमड़ी हल्की नारंगी थी। उसके आसपास वाली जगह गहरी होती जा रही थी। मतलब साफ़ था। जो जितनी देर चिपकी रहेगी, वह उतनी गहरी होगी।

नज़मा ने कपड़े की पट्टी लेकर बाँधने की कोशिश की।

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पट्टी बँधते ही डिज़ाइन फैल गया। एक पत्ती दूसरी में मिल गई। आयशा ने हाथ वैसे ही रखे रहने दिए। नज़मा ने पट्टी तुरंत खोल दी और वह जगह गीली रुई से ठीक करनी पड़ी।

फिर उसने नींबू-चीनी वाला घोल बनाया।

यह उसने बड़ी औरतों को करते देखा था। नींबू निचोड़ो, उसमें चीनी घोलो, और रुई से मेहँदी के ऊपर हल्के से थपको। इससे मेहँदी गीली रहती है। गिरती नहीं।

पहली बार उसने ज़्यादा डाल दिया।

घोल हथेली के किनारे से बहकर कलाई तक चला गया और वहाँ भूरा दाग़ छोड़ गया, जो डिज़ाइन से बाहर था। आयशा ने हाथ टेढ़ा करके देखा और हँस दी। 'यह भी चलेगा।' 'नहीं चलेगा,' नज़मा ने कहा। उसने रुई निचोड़नी सीखी। इतनी कि गीली रहे। इतनी कि टपके नहीं। उसके बाद उसने हर बीस मिनट पर थपकना शुरू किया, और सिर्फ़ ऊपर से, किनारों को छोड़कर।

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रात के एक बजे घर में बत्ती बुझ गई और सब सो गए। आयशा बैठी रही, क्योंकि हाथ रखे-रखे लेटा नहीं जा सकता। और यहीं नज़मा को दूसरी बात समझ आई।

आँगन में हवा चल रही थी। वहाँ मेहँदी जल्दी सूख रही थी। पर रसोई की तरफ़ अभी गरमी थी, क्योंकि दिन भर चूल्हा जला था और दीवारें तप चुकी थीं।

जहाँ हाथ गरम रहे, वहाँ रंग गहरा उतरता है। यह उसने किसी से सुना नहीं था। उसने पिछले साल का हाथ याद किया, जो पूरी रात खुली छत पर रहा था और नारंगी निकला था। उसने आयशा को उठाकर रसोई के दरवाज़े के पास बिठाया।

फिर उसने एक कटोरी में दो अंगारे रखे और ऊपर चार लौंग डालीं। कटोरी उसने आयशा के हाथों के नीचे रख दी, इतनी दूर कि गरमी लगे और आँच न लगे। लौंग का धुआँ ऊपर उठता रहा।

उसके बाद का हिस्सा सबसे मुश्किल था और उसमें कोई हुनर नहीं था। आयशा के हाथ सुबह तक हिलने नहीं थे। मतलब यह कि जो भी काम हाथ से होता है, वह किसी और को करना था।

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नज़मा ने पानी पिलाया, गिलास मुँह से लगाकर। नाक में खुजली हुई तो उसने खुजाया। मच्छर आए तो उसने अख़बार से हवा की। ढाई बजे आयशा को नींद आने लगी तो नज़मा उसके सामने बैठकर उससे बातें करती रही, ताकि वह सिर न झुका ले और हाथ न रगड़ जाएँ।

बीच में एक बार आयशा ने कहा कि छोड़ दे, इतना क्या है। नज़मा ने कहा कि नहीं। साढ़े चार बजे उजाला होने लगा। तब नज़मा ने चम्मच की पीठ से मेहँदी खुरचनी शुरू की, धीरे-धीरे। पानी उसने बिलकुल नहीं लगाया।

नीचे का रंग गहरा लाल था। कहीं-कहीं भूरा। आयशा ने अपनी हथेली आँखों के पास लाकर देखी। वह उसे देखती रही, फिर उसने दूसरी हथेली भी उसी तरह उठाई। दोपहर तक रंग और चढ़ गया, जैसा चढ़ता है, और शाम तक वह गहरा मरून हो चुका था।

उस रात दो बजे, जब सब कुछ हो चुका था और नज़मा पहली बार बैठी थी, उसने कोन में बची हुई मेहँदी अपनी बाईं हथेली पर उलट ली थी। कोई बेल नहीं, कोई फूल नहीं, बस एक गोल ढेर। फिर वह वहीं दीवार से टिककर सो गई थी और सुबह देर से उठी थी।

तीन हफ़्ते बाद जब घर की सब औरतों के हाथों से रंग उतर चुका था, तब भी नज़मा की बाईं हथेली के बीच एक गहरा गोल धब्बा बचा हुआ था, बिना किसी शक्ल का, और वह सबसे आख़िर में गया।