एक सौ पचास फ़ुट पर ऊपर आने वाला चूरा सफ़ेद हो गया। बबन ने कंप्रेसर की तरफ़ देखा और फिर हाथ उठाकर दत्ता को रोकने का इशारा किया।
बोरिंग की मशीन नीचे देखती नहीं है। नीचे क्या है, यह सिर्फ़ दो चीज़ों से पता चलता है। एक, हथौड़ी की आवाज़, जो हर पत्थर पर अलग होती है। दो, जो चूरा हवा के साथ ऊपर आता है। मराठवाड़ा में नीचे काला पत्थर होता है। बेसाल्ट। ऊपर छह-आठ फ़ुट मुरुम, फिर पत्थर, और पत्थर के बीच में जहाँ दरार मिल जाए वहाँ पानी।
चूरा उस पत्थर का हमेशा भूरा-काला निकलता है। यह सफ़ेद था और उँगलियों में मैदे जैसा लग रहा था। 'चूना है,' दत्ता ने कहा।
बबन ने कुछ जवाब नहीं दिया। वह बीस बरस से यह मशीन चला रहा था और उसे मालूम था कि डेढ़ सौ फ़ुट नीचे चूना अपने आप नहीं होता। चूना आदमी बनाता है।
मई का तीसरा हफ़्ता था और मराठवाड़े में उस साल पानी की जो हालत थी वह सबको मालूम है। टैंकर हफ़्ते में दो बार आता था। जिनके पास बोरिंग थी उनके पास भी नहीं थी, क्योंकि पुरानी बोरिंग तीन सौ फ़ुट की थीं और वे मार्च में ही सूख गई थीं।
नामदेव का खेत गाँव से डेढ़ किलोमीटर दूर था, ढलान पर।
जगह पाणाड्या ने बताई थी। नारियल हाथ में लेकर वह पूरे खेत में घूमा था और एक कोने पर आकर रुक गया था, जहाँ बबूल का ठूँठ था और उसके चारों तरफ़ ज़मीन थोड़ी ऊँची थी। गाँव के दो-तीन बूढ़ों ने उसी शाम नामदेव को रोका था।
उन्होंने कोई क़िस्सा नहीं सुनाया। बस इतना कहा कि उस कोने में मत खोदो, वहाँ पुराना वाडा था, और बहत्तर के अकाल में जो हुआ सो हुआ। नामदेव ने पूछा कि क्या हुआ था। किसी ने बताया नहीं।
उसकी हालत ऐसी थी कि वह सुनता भी तो रुकता नहीं। दो एकड़ बैंक में थे, गन्ना पिछले बरस जल गया था, और बड़ी लड़की की शादी नवंबर में तय थी। पानी न निकले तो कुछ भी बचता नहीं। रेट नब्बे रुपये फ़ुट था, तीन सौ तक। उसके आगे एक सौ बीस।
खुदाई तेईस तारीख़ की सुबह छह बजे शुरू हुई।
पहले साठ फ़ुट मुरुम में गए और मशीन आराम से चलती रही। फिर पत्थर आया और आवाज़ बदल गई, जैसी बदलनी चाहिए थी। एक सौ बीस तक सब ठीक था।
एक सौ पचास पर चूना आया।
बबन ने आधे घंटे मशीन बंद रखी। नामदेव खेत के किनारे बैठा था और उसने दूर से हाथ उठाकर पूछा कि क्या हुआ।
बबन ने चालू कर दी।
एक सौ नब्बे पर जो ऊपर आया वह काला था और चूरे जैसा नहीं था। दत्ता ने मुट्ठी में लेकर देखा और उसकी हथेली पर काली लकीर बन गई।
'कोयला,' उसने कहा।
बबन इस बार भी नहीं रुका। उसे रुकना चाहिए था और उसने ख़ुद बाद में यही कहा। रुकता तो उन्नीस हज़ार का नुक़सान उसी वक़्त होता, और वह उन्नीस हज़ार उस दिन उसके सामने खड़ा था। दो सौ चौदह फ़ुट पर हथौड़ी नीचे गिर गई।
यह हर ड्रिलर जानता है और हर ड्रिलर से डरता है। मशीन का दबाव अचानक ख़त्म हो जाता है, रस्सी ढीली हो जाती है, और नीचे कुछ नहीं होता। पोकळी। ख़ाली जगह। कंप्रेसर की हवा उस ख़ाली जगह में जाने लगी और ऊपर आना बंद हो गई।
बबन ने मशीन बंद कर दी और तीनों उस पाइप के पास खड़े रहे। कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। शाम को उन्होंने रिग वहीं छोड़ दिया, क्योंकि ट्रक की जैक हिलाने के लिए भी दिन चाहिए था और सूरज ढल चुका था।
आठ बजे के आसपास सुनंदा खाना लेकर आई और उसी ने पहले देखा। खेत के दूसरे कोने में, बोरिंग से लगभग चालीस क़दम दूर, ज़मीन से धूल उठ रही थी।
वहाँ कोई गड्ढा नहीं था। सपाट ज़मीन थी, जिस पर बबूल के सूखे पत्ते पड़े थे, और उन पत्तों के बीच से बारीक धूल ऐसे निकल रही थी जैसे नीचे से कोई फूँक मार रहा हो।
बबन टॉर्च लेकर गया।
पत्तों को हटाया तो नीचे गोल घेरे में पत्थर लगे हुए थे, पुराने, चूने से जुड़े हुए, और उनके बीच की मिट्टी दबकर बैठी हुई थी। कुएँ का मुँह था। किसी ने उसे भरकर ऊपर से बराबर कर दिया था और उस पर बरसों की मिट्टी चढ़ चुकी थी।
उन्हीं में से हवा आ रही थी।
मतलब साफ़ था। नीचे पत्थर में दरार होगी, और उनका दो सौ चौदह फ़ुट का सूराख़ उसी दरार से इस कुएँ में जा मिला होगा। कंप्रेसर की हवा वहीं से निकल रही थी। बबन ने दत्ता से कहा कि कंप्रेसर बंद है या नहीं, जाकर देख।
दत्ता ने जाकर देखा और लौटकर बताया कि बंद है, और उसने बंद ही किया था, तीन घंटे पहले।
हवा फिर भी आती रही।
वह ठंडी थी। मई की उस रात में, जब ज़मीन दिन भर की गर्मी छोड़ रही थी और नंगे पैर खड़े नहीं हुआ जा सकता था, उस घेरे से जो हवा निकल रही थी वह किसी बंद कमरे की तरह ठंडी थी और उसमें बासी घी जैसी कोई गंध थी।
सुनंदा ने खाने की टोकरी वहीं छोड़ दी और घर चली गई। नामदेव उसके पीछे नहीं गया। वह पत्थरों के घेरे के पास बैठ गया और देर तक उन्हें देखता रहा। बबन उस रात नहीं सोया। सुबह होते ही उसने रिग की जैक उठाई और ट्रक को खेत से बाहर निकाल लिया।
फिर उसने नामदेव से कहा कि आगे नहीं खोदूँगा।
नामदेव ने हिसाब की बात की। बबन ने दो सौ चौदह फ़ुट का एक रुपया नहीं लिया, न पेशगी रखी, और उसके ऊपर उसने अपने पैसे से चार बोरी सीमेंट और एक ट्रैक्टर मुरुम मँगवाया।
इसमें कोई एहसान नहीं था। यह करना ही पड़ता है। मराठवाड़े में हर बरस दो-चार बच्चे खुले बोरवेल में गिरते हैं और उनमें से कुछ ही निकल पाते हैं। खुला सूराख़ छोड़कर चले जाना बबन के बीस बरस में कभी नहीं हुआ था।
पूरा दिन लगा। उन्होंने पाइप काटा, मुरुम भरा, और ऊपर डेढ़ फ़ुट सीमेंट डाल दिया। उस कुएँ के घेरे को उन्होंने हाथ नहीं लगाया।
सीमेंट तीसरे दिन तक ऊपर से सूखा और नीचे से गीला रहा। चौथे दिन उसमें बीचोंबीच एक बालिश्त लंबी दरार आ गई, जो सीधी थी और किसी तरफ़ मुड़ी नहीं थी। बबन उस खेत में दोबारा नहीं गया। नामदेव ने महीने भर बाद उससे फ़ोन पर सिर्फ़ इतना कहा कि दरार से हवा आती है, और वह अब भी ठंडी है।