गोंडा के उस सिनेमा हॉल में सात सौ चालीस सीटें थीं और आख़िरी बरसों में शो में तीस-चालीस लोग आते थे। अयूब वहाँ इकतीस बरस से प्रोजेक्टर चलाता था।

उसने वहाँ कार्बन आर्क वाली मशीन से शुरू किया था, जिसमें दो छड़ों के बीच से रोशनी निकलती थी और हर बीस मिनट में उन्हें आगे खिसकाना पड़ता था। बाद में ज़ेनॉन आ गया और काम आसान हो गया। इकतीस बरस में उसने वह कमरा छोड़ा नहीं। उसे नीचे हॉल में बैठकर फ़िल्म देखने की आदत कभी नहीं पड़ी, क्योंकि ऊपर से परदा टेढ़ा दिखता है और आँख उसी की हो जाती है।

हॉल में शो से पहले तीन घंटी बजती थीं। पहली पंद्रह मिनट पहले, दूसरी पाँच मिनट पहले, तीसरी तब जब रोशनी बुझती थी। घंटी पीतल की थी और वह गैलरी की सीढ़ी के पास दीवार पर लगी थी, और उसकी रस्सी नीचे टिकट खिड़की तक आती थी।

बजाना हबीब का काम था, जो गेटकीपर था, और जो नौ बजे वाला शो शुरू होते ही घर चला जाता था। आख़िरी शो साढ़े ग्यारह पर छूटता था।

उसके बाद अयूब ऊपर रील बाँधता, डिब्बे बंद करता, और मशीन ठंडी होने का इंतज़ार करता। इसमें आधा घंटा लगता था। हॉल में उस वक़्त वह अकेला होता था। पहली बार उसने वह आवाज़ अगस्त में सुनी। बारह बजकर दस मिनट पर। आवाज़ तीन बार आई, वही ठहराव, वही क्रम। वही आवाज़, वही ठहराव, जैसी तीसरी घंटी में होती है।

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वह नीचे गया। हॉल ख़ाली था। दरवाज़े भीतर से बंद थे। रस्सी हिल रही थी। उसने उसे पकड़कर रोका और ऊपर देखा। घंटी अपनी जगह थी। उसने उस रात इसे हवा समझा, क्योंकि हॉल की छत में तीन जगह से पानी टपकता था और वहाँ से हवा भी आती थी।

दूसरी रात वही हुआ। बारह बजकर दस। तीसरी रात उसने घड़ी सामने रखी और इंतज़ार किया। बारह बजकर दस मिनट पर आवाज़ आई। उसने हबीब से कहा। हबीब ने कहा कि वह अकेले इतनी देर मत रुका करे, कि उम्र हो रही है, और कि हॉल वैसे भी छह महीने में बंद हो रहा है।

यह सच था। इमारत बिक चुकी थी और उस पर मार्केट बनना था। अयूब रुकता रहा।

उसने रुकने की वजह किसी को बताई नहीं और उसके पास वजह थी भी नहीं। हॉल बंद होने के बाद उसके पास करने को कुछ नहीं था। उसकी उम्र सत्तावन थी, पेंशन जैसी कोई चीज़ नहीं थी, और दोनों लड़के बाहर थे। जो जगह इकतीस बरस से आपकी सुबह और शाम तय करती रही हो, उसके बंद होने का मतलब समझने में वक़्त लगता है।

यह बात उसे बुरी नहीं लग रही थी। यही ख़तरा था। वह हर रात नीचे जाता, रस्सी देखता, और फिर बालकनी की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर जाता, जहाँ से घंटी सामने पड़ती थी।

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बालकनी उन बरसों में बंद कर दी गई थी। उसका फ़र्श लकड़ी का था और नीचे के गार्डर में जंग लग चुकी थी। इसीलिए वहाँ टिकट बिकना बंद हुआ था, नौ बरस पहले।

अयूब यह जानता था।

अक्टूबर में एक रात उसने बालकनी की तीसरी क़तार में पैर रखा और लकड़ी बैठ गई। वह गिरा नहीं। उसका पैर घुटने तक धँसा और वह हाथ के सहारे बाहर आया। उसकी पिंडली में लोहे का एक टुकड़ा घुस गया और चौदह टाँके लगे।

वह उसके बाद भी जाता रहा। आख़िरी शो जनवरी की सत्रह तारीख़ को था। उसके बाद हॉल बंद होना था। उस रात लोग ज़्यादा आए, लगभग दो सौ, क्योंकि क़स्बे में यह ख़बर थी कि यह आख़िरी है। शो के बाद कुछ लोग देर तक बाहर खड़े रहे।

साढ़े बारह बजे तक सब चले गए। अयूब ने मशीन बंद की, डिब्बे बाँधे, और नीचे उतरा। बारह बजकर दस मिनट कब के निकल चुके थे। वह गेट तक पहुँचा और ताला निकाल ही रहा था कि आवाज़ आई। आवाज़ तीन बार आई, वही ठहराव, वही क्रम।

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वह मुड़ा नहीं और उसने ताला हाथ से नहीं छोड़ा।

उसने ताला लगाया, चाबी जेब में रखी, और साइकिल उठाकर चला गया। यह उसने तय करके किया और उसे इसमें ज़ोर लगाना पड़ा, और यह बात उसने बाद में सिर्फ़ अपनी बीवी को बताई।

मार्च में इमारत गिराई जाने लगी।

गिराने में सत्रह दिन लगे। पहले कुर्सियाँ निकलीं, जो तौल के भाव बिकीं। फिर परदा उतरा। फिर छत के पंखे। अयूब उन दिनों रोज़ वहाँ जाता था और सड़क के उस पार खड़े होकर देखता रहता था, और मज़दूरों को यह अजीब नहीं लगा, क्योंकि क़स्बे के और भी लोग वहाँ खड़े रहते थे।

मलबे में जो चीज़ें निकलीं उनमें वह घंटी भी थी और उसे मज़दूरों ने अलग रख दिया, क्योंकि पीतल बिकता है। रस्सी उसके साथ नहीं थी और मज़दूरों ने उसे अलग से नहीं ढूँढ़ा।

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बाद में वह मिली, गैलरी की दीवार के पास, और उसका ऊपर वाला सिरा घंटी में बँधा हुआ नहीं था। वह कटा हुआ था और कटान पुरानी थी, जिस पर जंग बैठ चुकी थी। हबीब ने बताया कि रस्सी उसने ख़ुद बदली थी, बहुत पहले, और पुरानी वाली उसने काटकर वहीं छोड़ दी थी।

"कब?" "जब बालकनी बंद हुई थी।"

अयूब ने इसके बाद यह हिसाब नहीं लगाया कि नई रस्सी टिकट खिड़की तक आती थी और गैलरी तक नहीं जाती थी।

उसने वह पीतल की घंटी ख़रीद ली, तौल के भाव, और वह उसके घर के आँगन में एक कील पर टँगी है। उसमें कोई रस्सी नहीं बँधी और उसे बजाने के लिए हाथ बढ़ाना पड़ता है, और उसने आज तक उसे नहीं बजाया।