राजनगर एक्सटेंशन में उस साइट पर चार टावर खड़े थे और चारों का ढाँचा पूरा हो चुका था। खिड़कियों में शीशे नहीं लगे थे। दरवाज़े नहीं लगे थे। लिफ़्ट के लिए जो जगह छोड़ी गई थी वह ऊपर से नीचे तक खुली हुई थी और उसके किनारे पर कोई जाली नहीं थी।
काम अठारह महीने से बंद था।
रामजियावन वहाँ अकेला चौकीदार था। छह हज़ार आठ सौ महीना, और रहने के लिए गेट के पास टीन का एक कमरा, जिसमें एक चारपाई और एक बल्ब था।
वह देवरिया का था और उसने यह काम इसलिए लिया था कि इसमें उसे कुछ करना नहीं पड़ता था। रात में दो चक्कर, सुबह गेट खोलना, और महीने में एक बार सुपरवाइज़र मुस्तक़ीम का आकर रजिस्टर देख जाना। टीन के उस कमरे से तीसरा टावर सीधा दिखता था।
पहली रात उसने रोशनी देखी तो उसे लगा कि कोई मज़दूर रह गया होगा।
वह चौथी मंज़िल की एक खिड़की में थी और वह बिजली की रोशनी नहीं थी। बिजली वहाँ थी ही नहीं। वह पीली थी और हिलती थी, जैसे कोई चीज़ जल रही हो, या जैसे कोई हाथ में कुछ लेकर चल रहा हो।
उसने टॉर्च उठाई और चिल्लाया। रोशनी बुझ गई।
वह उस बुझने का तरीक़ा था जो उसे बाद तक याद रहा। बल्ब बुझने पर एक झटके में बुझता है। दीया बुझने पर लौ पहले छोटी होती है। यह न झटके में गई और न छोटी हुई। वह ऐसे गई जैसे किसी ने उसके सामने कोई चीज़ रख दी हो।
वह अकेला ऊपर नहीं गया, उस रात नहीं। वह लौट आया और उसने सुबह होने का इंतज़ार किया। दिन में वह चौथी मंज़िल पर गया। चौदह मंज़िल की सीढ़ी में रेलिंग सिर्फ़ पाँचवीं तक लगी थी और उसके बाद खुली थी।
ऐसी इमारत में सीढ़ी चढ़ना और घर की सीढ़ी चढ़ना एक जैसा नहीं होता। हर मंज़िल पर बरामदा खुला मिलता है और उसके आगे कुछ नहीं होता, न दीवार, न जाली, बस हवा। नीचे देखने पर मलबे के ढेर दिखते हैं और उनमें से कुछ में सरिया ऊपर की तरफ़ निकला हुआ है। रामजियावन ने चढ़ते हुए दीवार वाली तरफ़ हाथ रखे रखा, जैसा वहाँ काम करने वाले मज़दूर करते थे।
चौथी मंज़िल पर कुछ नहीं था। सीमेंट की धूल बिछी हुई थी, जैसी हर मंज़िल पर थी। पर धूल पर निशान थे। पैरों के नहीं। एक लंबी लकीर, जैसे कोई चीज़ घसीटी गई हो, जो एक कमरे से निकलकर बरामदे तक जाती थी और वहाँ ख़त्म हो जाती थी।
उसी कमरे के कोने में एक चप्पल पड़ी थी। बच्चों की, नीली, बाईं पैर की। रामजियावन ने वह चप्पल उठाई नहीं। उसने उसे वहीं छोड़ दिया और नीचे आ गया। अगली रात रोशनी फिर दिखी। रोशनी इस बार तीसरी मंज़िल पर थी, उसी तरफ़, उसी कोने में।
उसने मुस्तक़ीम को फ़ोन किया। मुस्तक़ीम ने कहा कि नशेड़ी घुस आते हैं, कि यह हर साइट पर होता है, और कि वह दरवाज़े पर ताला ठीक से लगाए। ताला ठीक से लगा हुआ था। रामजियावन ने उसे तीन बार देखा।
चौथी रात वह दूसरी मंज़िल पर थी और उन पाँच रातों में उसने सोना लगभग छोड़ दिया था। वह शाम को ही खाना खा लेता और चारपाई बाहर निकालकर टीन के कमरे के सामने डाल लेता, जहाँ से तीसरा टावर सीधा पड़ता था। उसने अपने घर फ़ोन नहीं किया, क्योंकि फ़ोन पर बताने लायक़ उसके पास कुछ था नहीं। वह बस बैठा रहता था और गिनता रहता था कि रोशनी किस मंज़िल पर है।
उस रात उसने अपना सामान बाँध लिया। छह हज़ार आठ सौ रुपये किसी चीज़ के लिए इतने नहीं होते, और उसका दो महीने का बकाया भी था, जिसे छोड़ा जा सकता था। वह गेट तक गया और वहीं रुक गया।
उसे वह चप्पल याद आ गई। छठी रात रोशनी नीचे थी, ज़मीन पर, टावर के भीतर वाले हिस्से में जहाँ लिफ़्ट का गड्ढा है। वह भीतर गया। टॉर्च कमज़ोर थी और उसने उसे नीचे रखा। टॉर्च की रोशनी में उसे जो पहले दिखा वह गड्ढे का किनारा था, और वह उससे दो क़दम दूर खड़ा था। दूसरा क़दम उसने नहीं उठाया।
उसे लड़का ग्यारहवीं मंज़िल पर मिला, उसी रात, ऊपर जाकर।
वह एक कोने में बैठा था, दीवार और खंभे के बीच वाली जगह में, जहाँ से उसे नीचे का गेट दिखता था। उसके पास एक प्लास्टिक की बोतल थी और कुछ रैपर थे। रामजियावन ने उसे पहले नहीं देखा था क्योंकि वह कभी ग्यारहवीं तक गया ही नहीं था। कोई चौकीदार बिना वजह ग्यारह मंज़िल नहीं चढ़ता।
वह आठ-नौ बरस का था, बोल नहीं रहा था, और उसने चौबीस दिन वहाँ काटे थे। यह बाद में पुलिस ने बताया। वह हरिद्वार से भागा हुआ था और उसकी एक चप्पल कहीं छूट गई थी। रामजियावन ने उसे नीचे उतारा और सुबह तक अपने कमरे में रखा।
पुलिस उसे ले गई और उसके बाद क्या हुआ, यह रामजियावन को कभी नहीं पता चला। उसने वह नौकरी छोड़ दी। बकाया उसे मिल गया, दोनों महीनों का। जिस दिन वह जा रहा था, उस दिन नया चौकीदार आया और उसने रामजियावन से सिर्फ़ एक चीज़ पूछी, कि टावर कितनी मंज़िल का है।
रामजियावन ने कहा चौदह। उस आदमी ने कहा कि उसने सड़क से खड़े होकर गिना था और उसे पंद्रह मिली थीं।