ब्रेक छोड़ते ही केबिन नीचे की तरफ़ खिसका, और वह खिसकना ही नहीं चाहिए था। सुकुमार ने ब्रेक वापस लगा दिया और मशीन रुम की दीवार से टिककर खड़ा हो गया। लिफ़्ट का हिसाब सीधा है।

एक तरफ़ केबिन लटकता है और दूसरी तरफ़ रस्सियों के सिरे पर लोहे का पलड़ा। पलड़े का वज़न ख़ाली केबिन के बराबर रखा जाता है, और उसमें आधी सवारी का वज़न और जोड़ दिया जाता है। इसी वजह से मोटर को पूरा बोझ नहीं उठाना पड़ता।

जाँच का तरीक़ा भी सीधा है। केबिन को बीच में लाकर ख़ाली करो और ब्रेक छोड़ो। दोनों तरफ़ बराबर हो तो वह वहीं खड़ा रहेगा और हिलेगा नहीं। यह केबिन ख़ाली था और फिर भी नीचे जा रहा था। सुकुमार अट्ठाईस बरस से यही काम कर रहा था।

कलकत्ते की पुरानी इमारतों में अब भी ऐसी लिफ़्टें चल रही हैं जिनकी उम्र नब्बे बरस है। जालीदार गेट, अंदर लकड़ी की दीवारें, ऊपर मशीन रूम, और इंच भर मोटी छह रस्सियाँ। शहर में इन्हें समझने वाले अब गिनती के हैं और उनमें से एक वह था।

भवानीपुर वाली यह इमारत पाँच मंज़िल की थी। उन्नीस सौ छत्तीस की बनी हुई। जेठ के उन दिनों में शाम को काल बैसाखी आ जाती थी और सीढ़ी के रोशनदान बजने लगते थे।

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शिकायत निर्मल ने की थी।

वह सोसाइटी का सचिव था और उसका कहना था कि लिफ़्ट चढ़ते वक़्त सुस्त हो गई है और उतरते वक़्त झटका देती है। यह वही होता है जब पलड़े का हिसाब बिगड़ जाए।

सुकुमार ने पहले दिन तौलकर देखा।

उसने चार बोरे रेत के रखवाए, हर बोरा पचास किलो का, और केबिन को अलग-अलग हालतों में जाँचा। हिसाब यह निकला कि केबिन ख़ाली हालत में भी लगभग साठ किलो भारी बैठ रहा है। साठ किलो कोई मामूली फ़र्क़ नहीं है।

इतने फ़र्क़ पर रस्सियाँ खिंचती हैं, ब्रेक जल्दी घिसता है, और किसी दिन उतरते वक़्त केबिन रुकने में एक-डेढ़ फ़ुट ज़्यादा ले लेता है। वह डेढ़ फ़ुट बूढ़े आदमी की कमर तोड़ने के लिए काफ़ी होता है। उसने केबिन का फ़र्श उखड़वाया। नीचे कुछ नहीं था।

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उसने छत की जाली खोली। ऊपर सिर्फ़ धूल थी। उसने पलड़े के स्लैब गिने और बाईस निकले, जितने होने चाहिए थे। निर्मल ने कहा कि बंद कर देते हैं। यही सबसे आसान रास्ता था और सुकुमार ने भी पहले यही सोचा।

पर पाँचवीं मंज़िल पर अपर्णा दी रहती थीं।

वे इकहत्तर की थीं, अकेली थीं, और उनका दिल का ऑपरेशन तीन साल पहले हुआ था। लड़की कनाडा में थी। उस इमारत में लिफ़्ट बंद होने का मतलब उनके लिए यह था कि वे नीचे नहीं उतर सकेंगी, और तीन महीने पहले जब लिफ़्ट पाँच दिन बंद रही थी तो वे पाँच दिन ऊपर ही रही थीं।

'कितने दिन बंद रखना पड़ेगा?' निर्मल ने पूछा। 'पहले देखना पड़ेगा कि क्या है।' देखने का एक ही तरीक़ा बचा था।

केबिन की छत पर चढ़कर, ऊपर से, धीमी चाल में पूरा कुआँ देखना। इसे इंस्पेक्शन में चलाना कहते हैं। आदमी छत पर खड़ा रहता है, हाथ में डिब्बी वाला बटन रहता है, और लिफ़्ट रेंगती हुई चलती है। यह काम दो आदमियों का है और सुकुमार का लड़का उस दिन नहीं आया था।

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उसने रात नौ बजे किया, जब सब लोग ऊपर चले गए थे और सीढ़ी की बत्तियाँ बुझा दी गई थीं। छत पर चढ़कर उसने बटन दबाया और केबिन नीचे की तरफ़ रेंगने लगा।

कुआँ अंदर से पतला होता है। दीवारें ईंट की, गाइड की पटरियाँ दोनों तरफ़, और बीच-बीच में हर मंज़िल पर दरवाज़े का पिछला हिस्सा। रस्सियाँ ऊपर की तरफ़ जाती हुईं। उसकी टॉर्च की रौशनी में सिर्फ़ चार-पाँच फ़ुट दिखता था और बाक़ी अँधेरा था।

बीच में पलड़ा सामने से गुज़रता है। जब केबिन नीचे जाता है, पलड़ा ऊपर आता है, और दोनों तीसरी मंज़िल के आसपास एक-दूसरे के बग़ल से निकलते हैं। बीच में डेढ़ हाथ की दूरी रहती है। सुकुमार ने टॉर्च उधर कर दी। फिर उसने इंतज़ार किया।

पलड़ा धीरे-धीरे ऊपर आया।

वह ऊपर जा रहा था और उसकी लोहे की ढाँचे वाली शक्ल टॉर्च में एक-एक करके ऊपर सरकती गई। नीचे का जोड़, फिर स्लैबों की ढेरी, फिर ऊपर वाली पट्टी। ऊपर वाली पट्टी और सबसे ऊपर के स्लैब के बीच में एक जगह ख़ाली रहती है, दो-तीन इंच की।

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उस जगह में चप्पलें फँसी हुई थीं। औरतों की, चमड़े की, बहुत पुरानी, एड़ी की तरफ़ से घिसी हुईं। दोनों साथ-साथ रखी थीं, सीधी, जैसे कोई उतारकर रखता है। उन पर ऊपर की तरफ़ धूल की मोटी परत थी। बरसों की।

पलड़ा गुज़रकर ऊपर चला गया। सुकुमार ने बटन नहीं छोड़ा और केबिन नीचे तक गया, और नीचे पहुँचकर वह छत पर बैठ गया और आठ-दस मिनट वहीं बैठा रहा। फिर वह उतरा, गेट बंद किया, और मशीन रूम में चला गया।

अगली सुबह उसने चार स्लैब मँगवाए।

पंद्रह-पंद्रह किलो के, ढले हुए लोहे के, वैसे ही नाप के जैसे पुराने थे। उसने पलड़ा नीचे बफ़र पर उतारा, तीन आदमी लगाकर तिरछा किया, और चारों स्लैब पुरानी ढेरी के ऊपर चढ़ाकर टाई रॉड कस दी।

उसके बाद उसने जाँच दोबारा की। केबिन बीच में लाकर ब्रेक छोड़ा गया। वह वहीं खड़ा रहा। न ऊपर, न नीचे।

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निर्मल ने पूछा कि क्या ख़राबी थी। सुकुमार ने कहा कि पलड़ा हल्का पड़ गया था, ऐसा पुरानी लिफ़्टों में होता है, और बिल में उसने चार स्लैब और मज़दूरी लिखी। लिफ़्ट उसके बाद ठीक चलने लगी और अपर्णा दी अगले चार बरस तक उसी से नीचे आती-जाती रहीं।

उस पलड़े के बाईस स्लैब हरे रंग से पुते हुए हैं, जैसे उस ज़माने में पोता जाता था। सबसे ऊपर के चार बिना रंग के हैं। उस इमारत में जो भी नया मिस्त्री आता है वह ऊपर चढ़कर उन्हें देखता है और नीचे आकर पूछता है कि ये चार बाद में क्यों चढ़ाए गए, और उसे बता दिया जाता है कि पलड़ा हल्का पड़ गया था।