वह रास्ता दिन में आम रास्ता था। खेतों के बीच से निकलता, दोनों तरफ़ बबूल, और आगे जाकर सड़क से मिल जाता। रात में वह वही रास्ता नहीं रहता था। गाँव में कई नाम गिनाए जाते थे। जो उधर गए और लौटे नहीं, और जो लौटे पर बता नहीं पाए कि हुआ क्या। इसलिए अँधेरा होते ही उस रास्ते पर कोई नहीं जाता था, और किसी को इसकी वजह समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
शांतिदेवी दाई थी और दाई को रास्ता चुनने की छूट नहीं होती। बच्चा दिन देखकर नहीं आता। चालीस साल में उसने उस रास्ते को सैकड़ों बार दिन में पार किया था, टोकरी सिर पर रखकर, और कभी कुछ नहीं हुआ था। रात में वह भी नहीं जाती थी। इसकी कोई वजह उसने कभी नहीं सोची थी।
माघ की उस रात कमला के घर से बुलावा आया। कमला का यह पहला बच्चा था और उसकी उमर सत्रह थी, और बुलाने वाला लड़का दौड़ता हुआ आया था, जो अपने आप में एक ख़बर थी। पक्की सड़क से घूमकर जाने में डेढ़ घंटा लगता। रास्ते से चालीस मिनट।
किसी के होने का एहसास
उसने लालटेन नहीं ली। लालटेन से सिर्फ़ अपने पैर दिखते हैं और आगे का अँधेरा और गाढ़ा हो जाता है, यह बात उसे उसकी सास ने सिखाई थी। उसने चाँदनी पर भरोसा किया और चल पड़ी। साथ में टोकरी थी और टोकरी में वह सब जो चाहिए होता है।
आधा रास्ता ठीक बीता। फिर उसे लगा कि वह उसी बबूल के पास दोबारा आ गई है, जिसकी एक डाल टूटकर नीचे लटकी थी। यह हो सकता था। बबूल एक जैसे होते हैं। उसने अपनी ओढ़नी का किनारा फाड़कर एक चिथड़ा उस डाल पर बाँध दिया और आगे बढ़ गई।
थोड़ी देर बाद चिथड़ा फिर सामने था। उसी डाल पर। उसी गाँठ के साथ।
शांतिदेवी वहीं खड़ी हो गई। उसने चिथड़े को छुआ, फिर गाँठ को। गाँठ उसकी अपनी थी, वही जो वह नाल बाँधते वक़्त लगाती है, और वह गाँठ गाँव में कोई और नहीं लगाता। कितनी देर से वह घूम रही थी, यह उसे नहीं पता था। चाँद उसी जगह नहीं था जहाँ चलते वक़्त था।
उसने चीख़ने के बारे में सोचा। फिर सोचा कि सुनेगा कौन, और अगर कोई सुन ले तो वह भी इसी रास्ते पर आएगा। यह हिसाब उसने बहुत जल्दी लगाया, क्योंकि हिसाब लगाने का वक़्त नहीं था। कमला सत्रह की थी और पहला बच्चा था।
खौफ का दूसरा चेहरा
रास्ता छोड़ने का मतलब खेत और खेत के बाद नहर थी। नहर पर पुलिया सिर्फ़ रास्ते वाली जगह पर है। बाक़ी जगह उतरना पड़ता है। माघ की नहर का पानी कमर तक होता है और बर्फ़ जैसा।
टोकरी का सामान भीगने से बेकार हो जाता। रुई, धागा, कैंची, और वह ब्लेड जो उसने उसी दिन नया ख़रीदा था। शांतिदेवी ने टोकरी खोली, ब्लेड और धागा निकालकर अपने जूड़े में खोंस लिया, और बाक़ी सामान मेड़ पर रख दिया। उसे मालूम था कि सुबह तक वह वहाँ नहीं मिलेगा।
उसने टोकरी सिर पर बाँधी और बबूल की क़तार छोड़ दी। खेत की मेड़ पकड़कर वह सीधी उत्तर की तरफ़ चली, इसलिए नहीं कि उसे दिशा दिख रही थी, बल्कि इसलिए कि जुती हुई मिट्टी की सिकुड़नें एक ही तरफ़ जाती हैं और वह उन्हें पैर से पढ़ सकती थी। नहर तक पहुँचने में उसे बीस मिनट लगे।
पानी में उतरते वक़्त उसने टोकरी दोनों हाथों से ऊपर उठा ली। पार करते-करते पैर एक बार फिसला और वह घुटनों के बल गिरी, पर टोकरी ऊपर रही। दूसरी तरफ़ चढ़कर उसने अपनी साड़ी नहीं निचोड़ी, क्योंकि निचोड़ने में वक़्त लगता है। वह भीगे कपड़ों में कमला के घर तक दौड़ी।
बच्चा तड़के पैदा हुआ, लड़की, और साँस लेने में उसे थोड़ा वक़्त लगा। शांतिदेवी ने उसे उलटा करके पीठ थपथपाई और तब वह रोई। कमला बच गई। शांतिदेवी को उस रात के बाद ग्यारह दिन बुख़ार रहा और उसके बाद उसका बायाँ कान कभी पूरा ठीक नहीं हुआ। उन ग्यारह दिनों में गाँव में दो बच्चे और हुए, और दोनों बार किसी और को बुलाना पड़ा।
गाँव में यह बात फैली कि दाई रात में उस रास्ते से गई थी। लोग पूछने आए कि उसने क्या देखा। उसने कहा कि कुछ नहीं देखा, जो सच था। किसी ने यह नहीं पूछा कि फिर वह नहर से क्यों आई। दो-तीन दिन बाद पूछना बंद हो गया, क्योंकि गाँव में डर पुराना था और उसमें नया कुछ जुड़ा नहीं था।
वह लड़की अब बाईस की है और शहर में पढ़ाती है। जब गाँव आती है तो पक्की सड़क से आती है, क्योंकि अब बस उधर से चलती है। उसे यह नहीं मालूम कि जिस रात वह पैदा हुई, उस रात कोई एक ही बबूल के चक्कर काटता रहा था। शांतिदेवी ने उसे यह कभी नहीं बताया, और अब बताने का कोई मतलब भी नहीं है।