सोलन से ऊपर वाली सड़क पर सत्रहवें किलोमीटर पर एक मोड़ है जिसे क्रेन वाले नंबर से जानते हैं, नाम से नहीं। बलबीर उस क्रेन को बारह साल से चला रहा था जो खड्ड में गिरी गाड़ियाँ ऊपर खींचती है। साल में औसतन नौ गाड़ियाँ। उस एक मोड़ से।
काम का तरीक़ा तय था। ख़बर आती, वह रात में या तड़के पहुँचता, तार बाँधता, और जो नीचे पड़ा होता उसे ऊपर लाता। कभी गाड़ी ख़ाली होती। कभी नहीं। बलबीर ने यह देखना सीख लिया था कि नीचे देखने से पहले साँस रोक लेनी चाहिए।
एक बात उसे शुरू से खटकती थी और वह किसी से कह नहीं पाता था, क्योंकि कहने के लिए शब्द नहीं थे। गाड़ियाँ ग़लत तरफ़ गिरती थीं। मोड़ बाएँ को मुड़ता है। तेज़ गाड़ी को दाएँ, बाहर की तरफ़ फेंकना चाहिए। ये अंदर की तरफ़ जाती थीं, पहाड़ी की तरफ़ नहीं, खड्ड की तरफ़, जो मोड़ के भीतर पड़ती है। बारह साल में यह हर बार हुआ।
जो आवाज़ किसी और ने नहीं सुनी
जो ड्राइवर बच जाते थे, वे सब एक ही बात कहते थे, और अस्पताल में कहते थे, जहाँ आदमी सोच-समझकर नहीं बोलता। वे कहते थे कि सड़क दूसरी तरफ़ मुड़ रही थी। एक ने कहा कि मोड़ ने उसे धोखा दिया। यह बात कागज़ में कभी दर्ज नहीं हुई, क्योंकि कागज़ में तेज़ रफ़्तार लिखा जाता है।
जाड़े की एक रात, गाड़ी खींचने के बाद, बलबीर अपनी क्रेन में बैठा रहा और उसने वही किया जो बारह साल में नहीं किया था। उसने अपनी गाड़ी की बत्तियाँ जलाईं और मोड़ को उस जगह से देखा जहाँ से एक ड्राइवर देखता है। तब उसे दिखा।
सड़क के किनारे लगे परावर्तक, वे छोटी सफ़ेद कीलें जो रात में बत्ती पड़ने पर चमकती हैं, मोड़ के भीतरी किनारे पर लगी थीं और बाहरी किनारे पर नहीं। रात में ड्राइवर सड़क नहीं देखता। वह चमकती हुई क़तार देखता है और मान लेता है कि सड़क वहीं है। क़तार खड्ड के ऊपर से होकर जा रही थी।
दिन में यह ग़लती दिखती भी नहीं। दिन में मोड़ साफ़ दिखता है और परावर्तक बुझे रहते हैं। बलबीर ने अगली सुबह जाकर देखा। कीलें नई थीं। पिछले बरसात के बाद ठेकेदार ने पूरी सड़क पर नई कीलें लगवाई थीं, और इस मोड़ पर उन्हें उल्टी तरफ़ लगा दिया गया था।
उसने लोक निर्माण के दफ़्तर में अर्ज़ी दी। अर्ज़ी लेने वाले ने पूछा कि वह इंजीनियर है क्या। उसने कहा कि वह क्रेन चलाता है। इस पर अर्ज़ी रख ली गई और नंबर डाल दिया गया। छह हफ़्ते में कुछ नहीं हुआ। उन छह हफ़्तों में दो गाड़ियाँ गिरीं और एक आदमी मरा।
वहाँ कोई और भी था
उन छह हफ़्तों में उसने दो बार और कोशिश की। एक बार उसने उस पत्रकार को फ़ोन किया जिसका नंबर उसे किसी पुराने हादसे के वक़्त मिला था, और पत्रकार ने कहा कि परावर्तक की ख़बर कोई नहीं छापता। दूसरी बार वह ठेकेदार के मुंशी से मिला, जिसने नक़्शा खोलकर सामने रख दिया। बलबीर ने नक़्शा देखा। नक़्शे में सचमुच वही लिखा था।
फिर उसने वह काम किया जिसका उसे कोई हक़ नहीं था। एक रात वह हथौड़ा और सब्बल लेकर गया और उस मोड़ की सारी कीलें उखाड़कर बाहरी किनारे पर ठोक दीं। काम में उसे चार घंटे लगे और तीन बार उसे बत्तियाँ देखकर सड़क के किनारे लेट जाना पड़ा। सरकारी सड़क से छेड़छाड़ जुर्म है। अगर उस रात के बाद कोई गिरता, तो कीलें उसके हाथ की गवाही देतीं।
उस सर्दी में कोई नहीं गिरा। पूरे मौसम में एक भी नहीं, जो बारह साल में पहली बार हुआ। बलबीर ने किसी को नहीं बताया और उसकी क्रेन उस मोड़ पर नहीं गई।
मार्च में ठेकेदार का दस्ता रंगाई-पुताई के लिए आया और कीलें फिर भीतरी किनारे पर लगा गया, क्योंकि नक़्शे में वही लिखा था। बलबीर ने उन्हें दोबारा उखाड़ा। जून में तीसरी बार। तीसरी बार दस्ते का आदमी सुबह जल्दी आ गया और उसने बलबीर को हथौड़े समेत देखा।
मुक़दमा नहीं चला, पर ठेका देने वाली कंपनी ने उसकी क्रेन का काम बंद करवा दिया। पहाड़ पर रिकवरी का काम एक ही जगह से मिलता है। बलबीर अब चंडीगढ़ के नीचे एक गैराज में ट्रक की बॉडी ठीक करता है, और पहाड़ पर नहीं जाता।
जाँच आख़िर में हुई, अगले साल, किसी और वजह से, और नक़्शा ठीक कर दिया गया। अख़बार में इसकी ख़बर नहीं छपी। सत्रहवें किलोमीटर वाले मोड़ को लोग अब भी उसी नाम से बुलाते हैं जो पहले से चला आ रहा है। बलबीर के केबिन में एक तस्वीर टँगी है, रात में खींची हुई, जिसमें सिर्फ़ चमकती हुई कीलों की एक क़तार दिखती है। किसी ने उससे कभी नहीं पूछा कि यह किसकी तस्वीर है।