उस घर में एक कमरा ऐसा था जिसका दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया। छत की कड़ी से एक रस्सी लटकी हुई थी, और वह वहाँ बरसों से लटकी थी। जिस आदमी ने उसका इस्तेमाल किया था, उसे गाँव में अब कोई याद नहीं करता। रस्सी को किसी ने उतारा नहीं। जिसने भी कोशिश की, वह इस बारे में आज तक चुप है।
वह घर उस बरस बिका, और पूरा नहीं बिका। सिर्फ़ सामान बिका।
शहर में रहने वाले वारिसों ने तय किया कि मकान गिरा दिया जाए। ज़मीन बाद में देखी जाएगी। इस काम के लिए नेकराम को बुलाया गया, जो यही काम करता है, यानी पुराने मकान ख़रीदकर उन्हें खोलता है और उनका सामान बेचता है।
पुराने मकान में पैसा दीवारों में नहीं होता। ईंट पुरानी हो तो आधे दाम की होती है और उसे ढोना अलग ख़र्चा है। पैसा लकड़ी में होता है। छत की कड़ियाँ, चौखट, किवाड़। पचास-साठ साल पुरानी शीशम या साल की कड़ी अब बाज़ार से मिलती भी नहीं।
मकान खोलने का काम ऊपर से नीचे होता है। पहले खपरैल, फिर बल्लियाँ, फिर कड़ियाँ, और सबसे आख़िर में दीवारें। जल्दी करने वाला आदमी इस काम में दब जाता है। नेकराम कभी जल्दी नहीं करता था और गाँव-गाँव में उसकी साख इसी बात की थी।
चैत का महीना था, फ़सल कट चुकी थी, और गाँव में तीन मकान बन रहे थे। यानी कड़ी का ख़रीदार पहले से मौजूद था।
नेकराम ने काम तीन दिन में निपटाने की सोची। पहले दिन किवाड़ और चौखट उतरे। दूसरे दिन ऊपर की छत खुलनी थी।
जिस कमरे का दरवाज़ा कभी नहीं खोला गया था, वह ऊपर वाली छत के नीचे ही था।
दरवाज़ा खोलने में कोई मुश्किल नहीं हुई। कुंडी में ज़ंग था और वह एक बार में टूट गई। भीतर वही था जो ऐसे कमरों में होता है। धूल, एक टूटी खाट का ढाँचा, दीवार पर पुराना कैलेंडर जिसका सिर्फ़ ऊपरी हिस्सा बचा था। और छत की कड़ी से लटकी हुई रस्सी।
नेकराम इस काम में बीस साल से था। बंद कमरों में उसने इससे बुरी चीज़ें देखी थीं। उसने रस्सी की तरफ़ देखा और फिर छत की तरफ़ देखा, इसलिए कि उसका काम रस्सी नहीं, कड़ी थी।
कड़ी अच्छी थी। साल की, सीधी, बिना दरार के।
रस्सी उतारने के लिए वह खाट के ढाँचे पर चढ़ा। और वहीं, आँख के बराबर पहुँचकर, उसने वह चीज़ देखी जिसकी वजह से वह रुका।
रस्सी कड़ी पर दो बार लपेटी गई थी और उसके बाद एक ख़ास गाँठ लगाई गई थी। यह वह गाँठ है जो रस्सी को कड़ी पर सरकने नहीं देती। नेकराम इसे जानता था। यह गाँठ पालने की होती है।
पालना कड़ी से लटकाया जाता है और वह इधर-उधर झूलता है। अगर रस्सी सरकती रहे तो पालना दीवार से टकराता है। इसलिए यह गाँठ लगाई जाती है।
उसने कड़ी की सतह देखी, ठीक वहाँ जहाँ रस्सी लिपटी थी। लकड़ी वहाँ घिसी हुई थी। रस्सी के नीचे एक हल्की सी नाली बन चुकी थी और वह चिकनी थी।
एक बार का बोझ लकड़ी में नाली नहीं बनाता। नाली बरसों के आने-जाने से बनती है।
नेकराम ने दोबारा देखा। नाली दोनों तरफ़ बराबर घिसी थी।
उसी दोपहर उसने चाय की दुकान पर बात निकाली। उसने नाम नहीं पूछा। उसने सिर्फ़ इतना पूछा कि ऊपर वाले कमरे में पालना कब तक रहा होगा। दुकान पर चार आदमी बैठे थे। एक ने कहा कि उसे नहीं मालूम। दूसरा उठकर चला गया। तीसरे ने चाय के पैसे रखे और वह भी चला गया। चौथा वहीं बैठा रहा और उसने मौसम की बात छेड़ दी।
उसने रस्सी काटी, नीचे उतरा, और उसे बाहर ले जाकर जला दिया। जलाने में उसे कुछ ख़ास नहीं लगा। रस्सी जलती है और बदबू करती है, बस इतना ही। राख उसने पैर से बिखेर दी। इसमें कोई रस्म नहीं थी। वहाँ राख पड़ी रहती तो लोग देखते।
उस रात उसने हिसाब लगाया। बीच वाली कड़ी के तीन हज़ार मिलने थे और पूरे मकान के सत्रह। तीन हज़ार छोड़ने का मतलब था कि तीन दिन का काम मुफ़्त गया। और छोड़कर करता भी क्या। कड़ी को जलाता, और जलती हुई कड़ी देखकर गाँव में कोई न कोई पूछता कि यह क्यों जला रहे हो।
तीसरे दिन कड़ियाँ उतरीं। बीच वाली कड़ी, जो सबसे लंबी और सबसे अच्छी थी, वही थी।
ख़रीदार सोबरन था, जिसका मकान मोड़ के पास बन रहा था। दाम पहले से तय था। कड़ी ले जाते वक़्त नेकराम ने उससे इतना कहा कि यह उस बंद कमरे वाली है। सोबरन ने कहा कि हाँ, तो। नेकराम के पास इसके आगे कहने को कुछ था नहीं, क्योंकि जो उसने देखा था वह एक गाँठ थी और लकड़ी पर एक नाली।
सोबरन का मकान उस बरसात से पहले बनकर तैयार हो गया।
नेकराम उस मोड़ से हफ़्ते में तीन-चार बार निकलता है। बीच वाले कमरे की खिड़की सड़क की तरफ़ है और भीतर की कड़ी बाहर से दिख जाती है। उस कड़ी से अब एक पालना बँधा है, क्योंकि पालने कड़ी से ही बाँधे जाते हैं और वह कमरे की सबसे मज़बूत कड़ी है।
उस कड़ी के जो पैसे मिले थे, वे बाक़ी पैसों में मिल गए और कब के ख़र्च हो चुके हैं। नेकराम को यही बात सबसे ज़्यादा खटकती है, कि उन पैसों को अलग करके पहचाना भी नहीं जा सकता।