उस रास्ते का नाम किसी ने रखा नहीं था। वह अपने आप पड़ गया था। कहर का रास्ता। वह जंगल और पहाड़ी के बीच से निकलता था और गाँव को दूसरी तरफ़ से जोड़ता था। दूसरा रास्ता भी था, तीन गुना लंबा। ज़्यादातर लोग वही लेते थे। जो जल्दी में होते, वे कहर के रास्ते से जाते, और फिर उनमें से कुछ के बारे में बातें होने लगतीं।
रवीश उस शाम बहादुरी दिखाने नहीं निकला था। उसका छोटा भाई तीन दिन से बुख़ार में था, और उस दोपहर से उसने आँखें नहीं खोली थीं। कंपाउंडर पहाड़ी के उस तरफ़ रहता था। लंबे रास्ते से चार घंटे लगते। कहर के रास्ते से सवा घंटा। सूरज डूब चुका था। रवीश ने माँ से यह नहीं बताया कि वह किस रास्ते से जा रहा है, क्योंकि बताता तो रुकना पड़ता। उसने चप्पल पहनी, टॉर्च उठाई और निकल गया।
रास्ता शुरू में आम रास्ते जैसा ही था। पथरीला, ढलान वाला, दोनों तरफ़ सूखी झाड़ियाँ। फिर आवाज़ें बंद हो गईं। झींगुर पहले, फिर हवा। रवीश ने पैर पटककर देखा। आवाज़ हुई, पर वह उसे बहुत दूर से आती लगी, जैसे किसी और के पैर की हो। उसने टॉर्च आगे की। रोशनी दस क़दम पर जाकर रुक गई, जैसे उसके आगे कुछ हो ही न।
डर ने चेहरा बदला
आधे घंटे बाद उसे मील का पहला पत्थर मिला। पुराना, चूने से पुता हुआ, उस पर काले रंग से लिखा था: 4. रवीश को यह अच्छा लगा। चार मील बचे थे। उसने रफ़्तार बढ़ा दी। रास्ते में एक जगह पानी की आवाज़ आई, पर नाला कहीं दिखा नहीं। उसने इस पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि उसके पास ध्यान देने का वक़्त नहीं था।
बीस मिनट बाद अगला पत्थर आया। उस पर भी 4 लिखा था। रवीश रुक गया। उसने टॉर्च पत्थर पर घुमाई और उसे हाथ से छूकर देखा। चूना वहीं से उखड़ा हुआ था जहाँ से पहले वाले का उखड़ा था। बिलकुल वैसा ही, उसी कोने से। उसने ख़ुद को समझाया कि पुराने पत्थर एक जैसे ही दिखते हैं। फिर वह आगे बढ़ गया, पहले से तेज़।
तीसरा पत्थर भी 4 निकला। इस बार रवीश उसके पास बैठ गया और टॉर्च नीचे की। पत्थर की जड़ में घास दबी हुई थी, और उस घास में चीज़ें पड़ी थीं। एक चप्पल। एक टिफ़िन, जिसका ढक्कन खुला था। एक कंघी। एक चूड़ी, टूटी हुई नहीं, पूरी। ये सब वहाँ बहुत दिनों से थे। कुछ तो बरसों से, क्योंकि टिफ़िन के अंदर तक मिट्टी भर चुकी थी।
रवीश खड़ा हुआ और वापस मुड़ गया। पीछे का रास्ता वैसा ही दिख रहा था जैसा आगे का। वह तेज़ चला, फिर दौड़ा। दौड़ते हुए उसे यक़ीन था कि वह गाँव की तरफ़ ही जा रहा है। फिर सामने एक पत्थर आया। उस पर 4 लिखा था। उसकी जड़ में एक चप्पल पड़ी थी, एक टिफ़िन, एक कंघी।
रवीश वहीं बैठ गया, क्योंकि टाँगें उसे और खड़ा नहीं रख रही थीं। साँस लौटने में देर लगी। जब लौटी, तो उसे वे बातें याद आईं जो गाँव में होती रहती थीं, और पहली बार वह उन्हें ध्यान से याद करने लगा। जो लोग इस रास्ते पर खोए, वे सब जल्दी में थे। बच्चे को दवा दिलाने जाता एक आदमी। मंडी पकड़ने वाला एक व्यापारी। भागकर शादी करने वाले दो लोग। कोई भी टहलने नहीं निकला था। जो घूमने आता था, वह लौट आता था।
अँधेरे ने रास्ता रोक लिया
अगर यह सच था, तो रास्ता उसे इसलिए नहीं छोड़ रहा था क्योंकि उसे जाना था। और उसे जाना था। पहाड़ी के उस तरफ़ कंपाउंडर था, और घर में वह भाई था जिसने दोपहर से आँख नहीं खोली थी। बैठे रहने का सीधा मतलब यह था कि दवा सुबह से पहले नहीं पहुँचेगी। रवीश ने टॉर्च बुझा दी और पत्थर से पीठ टिका ली। यह उसकी ज़िंदगी का सबसे मुश्किल काम था: कुछ न करना।
रात लंबी थी। दो बार उसे लगा कि झाड़ियों में कोई चल रहा है, और दोनों बार उसने टॉर्च नहीं जलाई। एक बार कोई उसके बहुत पास आकर रुका। इतना पास कि रवीश को साँस सुनाई दी, अपनी नहीं। उसने आँखें बंद कर लीं और मन में गिनती गिनने लगा, धीरे-धीरे, क्योंकि जल्दी गिनना भी जल्दी करना है। जो पास आया था, वह देर तक वहीं खड़ा रहा। फिर चला गया। रवीश ने आँखें तब खोलीं जब पत्थर पर लिखा 4 अपने आप दिखने लगा।
उजाला होते ही रवीश उठा और चल पड़ा। धीरे। दस मिनट बाद अगला पत्थर आया, और उस पर 3 लिखा था। उसके बाद 2। उसने रफ़्तार फिर भी नहीं बढ़ाई, हालाँकि अब हर क़दम पर मन कर रहा था। जब वह पहाड़ी के उस तरफ़ पहुँचा, तब कंपाउंडर अपनी दुकान का ताला खोल रहा था। रवीश ने दरवाज़े पर हाथ रखा और उसके बाद पहली बार अपनी आवाज़ में जल्दी आने दी।
भाई का बुख़ार रात में ही उतर गया था, दवा पहुँचने से पहले। रवीश ने घर में यह नहीं बताया कि वह रात कहाँ रुका था, और माँ ने पूछा भी नहीं, क्योंकि दवा आ गई थी और उतना काफ़ी था। अब वह हमेशा लंबा रास्ता लेता है, तीन गुना लंबा, देर हो जाने पर भी। ख़ासकर देर हो जाने पर। एक बार उसने जल्दी में जाते एक आदमी को रोककर समझाने की कोशिश की थी। उसके बाद उसने कोशिश करना छोड़ दिया।