घर की छत बीच से बैठ चुकी थी और खिड़कियों के काँच कब के टूट गए थे। गाँव में उसे कोई नाम से नहीं पुकारता था। बस 'वो सुनसान घर' कहते। बच्चों को वहाँ खेलने से मना किया जाता था, और बड़े ख़ुद भी उधर से नहीं गुज़रते थे। रात को उस घर से आवाज़ें आती हैं, यह कई लोगों ने कहा था। जाँचने की कोशिश किसी ने नहीं की।
धनिया के घर की एक दीवार उसी घर से लगी हुई थी। दोनों मकान एक ही वक़्त बने थे। दीवार एक ही थी। तब यह किसी को अजीब नहीं लगा था, क्योंकि तब दोनों में लोग रहते थे। धनिया की शादी होकर वह उस घर में तब आई जब उधर वाला घर खाली हुए बारह साल हो चुके थे।
साझी दीवार उसकी रसोई की दीवार थी। चूल्हा उसी से सटा था। बर्तन उसी के आले में रखे जाते थे। यह घर का सबसे काम वाला कोना था और वहाँ दिन में सबसे ज़्यादा वक़्त वही बिताती थी।
आवाज़ें रात में नहीं आती थीं। यह बात गाँव की बताई हुई बात से अलग थी और शायद इसीलिए धनिया ने पहले साल किसी से कहा नहीं। वे दोपहर में आती थीं, दो और चार के बीच, जब आदमी खेत पर होते हैं, बच्चे स्कूल में, और घर में कोई नहीं बचता।
आवाज़ें डरावनी नहीं थीं। डर इसी बात का था। बर्तन रखने की आवाज़। झाड़ू की। किसी के चलने की, नंगे पाँव, धीरे। घर के काम की आवाज़ें, जो हर घर से आती हैं, उस घर से आ रही थीं जिसमें बारह साल से कोई नहीं था।
उसने आख़िर एक दिन अपनी सास से कहा। सास ने कहा कि चूहे होंगे। धनिया ने कहा कि चूहे झाड़ू नहीं लगाते। सास कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं कि इस घर में यह बात किसी से मत कहना। फिर उठकर चली गईं। यह मना करना अपने आप में एक जवाब था।
दूसरे साल आवाज़ों में एक बात बदल गई। पहले वे कभी भी आ जाती थीं। अब वे तब आने लगीं जब धनिया काम कर रही होती। वह बर्तन रखती, और उधर भी बर्तन रखा जाता। वह झाड़ू उठाती। उधर झाड़ू चलने लगती। पहले-पहल उसे लगा कि यह उसका वहम है।
फिर उसने जाँचकर देखा। एक दोपहर उसने झाड़ू बिल्कुल नहीं लगाई, कुछ भी नहीं किया, बस चटाई पर बैठी रही। उस दोपहर उस तरफ़ से कोई आवाज़ नहीं आई। तीन दिन तक उसने यही किया और तीनों दिन चुप्पी रही।
चौथे दिन उसने बर्तन उठाया और नीचे रख दिया। एक ही बार। उस पार भी एक ही बार कुछ रखा गया।
इसके बाद उसने कई तरह से जाँचा। उसने वक़्त बदला और सुबह ग्यारह बजे काम किया, और आवाज़ें ग्यारह बजे आईं। उसने बहुत धीरे काम करके देखा। उधर भी धीरे हुआ। एक दिन उसने जान-बूझकर बर्तन गिरा दिया, ज़ोर से, और उस पार भी कुछ गिरा, उतनी ही ज़ोर से।
सबसे बुरी दोपहर वह थी जब उसने बीच में रुककर देखा। वह आटा गूँथ रही थी। उसने हाथ रोक दिए। उस तरफ़ भी सब रुक गया। वह पंद्रह मिनट बैठी रही, हाथ आटे में डूबे हुए, और उस पूरे वक़्त उधर से कोई आवाज़ नहीं आई। जो कुछ भी उस तरफ़ था, वह भी इंतज़ार कर रहा था।
उसने उसके बाद जाँचना छोड़ दिया।
उसने चूल्हा रसोई के दूसरे कोने में करवा लिया, हालाँकि वहाँ धुआँ ठीक से नहीं निकलता था। बर्तन उसने आले से हटाकर नीचे रख दिए। घर में किसी ने पूछा तो उसने कहा कि इस तरफ़ रोशनी ज़्यादा आती है। आवाज़ें फिर भी वैसी ही रहीं। वे दीवार से आती थीं, चूल्हे से नहीं।
तीसरे साल उसने अपने आदमी से कहा कि उस दीवार के अंदर एक और दीवार बनवा दो। उसने वजह नहीं बताई और उससे वजह पूछी भी नहीं गई, जिससे धनिया को समझ आया कि घर में वह अकेली नहीं थी जिसने यह सुना था। ईंट और मज़दूरी में उस साल की पूरी बचत चली गई, और रसोई एक फ़ुट छोटी हो गई।
मिस्त्री दो दिन लगे। दूसरे दिन नई दीवार को पुरानी से जोड़ने के लिए उन्होंने पुरानी दीवार में जगह-जगह छेद किए, ताकि दोनों बँध जाएँ। छेद उस पार तक जाते थे। उन छेदों में से हवा आती थी और वह ठंडी थी, हालाँकि दोपहर का वक़्त था। धनिया आँगन में बैठी रही और उसने उधर देखा नहीं।
शाम को मिस्त्री ने उसे बुलाकर कुछ दिखाया। उसने कहा कि यह अजीब बात है। उस पार वाली सतह पर पलस्तर था, और वह पलस्तर पुराना नहीं था। बाहर से देखने पर वह घर बारह साल से खँडहर था, उसकी छत गिर चुकी थी, और उसकी दीवारों पर बरसात के निशान थे। पर साझी दीवार की उस तरफ़ किसी ने पलस्तर किया हुआ था, हाल में, और अंदर की तरफ़ से।
मिस्त्री ने पूछा कि उधर कोई रहता है क्या। धनिया ने कहा, नहीं। मिस्त्री ने आगे कुछ नहीं जानना चाहा। उसने शाम तक काम पूरा किया और चला गया।
नई दीवार के बाद आवाज़ें बंद हो गईं, उसी दिन से, और उसके बाद फिर कभी नहीं आईं। धनिया ने चूल्हा वापस पुरानी जगह पर नहीं करवाया। रसोई अब भी एक फ़ुट छोटी है और उस कोने में अब आटे का ड्रम रखा रहता है, दीवार से सटाकर, ऊपर तक भरा हुआ।