जून के तीसरे हफ़्ते से उन पहाड़ों पर बादल नीचे उतर आते हैं और फिर सितंबर तक ऊपर नहीं जाते। कुन्नूर के उस स्कूल में यह सबसे पुरानी बात थी।

मानसून में वहाँ धूप नहीं निकलती। कपड़े धोकर बाहर डालो तो तीन दिन में भी नहीं सूखते और चौथे दिन उनमें से बू आने लगती है। कमरों की दीवारें अंदर से गीली रहती हैं और किताबों के पन्ने आपस में चिपक जाते हैं।

इसीलिए हर पुराने हॉस्टल में एक कमरा सुखाने का होता है।

उस स्कूल में वह रसोई के पीछे था। छोटा कमरा, बिना खिड़की के, जिसमें दीवार से दीवार तक रस्सियाँ बँधी थीं और एक तरफ़ की दीवार पर नब्बे खूँटियाँ लगी थीं, नंबर डाली हुईं।

उसकी गरमी नीचे से आती थी।

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बॉयलर उसी दीवार के दूसरी तरफ़ लगा था। उसकी चिमनी का पाइप सुखाने वाले कमरे की दीवार के अंदर से होकर ऊपर जाता था। पाइप गरम होता, दीवार गरम होती, और कमरा गरम रहता। यह बंदोबस्त उन्नीस सौ इकतीस का था और तब से चल रहा था।

राजन बॉयलर वाला था।

वह रोज़ सुबह चार बजे आग लगाता था, ताकि छह बजे तक नब्बे लड़कों के लिए गरम पानी हो जाए, और शाम को एक बार और लगाता था। उसे उस बॉयलर के साथ काम करते सोलह बरस हो चुके थे और उसकी हर आवाज़ उसे मालूम थी। इसके अलावा सुखाने वाले कमरे की चाबी उसी के पास रहती थी।

बात उसे उन्नीस जून को खटकी। उस सुबह उसने कमरा खोला और अंदर की हवा हमेशा से ज़्यादा गरम थी।

यह उलटी बात थी, क्योंकि रात को बॉयलर बंद रहता है और सुबह तक कमरा ठंडा पड़ जाता है। लड़के अपने कपड़े शाम को टाँगते हैं और सुबह तक वे आधे सूखे मिलते हैं, पूरे नहीं। उस सुबह एक खूँटी के कपड़े पूरे सूखे थे।

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सैंतालीस नंबर। बाक़ी उनासी खूँटियों के कपड़े वैसे ही अधसूखे थे जैसे रोज़ होते हैं, और उन्हें छूने पर ठंडक लगती थी। सैंतालीस वाले गरम थे। राजन ने उस दिन किसी से कुछ नहीं कहा। अगली सुबह उसने सबसे पहले वही खूँटी देखी।

वही हाल था।

तीसरे दिन उसने शाम को उस खूँटी पर एक गीला तौलिया ख़ुद टाँगा, अपना, जिस पर कोई नंबर नहीं था। सुबह वह सूखा था और उसमें से हल्की-सी गरमाहट आ रही थी। उसने वार्डन को बताया। वार्डन ने कहा कि चिमनी का पाइप वहीं से गुज़रता होगा और उसमें दरार होगी।

यह ठीक बात थी और यही सबसे पहले सोचनी चाहिए।

और वह ख़तरनाक भी थी। चिमनी में दरार हो तो जलने वाली गैस दीवार से रिसकर कमरे में आती है। वह गैस बेरंग होती है, बेगंध होती है, और बंद कमरे में सोए हुए आदमी को उठने नहीं देती। और लड़के उस कमरे में सोते थे।

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यह राजन को मालूम था। मानसून में वह अकेली गरम जगह होती है और लड़के ताला खुला पाकर वहाँ घुस जाते हैं। दो बरस पहले तीन लड़के वहीं सोते पकड़े गए थे। उसने बॉयलर बंद कर दिया। यह उसके अपने हाथ का फ़ैसला था और उसे इसका हक़ नहीं था।

बॉयलर बंद होने का मतलब नब्बे लड़कों के लिए ठंडा पानी, चार दिन तक, उन पहाड़ों में जहाँ जून की सुबह का पानी बर्फ़ जैसा होता है। शिकायतें उसी दिन शुरू हो गईं और वार्डन ने उससे लिखवाकर लिया कि यह उसने अपनी ज़िम्मेदारी पर किया है।

वह ठेके पर था और ठेका हर बरस जुलाई में बढ़ता था। जुलाई उसी महीने के बाद आती थी। चौथे दिन उसने दीवार तुड़वाई। मिस्त्री ने सैंतालीस नंबर वाली जगह के पीछे से ईंटें निकालीं और पाइप बाहर आया। दरार थी।

पुरानी थी, जोड़ के पास से, और लगभग तीन इंच लंबी। वार्डन ने उसे देखा और कहा कि अच्छा हुआ जो पकड़ लिया। राजन ने उस दरार पर हाथ रखा। पाइप ठंडा था। यह ठीक था, क्योंकि बॉयलर चार दिन से बंद था।

फिर उसने दीवार पर हाथ रखा, उसी जगह, खूँटी के पास। दीवार गरम थी। उसने दोनों हाथ बदलकर दोबारा देखा और फिर मिस्त्री से भी छुआकर देखा। पाइप ठंडा, दीवार गरम। बीच में चार इंच ईंट के अलावा कुछ नहीं था।

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मिस्त्री ने कहा कि ईंट देर से ठंडी होती है।

चार दिन में हो जाती है। उसने यह भी कहा कि ऊपर वाली मंज़िल की गरमी नीचे उतर आती होगी, और ऊपर उस हिस्से में सिर्फ़ पानी की टंकी थी, जो उस कोने से दस हाथ दूर पड़ती है। दरार उसी दिन सीमेंट से बंद कर दी गई और पाँचवें दिन बॉयलर चालू हो गया।

उसके बाद सुखाने वाला कमरा वैसा ही हो गया जैसा उन पहाड़ों में हर कमरा होता है। कपड़े अब वहाँ तीन दिन में सूखते हैं और मानसून में उससे भी ज़्यादा लगते हैं। लड़के अब वहाँ सोने नहीं घुसते, क्योंकि वहाँ जाकर कोई फ़ायदा नहीं।

सिर्फ़ सैंतालीस नंबर की खूँटी वैसी की वैसी है।

उस पर टँगा कपड़ा एक रात में सूख जाता है और सुबह छूने पर गरम मिलता है, और उस खूँटी के लिए लड़कों में हर मानसून में झगड़ा होता है। स्कूल के दफ़्तर में इसकी कोई शिकायत आज तक नहीं आई, क्योंकि जिस लड़के को वह खूँटी मिल जाती है वह किसी से कुछ नहीं कहता।