बारिश रुकी और पूरी बस्ती से भाप उठने लगी। सालखू छत पर खड़ा था और उसने यह पंद्रह बरस से हर बरसात में देखा था। झरिया के नीचे कोयला जल रहा है।

वह सौ बरस से जल रहा है और अब भी जल रहा है। नीचे की परतें सुलगती रहती हैं, ऊपर की मिट्टी गरम रहती है, और जगह-जगह दरारें पड़ जाती हैं जिनसे धुआँ निकलता है। बरसात में यह दिखने लायक़ हो जाता है।

पानी गरम ज़मीन पर गिरता है और उसी वक़्त भाप बनकर उठ जाता है। हर दरार से, हर गड्ढे से, आँगन की फ़र्श से भी। बारिश के बाद आधे घंटे तक बस्ती के ऊपर सफ़ेद चादर-सी बनी रहती है।

सालखू का काम यही देखना था।

वह कंपनी में सर्वे वाले दफ़्तर का आदमी था और उसका ज़िम्मा बस्तियों का था। नई दरार कहाँ पड़ी, कितनी चौड़ी है, ज़मीन कहाँ बैठ रही है, और कौन-सा घर ख़ाली कराना है। ख़ाली कराने का मतलब घर की दीवार पर लाल रंग से नंबर डालना होता है।

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उसने पंद्रह बरस में चार सौ से ऊपर नंबर डाले थे। हर बार झगड़ा हुआ था, क्योंकि जिन्हें हटाया जाता है उन्हें जाना कहीं नहीं होता। उस बरसात में उसे धोबीपाड़े वाली लाइन देखनी थी।

वहाँ ग्यारह घर थे और ज़मीन पिछले दो बरस में तीन इंच बैठ चुकी थी। तीन इंच कुछ नहीं होता। जिस दिन वह तीन फ़ुट होती है, उस दिन घर एक ही रात में अंदर चला जाता है। सातवें घर के आँगन में दरार थी।

वह एक हाथ लंबी थी और उँगली भर चौड़ी, और वह आँगन के बीचोंबीच से गुज़रकर दीवार के नीचे चली जाती थी।

उससे भाप नहीं निकल रही थी।

बाक़ी दसों घरों के आँगन से निकल रही थी। गली से निकल रही थी। सामने के नाले से निकल रही थी। सालखू नीचे उतरकर उस आँगन में गया। घर करमा का था। वह चालीस के आसपास का था, कोयला बीनने का काम करता था, और उसके साथ उसकी औरत और तीन बच्चे थे।

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सालखू ने पहले हाथ से ज़मीन छूकर देखी। आँगन गरम था, उतना ही जितना बाक़ी बस्ती में होता है। यानी नीचे आग वहाँ भी थी। फिर उसने दरार के मुँह पर हाथ रखा। वहाँ से हवा नहीं आ रही थी। न गरम, न ठंडी। कुछ भी नहीं।

उसने एक कंकड़ डाला। गिरने की आवाज़ नहीं आई। यह अपने आप में डरने की बात नहीं है। नीचे कोयला जला हुआ हो तो खोखली जगहें बन जाती हैं और कंकड़ बहुत नीचे तक जा सकता है। फिर उसने पानी डाला।

करमा से माँगकर उसने एक बाल्टी भर पानी लिया और पूरा का पूरा उस दरार में उड़ेल दिया। गरम ज़मीन पर पानी डालो तो वह चिड़चिड़ाता है और भाप उठती है। यह हर आदमी जानता है और झरिया में तो बच्चे भी जानते हैं।

बाल्टी ख़ाली हो गई। न आवाज़ आई, न भाप उठी, न पानी वापस आया। सालखू ने दूसरी बाल्टी माँगी। करमा ने पूछा कि क्या हुआ है। सालखू ने बस इतना कहा कि नाप ले रहा हूँ। दूसरी बाल्टी भी उसी तरह गई। फिर तीसरी।

तीन बाल्टी पानी उस दरार में गया और उसमें से एक बूँद भाप नहीं बनी, जबकि उसी आँगन के बाक़ी हिस्से पर छींटे गिरे तो वहाँ से भाप उठ गई। सालखू ने बाल्टी नीचे रख दी और सीधा हो गया।

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उसका काम आसान था और उसे मालूम था। जो घर बैठने वाला हो, उस पर नंबर डालो। इस घर के नीचे खोखल है, यह साफ़ था। तीन बाल्टी पानी कहीं तो जा रहा था। पर नियम यह भी था कि नंबर वहीं डलता है जहाँ नाप में गिरावट दिखे, और धोबीपाड़े की गिरावट तीन इंच थी, जो सूची में नहीं आती।

और नंबर डालने का मतलब करमा के लिए यह होता कि वह उसी हफ़्ते बाहर, और कहीं नहीं। सालखू ने नंबर डाल दिया।

उसने रंग का डिब्बा खोला और सातवें घर की दीवार पर लाल रंग से आँकड़ा लिख दिया, और नीचे तारीख़ डाल दी, और उस दिन उसने बाक़ी दस घरों पर कुछ नहीं लिखा। करमा ने उससे बहस की और फिर गाली दी और फिर हाथ जोड़े।

सालखू ने वजह नहीं बताई। बताता तो बस्ती में बात फैलती और बात फैलने का उस जगह पर क्या मतलब होता है, यह उसे मालूम था। उसने अपने दफ़्तर में भी वजह वही लिखी जो लिखी जाती है। ज़मीन की हालत।

करमा का परिवार ग्यारह दिन बाद हटा, दो गली दूर, एक टीन के शेड में। उसने दो साल तक सालखू से बात नहीं की। उस घर को तोड़ा नहीं गया, क्योंकि कंपनी ख़ाली कराए हुए घर तोड़ती नहीं, बस उन पर नंबर छोड़ देती है।

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अगस्त की एक रात, बहुत तेज़ बारिश के बाद, धोबीपाड़े की ज़मीन बैठी। सातवाँ घर और उसके दोनों तरफ़ वाले दो घर, तीनों, एक साथ नीचे चले गए। गड्ढा चौबीस फ़ुट गहरा नापा गया। उन दोनों घरों में उस रात कोई नहीं था, यह इत्तिफ़ाक़ था।

सालखू आज भी उसी काम पर है और अब उसकी उम्र इक्यावन है।

गड्ढा तीन महीने बाद मलबे से भरा गया और उसके ऊपर अब कुछ नहीं है, बस समतल ज़मीन है जिस पर बरसात में भाप उठती है। जो बाल्टी उसने उस दिन तीन बार भरी थी, वह करमा के पुराने आँगन में ही छूट गई थी और मलबे के साथ नीचे चली गई, और सालखू ने उसके पैसे करमा को दे दिए थे, हालाँकि करमा ने माँगे नहीं थे।