चौथे दिन जोगेन ने बंडल का सिरा खींचा और छाल हाथ में आ गई। यह अठारहवें दिन होना चाहिए था। पटसन काटने के बाद उसे पानी में गलाना पड़ता है, जिसे वहाँ जाग देना कहते हैं।
डंठलों के गट्ठर पोखर में डुबोकर उन पर केले के तने और मिट्टी रख दी जाती है, ताकि वे पूरे डूबे रहें। पानी काला पड़ जाता है और उसमें से जो गंध उठती है वह पूरे गाँव में फैलती है।
उस गंध को हर आदमी पहचानता है और कोई उसकी शिकायत नहीं करता, क्योंकि वही गंध पैसे की है।
अठारह से बीस दिन लगते हैं।
इसमें कोई छूट नहीं होती। कम दिन में छाल नहीं छूटती, ज़्यादा में रेशा कमज़ोर पड़ जाता है और काला हो जाता है, और काला रेशा आधे दाम में जाता है। जोगेन के पास डेढ़ बीघे का पटसन था। कूचबिहार की उस तरफ़ जुलाई में कटाई होती है और सब लोग एक ही हफ़्ते में काटते हैं, इसलिए पोखर कम पड़ जाते हैं।
उसके अपने पोखर में उसके सब गट्ठर नहीं समाए।
इसलिए उसने बाक़ी नौ गट्ठर उस पुराने पोखर में डाल दिए जो खेत के उत्तरी सिरे पर था और जिसे उसके बाप के वक़्त से कोई इस्तेमाल नहीं करता था।
उसकी वजह कोई ख़ास नहीं थी।
गाँव में इतना कहा जाता था कि वह पोखर गहरा है और उसका तल नहीं मिलता। ऐसा हर पुराने पोखर के बारे में कहते हैं। गट्ठर पहली तारीख़ को डाले गए।
चौथे दिन जोगेन उधर से गुज़रा और उसने आदत के मुताबिक़ एक सिरा खींचकर देखा। छाल छूट गई। उसने दूसरा गट्ठर देखा। फिर तीसरा। नौ के नौ तैयार थे। और रेशा किसी भी हालत में ख़राब नहीं था। वह सुनहरा था, चमकदार, और उतना लंबा जितना सबसे अच्छे माल में होता है। जोगेन ने अपनी उम्र में उससे अच्छा रेशा नहीं देखा था।
उसने यह किसी से नहीं कहा।
पहला कारण साफ़ था। अगर वह उस माल को अभी निकाल ले, तो वह गाँव में सबसे पहले बाज़ार पहुँचेगा। शुरू के दिनों में पटसन का दाम सबसे ऊँचा रहता है और दो हफ़्ते बाद वह गिर जाता है, जब सबका माल एक साथ आता है।
दो हफ़्ते पहले पहुँचने का मतलब उस माल पर लगभग दुगना दाम था। दूसरा कारण यह था कि वह ख़ुद समझना चाहता था। पाँचवें दिन वह सुबह-सुबह वहाँ गया और पानी देखा। जाग वाले पोखर का पानी काला होता है, गाढ़ा, और उस पर झाग की एक परत रहती है। उसमें हाथ डालो तो हाथ पर लसलसी परत चढ़ जाती है।
उस पोखर का पानी साफ़ था।
नीचे तक दिख रहा था, और नीचे गट्ठर पड़े हुए थे, और उनके चारों तरफ़ का पानी बिलकुल साफ़ था, जैसे वे किसी और चीज़ में पड़े हों।
गंध भी नहीं थी।
अपने वाले पोखर से चालीस क़दम दूर, जहाँ से बदबू सिर में चढ़ती थी, इस पोखर के किनारे खड़े होकर कुछ भी सूँघने को नहीं मिलता था। जोगेन उस दिन बहुत देर वहाँ बैठा रहा।
छठे दिन उसने एक गट्ठर निकालने का फ़ैसला किया। गट्ठर निकालना पानी में उतरकर होता है। जाग वाला पोखर छाती तक गहरा रहता है और उसका तल दलदली होता है, और उसमें पैर धँसते हैं।
वह उतरा।
पानी ठंडा था और साफ़ था, और उसमें उतरते ही उसे एक बात महसूस हुई जो उसने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
तल सख़्त था।
किसी पुराने पोखर का तल सख़्त नहीं होता। उसमें बरसों की गाद जमी रहती है और आदमी घुटनों तक धँसता है। यह पत्थर जैसा था और बिलकुल बराबर था। जोगेन ने एक गट्ठर की रस्सी पकड़ी और खींची और वह हल्का आ गया, इतना हल्का कि वह पीछे को लड़खड़ा गया।
उसने उसे बाहर निकालकर खोला। रेशा पूरा था। सुनहरा, लंबा, बिना गाँठ का। अंदर के डंठल नहीं थे।
जाग देने के बाद डंठल बचते हैं। गीली लकड़ी की तरह, हल्के, और उन्हें अलग करके सुखाकर जलावन में इस्तेमाल किया जाता है। हर गट्ठर से डंठलों का एक ढेर निकलता है। उस गट्ठर में सिर्फ़ रेशा था और बीच की जगह ख़ाली थी।
जोगेन ने बाक़ी आठ गट्ठर उस दिन बाहर नहीं निकाले।
उसने वह एक गट्ठर वहीं किनारे पर छोड़ दिया और घर चला गया, और शाम को अपने साले को बुलाकर बाक़ी आठों गट्ठर उस पोखर से निकलवाकर अपने वाले पोखर में डलवा दिए, जहाँ पहले से जगह नहीं थी और जहाँ उन्हें ठूँसना पड़ा।
उन आठों को पूरे उन्नीस दिन लगे।
उनका रेशा वैसा ही निकला जैसा हर बरस निकलता है। ठीक-ठाक, थोड़ा भूरा, और दाम भी उसी हिसाब का मिला, क्योंकि तब तक पूरे इलाक़े का माल बाज़ार में आ चुका था। उस बरस जोगेन को हज़ारों का घाटा हुआ और उसका ज़िक्र उसने घर में भी नहीं किया।
जो एक गट्ठर उसने निकाला था, वह उसने बेचा नहीं। वह उसे घर भी नहीं ले गया।
उत्तरी सिरे वाले उस पोखर में उसके बाद किसी ने जाग नहीं दी और अब वह भर भी चुका है, क्योंकि जिस पोखर में हर बरसात काम न हो उसमें गाद बैठ जाती है। पानी अब भी साफ़ रहता है। गाँव के लोग उसमें से बर्तन नहीं धोते और मवेशी उसमें नहीं उतारते, और अगर पूछो तो कोई वजह नहीं बताता, बस यह कह देता है कि उधर जाने का काम ही क्या है।