उस कोल्ड स्टोर में पाँच चैंबर थे और उनमें से चार चलते थे। भीतर का तापमान माइनस दो रखा जाता था और बोरियाँ बीस फ़ुट ऊँची चिनी जाती थीं, दीवार से एक हाथ छोड़कर, ताकि हवा घूम सके। मज़दूर बीस-बीस मिनट के लिए भीतर जाते थे। इससे ज़्यादा रुकने पर उँगलियाँ काम करना बंद कर देती हैं और यह पहली चीज़ है जो जाती है।

लोटन नौ बरस से वहाँ था। वह अकेला रहता था। तीन नंबर चैंबर चार बरस से बंद था। उस पर ताला था।

उसकी वजह सबको मालूम थी और कोई उसका ज़िक्र नहीं करता था। चार बरस पहले एक आदमी उसमें रह गया था। रात में। दरवाज़ा बाहर से चढ़ गया था और सुबह तक किसी ने गिनती नहीं की थी।

उसके बाद मालिक रफ़ीक़ ने वह चैंबर बंद करवा दिया और उसमें माल रखना बंद कर दिया। मशीन उसमें भी चलती रही, क्योंकि एक चैंबर बंद करने से बाक़ी चारों का तापमान गड़बड़ाता है।

उस आदमी का नाम अब कोई नहीं लेता था। वह बरेली की तरफ़ का था और उस सीज़न में नया आया था। रात में वह अकेला भीतर रह गया था, और सुबह जब दरवाज़ा खुला तो वह दरवाज़े के पास ही मिला, बैठा हुआ। ठंड में आदमी लेटता नहीं, बैठ जाता है, और यही बात लोटन को नौ बरस से याद है, क्योंकि उसे यह उसी दिन बताया गया था जिस दिन वह काम पर आया था।

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लोटन ने पहली बार वह चीज़ जनवरी में देखी।

तीन नंबर के लोहे के दरवाज़े पर भाप जमती है, हर दरवाज़े पर जमती है, और वह बाहर की तरफ़ जमती है, क्योंकि ठंड भीतर होती है और नमी बाहर। उस दरवाज़े पर वह भीतर की तरफ़ जमी हुई थी।

यह उसने शीशे वाली छोटी खिड़की से देखा। बाहर की सतह सूखी थी और भीतर वाली पर सफ़ेद परत थी। उसने सुक्खू को बुलाकर दिखाया। सुक्खू ने कहा कि मशीन का सेटिंग बदला होगा और वह आगे बढ़ गया। फ़रवरी में लोटन ने दोबारा देखा और इस बार परत पर लकीरें थीं।

सीधी लकीरें, ऊपर से नीचे, जैसी तब बनती हैं जब कोई गीली सतह पर उँगली फेरे। उसने उस दिन किसी को नहीं बुलाया। वह देखता रहा। जिस दिन वह भीतर बंद हुआ, उस दिन वह अपनी मर्ज़ी से गया था।

दोपहर का वक़्त था और स्टोर में उस घंटे कोई नहीं रहता। उसने तीन नंबर का ताला खोला, जिसकी चाबी दफ़्तर के खूँटी पर टँगी रहती थी, और वह भीतर चला गया। चैंबर ख़ाली नहीं था। यह उसने उम्मीद नहीं की थी।

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बोरियाँ चार बरस से वहीं थीं, वैसी की वैसी, चिनी हुई, ऊपर तक। किसी ने उन्हें निकाला ही नहीं था। दरवाज़ा उसके पीछे बंद हो गया और उसकी आवाज़ भारी थी। ये दरवाज़े भीतर से नहीं खुलते। यह डिज़ाइन की ख़राबी नहीं है, यह जानबूझकर है, ताकि ठंड न निकले।

उसने बजाया। उसने चिल्लाया। कुछ नहीं हुआ। लोहा मोटा है और उसके पार आवाज़ नहीं जाती।

माइनस दो में कपड़े पहने आदमी के पास लगभग चालीस मिनट होते हैं, उसके बाद सोचना धीमा पड़ने लगता है। यह लोटन को मालूम था, क्योंकि यह उस काम में सबको मालूम होता है।

यह अंदाज़ा भी ऊपर वाला है। असल में यह इस पर टिकता है कि आदमी हिल रहा है या नहीं, उसने क्या पहना है, और भीतर हवा चल रही है या रुकी हुई है। चलती ठंडी हवा रुकी हुई ठंड से कहीं तेज़ काटती है, और तीन नंबर में पंखा चल रहा था, क्योंकि मशीन उसमें भी चलती रहती थी।

छत में हवा का एक डक्ट है, दो फ़ुट चौड़ा, जो हर चैंबर से बाहर जाता है। उस तक पहुँचने के लिए बीस फ़ुट बोरियाँ चढ़नी थीं। बोरियाँ चार बरस पुरानी थीं। उनके भीतर जो था वह गल चुका था और सूख चुका था और वे हाथ में फटती थीं।

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उसने चढ़ना शुरू किया।

बीस फ़ुट ऊँची चिनाई पर चढ़ना सीढ़ी चढ़ने जैसा नहीं होता। पैर बोरी के किनारे पर रखना पड़ता है, जहाँ भीतर का माल दबा हुआ हो, और हर बार यह अंदाज़ा लगाना पड़ता है कि यह बोरी वज़न लेगी या नहीं। चार बरस पुरानी बोरियों के बारे में यह अंदाज़ा लगाया ही नहीं जा सकता था। उसकी उँगलियाँ उस वक़्त तक काम कर रही थीं और यही एक चीज़ उसके हक़ में थी।

आधे रास्ते में उसका पैर धँसा और वह बाईं तरफ़ को झुक गया, और गिरने से बचने के लिए उसने हाथ दीवार और बोरियों के बीच वाली खाली जगह में डाल दिया। उसका हाथ किसी चीज़ से टकराया। वह नरम थी।

उसने उसे नहीं देखा। उसने हाथ खींचा और चढ़ता रहा। वह डक्ट तक पहुँचा और उसकी जाली एक तरफ़ से ढीली थी। उसने उसे दबाया और वह मुड़ गई। वह बाहर वाले शेड की छत पर निकला और वहाँ से नीचे कूदा।

उसने रफ़ीक़ को नहीं बताया कि वह भीतर क्यों गया था और रफ़ीक़ ने पूछा भी नहीं।

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अगले महीने तीन नंबर चैंबर में सीमेंट भरवा दिया गया। पूरा, फ़र्श से छत तक, बोरियों समेत। इसमें ग्यारह दिन लगे और इसका ख़र्च रफ़ीक़ ने अपनी जेब से दिया। किसी मज़दूर ने वजह नहीं पूछी और रफ़ीक़ ने किसी को वजह नहीं बताई।

उस दीवार पर अब भी दरवाज़े का लोहे का चौखटा लगा हुआ है, क्योंकि उसे निकालने में दीवार टूटती। भीतर सीमेंट है और शीशे वाली छोटी खिड़की पर काला पेंट कर दिया गया है।