भट्ठे की आग बुझती नहीं। सीज़न में वह चार महीने लगातार जलती है और उसे बुझाना घाटे का सौदा होता है। इसीलिए वहाँ रात की शिफ़्ट होती है और उसमें एक ही आदमी रहता है, जिसे फ़ायरमैन कहते हैं।
उसका काम यह देखना है कि आग किस ज़ोन में है और ऊपर से कोयला कब डालना है। भट्ठा गोल होता है और आग उसमें धीरे-धीरे घूमती रहती है, एक ज़ोन से दूसरे ज़ोन।
ऊपर चलने के लिए एक रास्ता बना होता है, ईंटों का, जिस पर छेद बने रहते हैं। उन्हीं छेदों से कोयला जाता है और उन्हीं से नीचे की आग दिखती है। नफ़ीस उस सीज़न में नया आया था।
भट्ठे पर काम करने वाले ज़्यादातर लोग परिवार समेत आते हैं और सीज़न भर वहीं रहते हैं। ईंट पाथने वाले अलग, ढोने वाले अलग, और आग वाले अलग। आग वाले सबसे कम होते हैं और उनकी मज़दूरी सबसे ज़्यादा होती है, इसलिए वह काम आसानी से नहीं मिलता।
वह अररिया की तरफ़ का था और उसे यह काम इसलिए मिला था कि उसका जीजा वहाँ मुंशी था। पहली रात उसे बताया गया कि ऊपर चलते वक़्त छेदों से बचकर चलना है और यह कि नीचे मत देखना, क्योंकि नीचे देखने पर चक्कर आता है।
बताने वाला वहाँ का सबसे पुराना फ़ायरमैन था, जो सत्रह सीज़न कर चुका था। उसने यह भी कहा कि रात में ऊपर किसी को देखो तो आवाज़ मत देना, पहले गिन लेना कि वह किस तरफ़ चल रहा है। नफ़ीस ने इसका मतलब नहीं पूछा और उस आदमी ने बताया भी नहीं।
यह सलाह अच्छी थी और उसने पहले हफ़्ते इसे माना। तीसरी रात उसने चिमनी के पास दूसरा आदमी देखा।
भट्ठे पर रात में और कोई नहीं होता। मज़दूरों की झोंपड़ियाँ चार सौ क़दम दूर हैं और वहाँ से भट्ठे तक कोई रात में नहीं आता, क्योंकि आने की ज़रूरत नहीं होती। वह आदमी चिमनी के दूसरी तरफ़ था और उसकी परछाईं धुएँ में हिल रही थी।
नफ़ीस ने आवाज़ दी। दो बार। जवाब नहीं आया। वह चिमनी के चक्कर लगाकर दूसरी तरफ़ गया और वहाँ कोई नहीं था। उसने सुबह यह जीजा को बताया और जीजा ने कहा कि धुआँ है, गर्मी है, और रात में नींद से आँख धोखा देती है।
यह सही था और नफ़ीस ने मान भी लिया। पाँचवीं रात उसने फिर देखा। इस बार वह आदमी चल रहा था, ऊपर वाले रास्ते पर, उसी तरफ़ जिधर आग थी। नफ़ीस उसके पीछे गया। यह उसने सोचकर नहीं किया। उसने बाद में यह कहा कि उस वक़्त उसे डर नहीं लगा और यही बात उसे बाद में डराती रही।
वह आदमी आग वाले ज़ोन के ऊपर पहुँचकर रुक गया।
उस जगह ईंटों का रास्ता सबसे गरम रहता है। नीचे बारह सौ डिग्री की आग होती है और ऊपर के छेदों से जो हवा निकलती है वह सीधी ऊपर जाती है। वह आदमी वहीं खड़ा था और छेद की तरफ़ देख रहा था।
नफ़ीस उससे दस क़दम पीछे रुक गया। तब उसने वह चीज़ देखी जो उसे सबसे ज़्यादा याद रही। उस आदमी की परछाईं नहीं थी। आग नीचे थी और उसकी रोशनी ऊपर आ रही थी। नफ़ीस की अपनी परछाईं उसके पीछे धुएँ पर पड़ रही थी और वह हिल रही थी।
उस आदमी के पीछे कुछ नहीं था। धुआँ साफ़ था। नफ़ीस ने वहीं से लौटने का फ़ैसला किया और वह मुड़ा। मुड़ते वक़्त उसका पैर छेद के किनारे पर पड़ा और ईंट खिसक गई। उसका दायाँ पैर घुटने तक भीतर चला गया।
उसने हाथ के बल अपने आप को ऊपर खींचा। इसमें उसे कितना वक़्त लगा, यह उसे नहीं मालूम। जो पता है वह यह है कि उसका जूता जल गया, पैर पर छाला पड़ा, और वह अपने बल पर नीचे उतरा।
सुबह उसे अस्पताल ले जाया गया और चौदह दिन में वह ठीक हो गया।
पैर पर जो निशान पड़ा वह गया नहीं। वह टखने के ऊपर से शुरू होकर पिंडली तक जाता है और उसका रंग बाक़ी चमड़ी से हल्का है। जाड़े में वहाँ खिंचाव होता है और उसे तेल लगाना पड़ता है, और यह उसे हर बरस याद दिला देता है।
जीजा ने उसे समझाया कि वह यह काम छोड़ दे और वह मान गया। छोड़ने से पहले उसने एक बात पूछी, कि इस भट्ठे पर पहले कभी कोई गिरा है। जीजा ने कहा कि नहीं। फिर वह रुका।
फिर उसने कहा कि ग्यारह बरस पहले एक फ़ायरमैन रात में लापता हो गया था और उसका कुछ नहीं मिला था, और उस बात को लापता होना ही लिखा गया था, क्योंकि गिरने का कोई सुबूत नहीं था। नफ़ीस ने इसके बाद कोई सवाल नहीं पूछा।
वह भट्ठा अब भी चलता है और उसका रास्ता उसी तरह बना हुआ है। उस ज़ोन के ऊपर वाली दो ईंटें हर सीज़न में बदली जाती हैं, क्योंकि वे सबसे पहले चटकती हैं, और यह वहाँ के हर आदमी को मालूम है।