राजीव को पहली बार वह एहसास खेत से लौटते वक़्त हुआ था। शाम गहरा रही थी और उसके पीछे कोई चल रहा था, इतने पास कि पैरों की आवाज़ अपनी आवाज़ से आधा क़दम पीछे सुनाई देती। उसने मुड़कर देखा। कोई नहीं था। उस दिन उसने इसे थकान समझकर छोड़ दिया। चौदह साल का लड़का था, दिनभर माँ के साथ काम और रात को पढ़ाई; थकना कोई बड़ी बात नहीं थी। लेकिन अगली शाम भी वही हुआ। और उसके अगली शाम भी।

आवाज़ वाली बात एक हफ़्ते चली। फिर वह ख़त्म हो गई और उसकी जगह दूसरी चीज़ आ गई, जो देखी जा सकती थी।

उस पगडंडी की एक ख़ासियत है। वह पूरब से पश्चिम को जाती है, और शाम को लौटते हुए सूरज पीठ पर रहता है। इसलिए परछाईं हमेशा आगे पड़ती है, लंबी, और आदमी अपने ही सिर पर पैर रखता हुआ चलता है। गाँव के हर बच्चे ने कभी न कभी उस पर कूदने का खेल खेला है।

उस शाम परछाईं आगे नहीं थी।

राजीव रुका और उसने ठीक से देखा। सूरज वहीं था जहाँ होना चाहिए। खेत की मेड़ की परछाईं आगे पड़ रही थी, बबूल की भी, और सामने चलती हुई एक बकरी की भी। उसकी अपनी पीछे थी, उतनी ही लंबी, दूसरी तरफ़ को।

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उसने किसी से नहीं कहा। चौदह साल का लड़का, जो सवाल पूछने पर मार खा चुका हो, वह पहले जाँचता है। और जाँचने के उसके पास तीन तरीक़े थे।

पहला दीये वाला था। वह रात में पढ़ता था और दीया हमेशा बाईं तरफ़ रखता था, इसलिए परछाईं दाईं दीवार पर पड़ती थी। उसने दीया उठाकर दूसरी तरफ़ रखा। परछाईं दूसरी तरफ़ चली गई, पर तुरंत नहीं। उसने यह तीन रात करके देखा और तीनों बार वह देर से गई।

दूसरा दोपहर वाला था। ठीक बारह बजे परछाईं पैरों के नीचे एक छोटा-सा धब्बा भर रह जाती है। आँगन में खड़े होकर उसने देखा। धब्बा उसके पैरों के नीचे नहीं था। वह एक बालिश्त पीछे था।

तीसरा उसने सोच-समझकर चुना और वह ख़तरनाक था। पूनम की रात खलिहान पूरा खुला और सफ़ेद पड़ जाता है और वहाँ चाँद की परछाईं दिन जैसी साफ़ बनती है। राजीव रात के क़रीब ग्यारह बजे घर से निकला। रास्ते में नाला पड़ता है और उस साल उसमें पानी था, और उधर कुत्ते रहते हैं जो अकेले आदमी पर भौंकते नहीं, आते हैं।

खलिहान पहुँचकर उसने वही किया जो वह करने आया था। वह बीच में जाकर खड़ा हो गया और हिला नहीं। यह जानने के लिए कि वह चीज़ उसके चलने से चलती है या अपने आप। वह इक्यावन तक गिना, फिर गिनना छोड़ दिया, फिर भी खड़ा रहा।

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परछाईं आई। चलकर नहीं आई। वह पहले नहीं थी और फिर थी, और उसका मुँह गाँव की तरफ़ था, यानी उस तरफ़ जिधर राजीव को लौटना था। राजीव चाँद की तरफ़ मुँह करके भागा, उलटी दिशा में, और लंबा घूमकर घर पहुँचा। उस रात के बाद उसने खलिहान पर पैर नहीं रखा।

अगली सुबह उसने अपनी माँ को बता दिया। यह उसकी सबसे बड़ी ग़लती थी और यह भी उसे बहुत बाद में समझ आया। माँ ने पड़ोस में बताया, पड़ोस ने आगे बताया, और तीसरे दिन बग़ल के गाँव से एक आदमी बुलाया गया जो ऐसे मामले देखता था।

वह तीन दिन चला। उसे धुएँ के सामने बिठाया गया, सुबह से दोपहर तक, आँखें खुली रखकर। पानी दिन में एक बार मिला। तीसरे दिन उस आदमी ने झाड़ू की सींकों से उसकी पीठ पर मारा, गिनकर नहीं, जब तक वह ख़ुद न थक जाए। माँ बाहर बैठी रही। वह डरी हुई थी और उसके पास इससे बेहतर कोई चीज़ नहीं थी।

इसमें नौ सौ रुपये गए, जो उस घर के लिए ग्यारह दिन की मज़दूरी थी। परछाईं वैसी की वैसी रही। इसके बाद माँ ने दोबारा किसी को नहीं बुलाया। भरोसा उठ गया हो, ऐसा नहीं था। पैसे नहीं थे।

राजीव ने उसके बाद यह बात किसी के आगे नहीं उठाई और चीज़ों को दूसरे तरीक़े से सँभालना सीख लिया। वह शाम को खेत से जल्दी लौटने लगा, जब परछाईं छोटी रहती है। दोपहर में वह छाँव में रहता। और रात में दीया जलाना उसने बंद कर दिया, क्योंकि दीये का मतलब दीवार पर एक परछाईं होता है जिसे वह देखना नहीं चाहता था।

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आठवीं की परीक्षा उसी जाड़े में थी। बिना दीये के रात की पढ़ाई नहीं होती और दिन उसका खेत में जाता था। वह बैठा तो, पर तीन विषय नहीं निकले। दोबारा बैठने का मौक़ा अगले साल था और अगले साल तक वह पूरा दिन काम करने लगा था, इसलिए वह दोबारा नहीं बैठा। उसकी पढ़ाई वहीं ख़त्म हुई।

यह कार्तिक में शुरू हुआ था और जेठ में बंद हो गया। किसी पूजा से नहीं, किसी दवा से नहीं। एक शाम वह लौट रहा था और परछाईं आगे थी, लंबी, ठीक वैसी जैसी होनी चाहिए, और उसके बाद वह हमेशा आगे ही रही।

कई महीनों बाद, एक शाम राजीव फिर उसी रास्ते से लौट रहा था। आदत के मारे उसने आधे रास्ते में मुड़कर देखा। पीछे सिर्फ़ खाली पगडंडी थी और ढलता हुआ सूरज। वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर आगे बढ़ गया। पर उस दिन के बाद भी, उम्र भर, वह अंधेरे में पीछे मुड़कर देखना कभी नहीं भूला।