ब्लेड ने बर्फ़ काटी और उसके पीछे सड़क काली निकल आई। टेकचंद ने डोज़र रोक दिया और शीशा नीचे किया। बाहर हवा सीधी आँख में लगती थी। तेरह हज़ार फ़ुट पर मई की शाम भी काटती है और साँस पूरी नहीं आती।
सामने बारह किलोमीटर सड़क खुली पड़ी थी। बर्फ़ कटाई ग्यारह अप्रैल को शुरू हुई थी, बैसाखी के दो दिन पहले, जैसे हर साल होती है।
काम का तरीक़ा बरसों से एक ही है। एक पार्टी मनाली की तरफ़ से ऊपर चढ़ती है, दूसरी कोकसर की तरफ़ से, और दोनों दर्रे पर आकर मिलती हैं। जिस दिन दोनों मिल जाएँ उस दिन सड़क खुल गई मानी जाती है।
टेकचंद ग्यारह मौसम से मनाली वाली पार्टी में था।
उसका काम डोज़र चलाना था और डोज़र चलाने वाले को यह भी सीखना पड़ता है कि बीस फ़ुट बर्फ़ के नीचे सड़क कहाँ है। इसके लिए किलोमीटर के पत्थर काम नहीं आते, क्योंकि वे भी बर्फ़ में हैं। पहाड़ की शक्ल से पता चलता है। ढलान के मोड़ से, और बिजली के खंभों की क़तार से, जो बर्फ़ के ऊपर सिर निकाले खड़े रहते हैं।
दोरजे आगे-आगे चलता था और झंडी से इशारा करता था। वह कोकसर के पास के गाँव का था और सत्ताईस बरस का था, पर इस सड़क को अपने बाप के साथ बचपन से देखता आया था।
अटल सुरंग बनने के बाद ऊपर वाली इस सड़क पर आदमी कम हो गए हैं। गाड़ियाँ नीचे से निकल जाती हैं और ऊपर सिर्फ़ वही आते हैं जिन्हें रोहतांग तक ही आना है। इसीलिए मई के पहले हफ़्ते में उस ऊँचाई पर उनके अलावा कोई नहीं होता।
उस दिन वे किलोमीटर सत्रह तक पहुँचे थे।
आख़िरी दीवार अठारह फ़ुट ऊँची थी और टेकचंद ने उसे तीन बार में काटा। तीसरी बार में ब्लेड हल्का हो गया और डोज़र आगे को झटका खा गया, जैसा तब होता है जब दीवार के उस पार कुछ न हो।
उसने रोककर देखा।
सड़क खुली थी। सिर्फ़ खुली नहीं थी, साफ़ थी। न बर्फ़, न पानी, न ऊपर से गिरा हुआ मलबा। तारकोल दिख रहा था।
और वह अकेली बात नहीं थी।
बर्फ़ काटो तो वह कहीं जाती है। डोज़र उसे किनारे धकेलता है और सड़क के दोनों तरफ़ दीवारें बन जाती हैं, बीस-बीस फ़ुट की, जो जून तक खड़ी रहती हैं। हर कटी हुई सड़क के साथ ये दीवारें होती हैं।
उन बारह किलोमीटर के दोनों तरफ़ कोई दीवार नहीं थी। बर्फ़ कहीं नहीं थी। दोरजे झंडी लेकर वहीं खड़ा रहा और आगे नहीं बढ़ा।
कल्याण साहब जीप से आए। वे उस सेक्शन के जेई थे, अठावन बरस के, और उन्हें रिटायर होने में सात महीने बचे थे। उन्होंने खड़े होकर आगे देखा, फिर वायरलेस पर कोकसर वाली पार्टी से पूछा। उधर से फुंचोक ने बताया कि वे अभी किलोमीटर उनतालीस पर हैं और आज दो सौ मीटर काटा है।
उनतालीस और सत्रह के बीच अट्ठाईस किलोमीटर बर्फ़ थी, कागज़ पर। 'तो यह किसने काटा?' कल्याण साहब ने पूछा।
किसी ने जवाब नहीं दिया, क्योंकि इस सवाल का कोई जवाब था ही नहीं। उस ऊँचाई पर मशीन एक ही रास्ते से चढ़ती है और वह रास्ता उनके पीछे था। दोरजे ने सिर्फ़ इतना कहा कि आज रात यहीं रुक जाते हैं और सुबह देखेंगे।
रुका नहीं जा सकता था।
कोकसर में एक औरत थी जिसका बच्चा उलटा था और जिसे कुल्लू पहुँचाना था। हेलिकॉप्टर तीन दिन से मौसम की वजह से नहीं उड़ा था। सुरंग उस हफ़्ते मरम्मत के लिए बंद थी और यही एक रास्ता बचा था। यह बात कल्याण साहब को सुबह ही वायरलेस पर मिल चुकी थी और इसीलिए वे ऊपर आए थे।
'चलाओ,' उन्होंने कहा। टेकचंद ने डोज़र में गियर डाला। दोरजे जीप में नहीं बैठा। वह पैदल पीछे-पीछे आया, पूरे रास्ते, और झंडी उसने हाथ से नीचे नहीं की। बारह किलोमीटर में डोज़र को कुछ भी नहीं काटना पड़ा। टेकचंद बीच में एक बार उतरा, यह देखने कि सड़क कहीं से धँसी तो नहीं है, क्योंकि नीचे से खोखली सड़क ऊपर से ठीक दिखती है।
सड़क ठीक थी। उस पर बजरी बिछी हुई थी।
बजरी वे फिसलन रोकने के लिए डालते हैं। इस साल उन्होंने अभी नहीं डाली थी, क्योंकि डालने का काम कटाई पूरी होने के बाद होता है। और जो बजरी वहाँ पड़ी थी वह मोटी थी, नदी की, चंद्रा के पाट से उठाई हुई। ऐसी बजरी विभाग ने ग्यारह साल पहले डालनी बंद कर दी थी।
उसने मुट्ठी में उठाई और जेब में डाल ली, और वापस चढ़ गया। अंधेरा उनतीस पर हुआ। वहाँ बर्फ़ फिर शुरू हो गई और टेकचंद ने हेडलाइट में पहला कट लगाया।
जो बर्फ़ ब्लेड के सामने गिरी वह नई नहीं थी। नई बर्फ़ भुरभुरी होती है और ब्लेड से बिखर जाती है। यह दबी हुई थी, सख़्त, और भूरे रंग की, और उसके बीच में एक पतली परत बजरी की थी।
मतलब यह कि उस जगह की सड़क पहले भी साफ़ की गई थी, और उसके बाद उस पर बर्फ़ पड़ी थी, और वह बहुत पहले की बात थी। टेकचंद ने पीछे शीशे में नहीं देखा।
क्यों नहीं देखा, यह वह ख़ुद भी बाद में ठीक से नहीं बता सका। उसने बस काटना जारी रखा और रात के दो बजे तक चार सौ मीटर और निकाल लिया।
अगले दिन दोपहर तक कोकसर वाली पार्टी उनसे आ मिली। औरत को उसी शाम गाड़ी से नीचे उतारा गया और कुल्लू में उसका ऑपरेशन हुआ। बच्चा बच गया। रिपोर्ट में उस दिन का काम बारह किलोमीटर लिखा गया और उसके आगे कुछ नहीं लिखा गया।
जून के पहले हफ़्ते में किलोमीटर के पत्थरों पर रंग चढ़ता है। पीले पर काला नंबर, हर मौसम में नया। उस साल पार्टी ने एक से सोलह तक के पत्थर पोते और उनतीस से आगे के पोते। बीच के बारह किलोमीटर के पत्थर उसी हालत में छोड़ दिए गए, और किसी ने इसका आदेश नहीं दिया था, और अगले बरस भी वही हुआ।