वह जंगल पहले ऐसा नहीं था। बड़े-बूढ़े बताते थे कि उनके बचपन में वहाँ लकड़ी काटी जाती थी और बच्चे भीतर तक चले जाते थे। फिर कुछ दशक पहले कुछ बदल गया। पहले लोगों ने जाना कम किया। फिर बंद कर दिया। अब गाँव में उसका नाम रूहों का जंगल है, और यह नाम किसी ने तय नहीं किया। बस चल पड़ा।
जंगल की कोई हद खींची हुई नहीं है। कोई दीवार नहीं, कोई मेड़ नहीं। हद लोगों के भीतर है और सब जानते हैं कि कहाँ तक जाना है और कहाँ से नहीं। जानवर यह नहीं जानते।
रामकली के पास एक भैंस थी और वही उसकी कमाई थी। सुबह-शाम का दूध, और साल में एक पड़वा। भैंस चरने के लिए उसी तरफ़ वाली परती में जाती थी, क्योंकि गाँव की बाक़ी ज़मीन पर धान लगा था।
सावन में उस बरस पानी लगातार पड़ा। परती में घास कमर तक हो गई और भैंस उसी में घुसी रहती।
एक दोपहर वह लौटी नहीं।
रामकली शाम तक इंतज़ार करती रही, फिर परती के किनारे तक गई और आवाज़ दी। जवाब में कुछ नहीं आया। किनारे पर घास दबी हुई थी और दबाव की लकीर भीतर की तरफ़ जाती थी।
भैंस छोड़ी नहीं जा सकती। यह कोई बहादुरी की बात नहीं है, हिसाब की बात है। भैंस के बिना उस घर में कुछ नहीं बचता।
जाने से पहले उसने किसी से सलाह नहीं ली। लेती तो मना कर दिया जाता, और मना करने वाला भैंस के बदले कुछ देता नहीं। पड़ोस की एक औरत ने उसे किनारे की तरफ़ जाते देखा और आवाज़ भी दी। रामकली ने सुन लिया। वह रुकी नहीं। यह बात उस औरत ने बाद में कई बार सुनाई।
वह अगली सुबह भीतर गई, उजाले में, और बारिश उस वक़्त भी हो रही थी।
हद कहाँ है, यह उसे भी मालूम था। एक जगह परती ख़त्म होती है और झाड़ शुरू होते हैं। वहाँ देखने में कुछ भी अलग नहीं है। रामकली उस जगह पर एक पल रुकी, फिर आगे बढ़ गई। आगे बढ़ते ही उसे यह लगा कि लौटने का सवाल अब हर क़दम पर उठेगा।
पहली बात जो उसे लगी वह यह थी कि भीतर कुछ भी अजीब नहीं है। साल के पेड़ थे, गीले पत्ते थे, और पानी टपक रहा था। जो डर उसने घर से लेकर चला था, वह भीतर घुसते ही थोड़ा हल्का हो गया।
दूसरी बात उसे बिना कोशिश के दिखी, क्योंकि घास और चारा काटने वाली औरत पेड़ देखना जानती है। वहाँ के सारे पेड़ एक ही मोटाई के थे।
एक भी पुराना पेड़ नहीं था। कोई मोटा तना नहीं, कोई ऐसा पेड़ नहीं जिसके नीचे बैठा जा सके। सब बराबर के, सब एक ही उम्र के, जैसे किसी ने एक ही साल में सब लगाए हों।
तीसरी बात ज़मीन की थी और वह सबसे देर में समझ आई।
बारिश का पानी ढलान पर बहता है और नीचे जाकर जमा होता है। यहाँ पानी बह नहीं रहा था। वह जगह-जगह रुका हुआ था, और रुका हुआ पानी सीधी लकीरों में था।
रामकली एक लकीर के साथ-साथ चली। वह लकीर सीधी जाती रही, फिर एक जगह मुड़ी, समकोण पर, और आगे फिर सीधी हो गई।
पानी वहीं ठहरता है जहाँ नीचे कुछ सख़्त हो।
लकीरों के बीच में चौकोर टुकड़े थे जहाँ पानी नहीं ठहरा था। वहाँ ज़मीन थोड़ी ऊँची थी और उस पर घास पतली थी। उसने एक जगह पैर से मिट्टी हटाई। नीचे ईंट थी। बैठी हुई, कतार में, और उन पर चूने का निशान अब भी था।
वह गली थी जिस पर वह चल रही थी। और वे चौकोर टुकड़े घरों की कुर्सियाँ थीं।
भैंस उसे उन्हीं में से एक पर मिली, खड़ी हुई, भीगती हुई, बिल्कुल ठीक। उसे कुछ नहीं हुआ था। वह वहाँ इसलिए खड़ी थी कि वहाँ ज़मीन ऊँची थी और कीचड़ नहीं था।
भैंस को घुमाने में उसे काफ़ी वक़्त लगा, क्योंकि भैंस जहाँ जमी हो वहाँ से हिलती नहीं। इसी बीच उसकी नज़र थोड़ी दूर एक और चीज़ पर पड़ी। वहाँ पानी ठहरा नहीं था और बह भी नहीं रहा था। वह गोल घूम रहा था, धीरे-धीरे, एक ही जगह पर।
वह उधर नहीं गई। भैंस मिल चुकी थी और उसने वही किया जो करना था।
बाहर आकर उसने यह सब बताया। पहले घर पर, फिर पड़ोस में, फिर चौपाल पर। लोग सुनते रहे और किसी ने उसे झूठा नहीं कहा।
चौपाल पर सबसे बूढ़ा आदमी भगवानदास था। उसने पूरी बात सुनी और फिर एक शब्द कहा। वह एक नाम था। किसी जगह का नाम। दो हिस्सों वाला। कहकर वह उठ गया और घर चला गया।
उसके बाद कोई देखने नहीं गया। उस बरस भी नहीं, अगले बरस भी नहीं। बात चौपाल पर कई बार उठी और हर बार यही तय हुआ कि जाकर देखना चाहिए। हर बार यह तय होकर रह गया। रामकली ख़ुद भी दोबारा नहीं गई, और उससे यह किसी ने नहीं पूछा कि क्यों नहीं गई।
रामकली ने वह नाम उस दिन के बाद किसी के मुँह से नहीं सुना। भगवानदास से भी नहीं। गाँव में उस जगह का नाम आज भी वही है जो चला आ रहा है, यानी रूहों का जंगल, और यह नाम भी किसी ने तय नहीं किया था। गाँव के बच्चे उस जंगल का यही नाम सीखते हैं और उन्हें कोई दूसरा नाम बताता भी नहीं।