सियाराम की पहली अकेली रात अगस्त में पड़ी, और अगस्त में उधर लगातार बारिश होती है।
प्रकाशस्तंभ का काम बाहर से जितना सीधा दिखता है, भीतर से उतना ही एक ही चीज़ पर टिका होता है। बत्ती जलती रहे, यह बड़ी बात नहीं है। बत्ती घूमती रहे, यह बड़ी बात है।
हर प्रकाशस्तंभ की अपनी चाल होती है। किसी की बत्ती हर पाँच सेकंड में एक बार आती है, किसी की हर दस में दो बार। समुद्र में जहाज़ इसी चाल से पहचानता है कि वह कौन सी जगह है। रोशनी से नहीं। चाल से।
उस वाले की चाल ग्यारह सेकंड की थी। एक चमक, फिर ग्यारह सेकंड का अँधेरा।
घुमाने का काम एक पुराने वज़न से होता था। एक भारी वज़न बीच वाली नली में लटका रहता है और धीरे-धीरे नीचे उतरता है, और उतरते हुए वह ऊपर के गियर को घुमाता है। नीचे पहुँच जाए तो उसे हाथ से ऊपर चढ़ाना पड़ता है। हर तीन घंटे में एक बार।
सुमेर ने उसे यही सिखाया था और एक बात और सिखाई थी।
उसने कहा था कि भीतर बैठे आदमी को अपनी बत्ती की चाल कभी नहीं दिखती। ऊपर वाला कमरा भीतर से रोशन रहता है और शीशा घूमता है, तो वहाँ अँधेरा-उजाला कुछ अलग नहीं होता। बाहर से जो दिखता है, वह भीतर से नहीं दिखता।
इसलिए भीतर बैठा आदमी अपनी बत्ती को सुनता है।
गियर की एक आवाज़ होती है। घर्र, और ग्यारह सेकंड बाद फिर घर्र। सियाराम ने पहले तीन महीने सुमेर के साथ रहकर वह आवाज़ याद कर ली थी, जैसे लोग अपने घर की घड़ी की आवाज़ याद कर लेते हैं।
उस रात नौ बजे तक सब ठीक था।
बारिश तेज़ थी और हवा दक्षिण की थी। शाम को मछली वाली चार नावें बाहर गई थीं। यह उसने ख़ुद देखा था।
सवा नौ पर आवाज़ बदल गई।
बदलाव बहुत छोटा था। घर्र वैसी ही थी। उसके साथ एक और चीज़ जुड़ गई थी, धीमी, और वह गियर से नहीं आ रही थी। वह नीचे से आती थी।
सियाराम ने घड़ी देखी और गिनना शुरू किया।
वह नीचे वाली आवाज़ भी ग्यारह सेकंड पर थी।
यहाँ रुककर सोचिए कि उस आदमी के पास उस वक़्त क्या था। एक बंद कमरा, एक घूमता शीशा, नीचे साठ फुट की एक ख़ाली नली, और यह जानकारी कि वह ग्यारह सेकंड किसी और चीज़ के भी हैं।
जो सबसे पहले उसके दिमाग़ में आया, वह डर नहीं था। वह यह था कि अगर गियर में कुछ है तो चाल बिगड़ सकती है, और बाहर चार नावें हैं।
चाल जाँचने का एक ही तरीक़ा था। बाहर निकलकर गैलरी में जाना और नीचे पानी पर देखना कि चमक का फ़ासला कितना है।
गैलरी लोहे की है, चार फुट चौड़ी, और उस पर बरसात में खड़ा होना अच्छी बात नहीं मानी जाती।
वह निकला।
बाहर हवा उसे दीवार से चिपकाए रखती थी और यही उस रात की एक अच्छी बात थी। उसने रेलिंग पकड़ी और नीचे देखा। पानी पर चमक आई। उसने गिना। ग्यारह।
चाल ठीक थी।
वह भीतर आया, कपड़े निचोड़े, और बैठ गया। आवाज़ अब भी दो थी।
बारह बजे वज़न नीचे पहुँचा और उसने उसे चढ़ाया। चढ़ाते वक़्त नीचे वाली आवाज़ रुक गई और फिर शुरू हो गई। यह उसने नोट किया।
दो बजकर दस मिनट पर उसने दोबारा जाँचा। इस बार वह नीचे तक उतरा और दरवाज़ा खोलकर बाहर मैदान में गया, ताकि पूरा स्तंभ दिख जाए।
चाल ठीक थी।
लौटते हुए उसने नली में टॉर्च मारी। नीचे कुछ नहीं था। रस्सी थी, वज़न था, और दीवार थी।
तीसरी बार वह चार बजे बाहर गया, और तीसरी बार वह गैलरी में गया, क्योंकि नीचे उतरने में सात मिनट लगते हैं और उन सात मिनटों में कमरा ख़ाली रहता है।
उसने रेलिंग पकड़ी।
रेलिंग पर उसके हाथ के बगल में एक और हाथ था।
उसने उसे देखा नहीं। उसे यह हाथ छूने से मालूम हुआ, अपनी छँगुली के पास, और उसने अपना हाथ हटाया नहीं, क्योंकि हवा उस वक़्त पीछे से आ रही थी।
वह वहाँ कितनी देर खड़ा रहा, यह उसे याद नहीं। उसने नीचे देखा और गिना और चाल ठीक थी। फिर वह भीतर आया और दरवाज़ा बंद कर लिया।
बाक़ी रात उसने कुर्सी दरवाज़े के सामने रखकर काटी।
सुबह छह बजे बत्ती बुझती है।
आठ बजे सुमेर आया और दोनों ने मिलकर नली खोली। वज़न की रस्सी अपनी गरारी से उतर आई थी और उतरने की वजह से वज़न सीधा न लटककर थोड़ा तिरछा हो गया था। तिरछा वज़न हर चक्कर पर दीवार से छू जाता है।
चक्कर ग्यारह सेकंड का है।
सुमेर ने रस्सी वापस बैठाई और उसमें आधा घंटा लगा। उसने कहा कि यह पहले भी हुआ है और आगे भी होगा।
वह पूरी बात यहीं ख़त्म हो जाती है और सियाराम ने कभी नहीं कहा कि नहीं होती।
चारों नावें उस रात लौट आई थीं। उसने अगली सुबह घाट पर जाकर गिना।
वह उसके बाद ग्यारह बरस उसी प्रकाशस्तंभ पर रहा। इन ग्यारह बरसों में बत्ती एक रात भी नहीं रुकी, जो अच्छा रिकॉर्ड है और काग़ज़ों में दर्ज है।
इन ग्यारह बरसों में वह गैलरी में एक बार भी नहीं गया।
चाल वह नीचे से जाँचता था, मैदान से, दो सौ क़दम चलकर। इसमें सात मिनट लगते थे और सात मिनट कमरा ख़ाली रहता था। यह नियम के हिसाब से ठीक नहीं है और किसी ने कभी इस पर सवाल नहीं किया, क्योंकि रिकॉर्ड अच्छा था।
प्रकाशस्तंभ पिछले बरस स्वचालित कर दिया गया। अब वहाँ कोई नहीं रहता। दरवाज़े पर ताला है और बत्ती अपने आप जलती है, अपने आप घूमती है, और चाल अब भी वही ग्यारह सेकंड है।