प्रकाशस्तंभ की ऊपरी मंज़िल पर लोहे का दरवाज़ा अब भी बंद था। पुर्तगाली मिस्त्रियों ने उसे डेढ़ सौ साल पहले जड़ा था, और जंग ने उसे दीवार से एक कर दिया था। शाम को जब हवा दक्षिण से चलती, उस दरवाज़े के पीछे से एक आवाज़ आती। धीमी, रुक-रुक कर, किसी पुराने जहाज़ की घंटी जैसी। मछुआरे उस तरफ़ जाल नहीं डालते थे। कहते थे कि सदियों पहले यहाँ एक जहाज़ डूबा था, और उसका एक मल्लाह अब तक किनारे नहीं लगा।
रुद्र ने वह आवाज़ पहली बार जनवरी में सुनी और उसे वह घंटी ही लगी।
वह इतिहास पढ़ाता था और पुरानी इमारतें उसका शौक़ थीं, जिसका मतलब यह है कि वह उन्हें देखने जाता था और उनके बारे में पढ़ता था, और इससे ज़्यादा कुछ नहीं। इस बार वह इसलिए गया कि आवाज़ की एक वजह होनी चाहिए और उसे कोई वजह नहीं सूझ रही थी।
दीनानाथ उसके साथ गया, क्योंकि उसके पास कैमरा था और वह हर उस जगह जाता था जहाँ कोई उसे ले जाए।
वे शाम को गए, अँधेरा होने से पहले।
प्रकाशस्तंभ के नीचे के दो माले खुले हैं और उनमें कुछ नहीं है। सीढ़ी पत्थर की है और दीवार से निकली हुई है, बिना जँगले के, और ऊपर जाते हुए बाईं तरफ़ खाली रहता है।
ऊपरी मंज़िल का लोहे का दरवाज़ा वहीं था जहाँ डेढ़ सौ बरस से है।
रुद्र ने उसे धकेला और उसे धकेलने से कुछ नहीं हुआ। जंग ने चौखट और पल्ले को एक कर दिया था। ऐसा दरवाज़ा खुलता नहीं, काटना पड़ता है।
दीनानाथ ने ऊपर की तरफ़ इशारा किया।
दरवाज़े के ऊपर, आदमी की पहुँच से थोड़ा ऊपर, हवा जाने के लिए एक झिरी बनी थी। लोहे की पत्तियों वाली, तिरछी, जैसी पुरानी इमारतों में होती है। उसकी दो पत्तियाँ टूट चुकी थीं।
उसी शाम हवा दक्षिण से चली और आवाज़ आ गई।
अब वह घंटी नहीं लग रही थी। पास से वह वही थी जो होती है, यानी धातु पर धातु।
भीतर कोहरे वाली घंटी थी। यह रुद्र को बाद में समझ आया और यह कोई रहस्य नहीं है। पुराने प्रकाशस्तंभों पर एक बड़ी घंटी लगी होती थी, जो कोहरे में बजाई जाती थी, जब रोशनी किसी काम की नहीं रहती। बिजली आने के बाद वे घंटियाँ हटाई नहीं गईं। उन्हें वहीं छोड़ दिया गया, क्योंकि उन्हें उतारना भारी काम है।
दक्षिण की हवा उस झिरी से सीधी भीतर जाती है और घंटी का लटकन हिल जाता है। पूरी नहीं बजती। बस छू जाती है।
यह जान लेने के बाद वे लौट सकते थे और रुद्र लौटना भी चाहता था।
दीनानाथ को भीतर की तस्वीर चाहिए थी।
झिरी तक पहुँचने का एक ही रास्ता था। दरवाज़े के बाहर जो पट्टी है, वह डेढ़ हाथ चौड़ी है और चालीस फुट ऊपर है, और उसके आगे कुछ नहीं है। दिन में उस पर खड़ा हुआ जा सकता है। उस वक़्त अँधेरा हो चुका था और हवा दक्षिण से थी।
दीनानाथ ने कहा कि वह चला जाएगा और रुद्र टॉर्च भीतर से पकड़े।
रुद्र ने मना किया। फिर उसने हाँ कर दी, और यह हाँ उसने इसलिए की कि दीनानाथ वैसे भी चला जाता।
तस्वीर लेने में उन्हें आठ मिनट लगे। इन आठ मिनटों में रुद्र दरवाज़े से सटकर खड़ा रहा और उसने टॉर्च झिरी में डाले रखी और नीचे नहीं देखा।
उन आठ मिनटों में एक काम और हुआ, जिस पर उस वक़्त किसी का ध्यान नहीं गया। कैमरा टिकाने के लिए दीनानाथ को झिरी का किनारा चाहिए था और वहाँ लोहे की दो टूटी पत्तियाँ लटक रही थीं। उसने उन्हें ऊपर की तरफ़ दबाकर बैठा दिया और उनके नीचे एक पत्थर का टुकड़ा फँसा दिया, ताकि वे फिर न झूलें।
झिरी से जो दिखा, वह घंटी थी।
और घंटी के नीचे, फ़र्श पर, चीज़ें बिखरी हुई थीं।
सिक्के। बहुत सारे। पुराने और नए, दोनों। एक कंघी। काँच की चूड़ियों के टुकड़े। कपड़े की एक गाँठ। बटन। एक छोटा-सा पीतल का ताला, बिना चाबी के।
वे फेंकी हुई नहीं थीं। वे झिरी के ठीक नीचे जमा थीं, ढेर की शक्ल में, जैसा तब बनता है जब चीज़ें एक ही जगह से एक-एक करके गिराई जाएँ।
डेढ़ सौ बरस से गिराई जाएँ।
रुद्र ने वहीं खड़े-खड़े यह हिसाब लगाया कि उस पट्टी तक पहुँचने के लिए क्या करना पड़ता है, और यह भी कि जो लोग वहाँ तक आए होंगे वे रात में आए होंगे, अकेले, क्योंकि दिन में गाँव देखता है।
जिस गाँव के मछुआरे उस तरफ़ जाल नहीं डालते, उसी गाँव के लोग डेढ़ सौ बरस से वहाँ चढ़ते रहे हैं।
नीचे उतरते हुए दीनानाथ ने झिरी के बग़ल वाली दीवार दिखाई। पत्थर पर खुरचकर एक नाम लिखा था, और उसके नीचे वही नाम फिर से, दूसरी लिखावट में, और उसके नीचे फिर।
नाम एक ही था और लिखावटें अलग थीं। कुछ गहरी खुदी हुई थीं और कुछ ऐसी कि उँगली फेरने पर ही पता चलतीं। सबसे ऊपर वाली सबसे पुरानी लगती थी, क्योंकि उसके अक्षरों के किनारे घिस चुके थे, और समुद्र की हवा पत्थर को उसी तरह घिसती है जैसे वह लोहे को खाती है।
वे उसे गिन नहीं पाए। रोशनी कम थी और नीचे उतरना था।
गाँव में उन्होंने वह नाम पूछा। जिनसे पूछा उन्होंने कहा कि सुना हुआ है। किसका है, यह किसी के मुँह से नहीं निकला।
कुछ हफ़्तों बाद दीनानाथ की एक तस्वीर शहर के अख़बार में छपी। खाली कमरा, बिखरे नक्शे, और खिड़की से आती हुई सुबह की रोशनी। नीचे कैप्शन में सिर्फ़ एक नाम था, जो उस रात उन्होंने पहली बार सुना था। रुद्र ने अख़बार मोड़कर रख दिया और बाहर समुद्र की तरफ़ देखा। मछुआरे उस दिन पहली बार प्रकाशस्तंभ के पास वाले पानी में जाल डाल रहे थे। किसी ने उन्हें कहा नहीं था। उस शाम दक्षिण से हवा चली, और उस बंद लोहे के दरवाज़े के पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई।