प्रकाशस्तंभ की ऊपरी मंज़िल पर लोहे का दरवाज़ा अब भी बंद था। पुर्तगाली मिस्त्रियों ने उसे डेढ़ सौ साल पहले जड़ा था, और जंग ने उसे दीवार से एक कर दिया था। शाम को जब हवा दक्षिण से चलती, उस दरवाज़े के पीछे से एक आवाज़ आती। धीमी, रुक-रुक कर, किसी पुराने जहाज़ की घंटी जैसी। मछुआरे उस तरफ़ जाल नहीं डालते थे। कहते थे कि सदियों पहले यहाँ एक जहाज़ डूबा था, और उसका एक मल्लाह अब तक किनारे नहीं लगा।
प्रकाशस्तंभ के पास ही एक छोटे से गाँव में रहते थे, रुद्र, जो 32 साल के एक उत्साही इतिहासकार थे। वह पुरानी इमारतों और उनके रहस्यों के प्रति बेहद आकर्षित थे। रुद्र का मानना था कि हर खंडहर अपने भीतर एक कहानी छुपाए हुए है। जब उन्होंने प्रकाशस्तंभ के बारे में सुना, तो उनका इरादा बना कि वह उसके रहस्य को जरूर उजागर करेंगे।
गाँव के लोग रुद्र को चेतावनी देते थे कि वहाँ जाना खतरे से खाली नहीं है। लेकिन रुद्र का जिज्ञासु मन किसी भी चेतावनी को नजरअंदाज कर देता था। वह प्रकाशस्तंभ के बारे में और जानने के लिए गाँव के पुराने लोगों से बात करता रहा। उन्होंने उसे बताया कि कई साल पहले एक जहाज तूफान में फंस गया था और उसके मल्लाह की आत्मा अब वहाँ के निवासियों को परेशान करती है।
किसी के होने का एहसास
एक दिन रुद्र अपने दोस्त सागर के साथ प्रकाशस्तंभ की ओर निकल पड़ा। सागर एक फ़ोटोग्राफ़र था और अपने कैमरे में उन रहस्यमयी दृश्यों को कैद करना चाहता था। दोनों ने तय किया कि वे रात में ही वहाँ जाएंगे क्योंकि दिन के उजाले में उन्हें कुछ खास नजर नहीं आता था।
रात का समय था और आकाश में बादल छाए हुए थे। हवाएँ तेज़ चल रही थीं और समुद्र की लहरों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। रुद्र और सागर को प्रकाशस्तंभ के पास पहुँचते-पहुँचते अजीब सी घबराहट महसूस होने लगी। वहाँ की हवा में एक अनजाना सा डर था, जैसे कोई अदृश्य शक्ति उनका पीछा कर रही हो।
प्रकाशस्तंभ के अंदर घुसते ही उन्हें एक ठंडा झोंका महसूस हुआ, जैसे किसी ने उनके कान में फुसफुसाया हो। अंदर का माहौल बेहद डरावना था। दीवारों पर जमी धूल, छत से लटके मकड़ी के जाले और फर्श पर बिखरी टूटी-फूटी चीजें उस जगह के खंडहर होने का सबूत दे रही थीं।
रुद्र ने अपने टॉर्च की रोशनी से दीवारों पर बने अजीबोगरीब चित्रों को देखा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ये चित्र किस काल के हैं, परंतु उनमें से एक चित्र में एक आदमी की आकृति बनी थी जो समुद्र की ओर इशारा कर रहा था। सागर ने तुरंत उस चित्र को अपने कैमरे में कैद कर लिया।
रुद्र ने सुझाव दिया कि उन्हें ऊपर वाले माले पर जाना चाहिए। सीढ़ियाँ बेहद पुरानी और जर्जर थीं, लेकिन दोनों ने हिम्मत जुटाई और ऊपर चढ़ने लगे। ऊपर पहुँचते ही उन्हें एक बड़ा सा कमरा मिला। कमरे के बीचोंबीच एक विशाल टेबल थी जिस पर नक्शे और पुराने दस्तावेज बिखरे हुए थे।
खौफ का दूसरा चेहरा
जैसे ही रुद्र ने उन दस्तावेजों को छूने की कोशिश की, अचानक से हवाएँ तेज़ हो गईं और कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया। सागर ने घबराते हुए रुद्र की ओर देखा। दोनों समझ नहीं पा रहे थे कि यह सब कैसे हो रहा है। कमरे में अचानक से ठंडक बढ़ गई और एक मल्लाह की साया जैसी आकृति दिखाई देने लगी।
वह आकृति धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी। रुद्र ने देखा कि वह साया उस पुराने जहाज के मल्लाह का था जो कई साल पहले यहाँ डूब गया था। साया ने अपनी कहानी सुनानी शुरू की, जैसे वह वर्षों से इसे किसी से साझा करना चाहता था। वह बताने लगा कि कैसे वह जहाज गोवा के तट पर आकर तूफान में फंसा था और कैसे उसे अपनी जान गँवानी पड़ी।
मल्लाह की आत्मा ने कहा कि वह अपनी कहानी सुनाकर शांति पाना चाहता है। रुद्र और सागर उसकी आत्मा को शांति देने का वादा करते हैं। उन्होंने उसके शब्दों को ध्यान से सुना और उसे विश्वास दिलाया कि वह अब कभी अकेला नहीं है। इतना सुनते ही साया धीरे-धीरे गायब होने लगा।
कमरे में फिर से शांति छा गई। अब रुद्र और सागर को समझ आ गया था कि इस भूतिया प्रकाशस्तंभ का रहस्य क्या था। उन्होंने उसी रात वहाँ से लौटने का निर्णय लिया। बाहर निकलते वक्त उन्होंने महसूस किया कि वहाँ की हवा अब पहले की तरह भारी नहीं थी।
गाँव पहुँचकर रुद्र और सागर ने गाँववालों को इस घटना के बारे में बताया। कुछ लोग इस पर विश्वास नहीं कर पा रहे थे, लेकिन अधिकतर लोग अब उस भूतिया कहानी का सच जान चुके थे। रुद्र ने महसूस किया कि उन्होंने एक आत्मा को शांति देकर एक नेक कार्य किया है।
कुछ हफ़्तों बाद सागर की एक तस्वीर शहर के अख़बार में छपी। खाली कमरा, बिखरे नक्शे, और खिड़की से आती हुई सुबह की रोशनी। नीचे कैप्शन में सिर्फ़ एक नाम था, जो उस रात उन्होंने पहली बार सुना था। रुद्र ने अख़बार मोड़कर रख दिया और बाहर समुद्र की तरफ़ देखा। मछुआरे उस दिन पहली बार प्रकाशस्तंभ के पास वाले पानी में जाल डाल रहे थे। किसी ने उन्हें कहा नहीं था। उस शाम दक्षिण से हवा चली, और उस बंद लोहे के दरवाज़े के पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई।